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डॉ० कृष्णा कुमारी का ललित निबंध 'बात तो बात की है'

डॉ० कृष्णा कुमारी का ललित निबंध 'बात तो बात की है'

बातों को लेकर कई-कई बातें भी प्रचलित हैं, मुहावरे भी। कहते हैं बात निकलेगी तो दूर तक जाएगी। इसलिए कुछ लोग तो बातों से ही चाँद-तारे तोड़ लाते हैं, हक़ीक़त में भले ही कुछ करते-धरते नहीं बने। भला यह भी कोई बात है! इसी प्रकार कुछ लोग बात के धनी होते हैं, तो कुछ बातों के शहंशाह, कुछ केवल बातें ही करते हैं।

आज आपसे बातें करने का बड़ा मन हो रहा है। वो भी ख़ूब सारी बातें। ढेर सारी बातें। लेकिन कहाँ से शुरू करूँ, कैसे करूँ? अरे यह भी कोई बात हुई! बातें तो कहीं से, किसी भी बात से प्रारम्भ की जा सकती हैं। हाँ ,एक बार शुरू हो जाएँ तो फिर बाते हैं कि रुकने का नाम तक नहीं लेती। जनाब यह तो बातें हैं और बातों का क्या! लेकिन ऐसा भी नहीं है। अरे, मैं कहाँ अटक गई। चलिए बातें शुरू कर ही देते हैं। इससे पहले कि आपको ये गीत याद आ जाए, 'क़समें, वादे, प्यार, वफ़ा सब, बातें हें बातों का क्या।'

हाँ, तो कितनी ही बार बात केवल और केवल बात की ही होती है। भले यूँ कोई बात नहीं होती। प्रतिष्ठा का सवाल हो या कोई और। जहाँ बात आन- बान- शान की हो तो, वहाँ फिर 'प्राण जाए पर वचन न जाए'। बात की आबरू बचाने के लिए आदमी क्या कुछ नहीं करता! मेरा ही एक शेर :

बात की आबरू बचाई है
हमने तोड़ी नहीं, बनाई है

कभी-कभी बातों ही बातों में बात बन जाती है तो कभी बात बिगड़ भी जाती है, क्योंकि एक बार धनुष से निकला तीर वापस आ भी सकता है, लेकिन बात निकल जाने पर वापस कदापि नहीं लौटती। इसीलिए बी० एम० सुमन को कहना पड़ा :

कोई भी बात ऐ हमदम, हमसफ़र सोचकर करना
ज़रा-सी बात पर बरसों का रिश्ता टूट जाता है

यूँ बातें केवल बातें ही नहीं होती, ये भी कर्ई-कई प्रकार की होती हैं, जैसे : प्यारी बातें, मीठी-मीठी बातें, कड़वी बातें, टेडी बातें, खरी बातें, झूठी बातें, सीधी-साधी बातें, तिरछी बातें, छोटी बातें, बड़ी बातें आदि-आदि लेकिन बड़ी बात तो ये है कि-
'यह तो कोई बड़ी बात नहीं' या 'अरे इसमें कौनसी बड़ी बात है'। वास्तव में कोई बड़ी बात होती ही नहीं है। छोटी-छोटी बातों का समग्र रूप है तथा कथित बड़ी बात।

और इसी बात पर किसी ने क्या ख़ूब कहा है-

बात चाँदी है, बात सोना है
बात हीरा है, बात मोती है
बात हर बात को नहीं कहते
बात मुश्किल से बात होती है

बात को लेकर सबसे स्मरण रखने वाली बात यह है कि हर बात कहने का एक वक़्त होता है, वक़्त की नज़ाकत को देखते हुए बात रख देनी चाहिए। वर्ना कहीं ऐसा न हो कि 'वक़्त निकल जाए और बात रह जाए'। अतः इस बात का बहुत-बहुत ध्यान रखना चाहिए। सबसे बड़ी बात यही है, ताकि बाद में पछताना नहीं पड़े।

बातों को लेकर कई-कई बातें भी प्रचलित हैं, मुहावरे भी। कहते हैं बात निकलेगी तो दूर तक जाएगी। इसलिए कुछ लोग तो बातों से ही चाँद-तारे तोड़ लाते हैं, हक़ीक़त में भले ही कुछ करते-धरते नहीं बने। भला यह भी कोई बात है! इसी प्रकार कुछ लोग बात के धनी होते हैं, तो कुछ बातों के शहंशाह, कुछ केवल बातें ही करते हैं।

काम-वाम करते नहीं, है बातों के शाह।
नाव देश की क्या तिरे, ले डूबे मल्लाह।।

- कृष्णा कुमारी

तो कुछ बात पर अड़ ही जाते हैं, कुछ इस प्रकार 'बात पर अपनी अड़े हैं, तोड़ने को दिल खड़े है'। क्योंकि कहीं भी अड़ जाने पर कुछ हानि होती ही है।
बातों की बात पर याद आया है कि हर व्यक्ति का अन्दाज़े-बयां जुदा-जुदा होता है। किसी के बात करने पर शहद की तरह रस टपकता है तो किसी के बतियाने पर फूल झड़ते हैं तो किसी के बोलते ही चाँद खिल उठता है। अपना-अपना सलीक़ा है भाई, क्या कीजै! हाँ, ऐसे व्यक्तियों से बात करने का लोभ भला कौन सँवरण कर सकता है।

देखिए इसी संदर्भ में अहमद फ़राज़ साहब ने क्या ख़ूब कहा है-

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात करके देखते हैं

हाँ, बातों का सिलसिला कुछ इस प्रकार होता है-

ज्यों केले के पात, पात में पात, पात में पात
ज्यों गधे की लात, लात में लात, लात में लात
ज्यों चतुरून की बात, बात में बात, बात में बात

और बात द्रोपदी के चीर की तरह लम्बी होती जाती है, होती जाती हैं, होती जाती हैं। हाँ, तो मेरी बात भी द्रोपदी के चीर की तरह लंबी हो जाए, इसके पहले छोटा-सा ब्रेक ले लेते हैं ताकि आप इस बीच अपनों से कुछ बात कर सकें।

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आफ़्टर द ब्रेक, ब्रेक तो समाप्त हो जाता है, लेकिन कभी-कभी बातों के बीच ऐसा ब्रेक-सा लग जाता है कि लाख चाहते हुए, कोशिश करते हुए भी बात मुँह से निकलने का नाम ही नहीं लेती। होठों पर आकर रुक जाती है। कुछ कह नहीं पाते और जीवन भर पछताते रहते हैं। यही सोचकर कि काश उस समय वो बात कह दी होती! लेकिन मन की बात कह देना इतना आसान भी तो नही होता! कैसे कहूँ, कैसे कहूँ, इसी कशमकश में समय की गाड़ी निकल जाती है।

कितनी ही बार सामूहिक रूप से ख़ूब बातें चलती रहती हैं लेकिन अचानक सब चुप हो जाते हैं। कुछ देर के लिए महफिल में सन्नाटा छा जाता है। सब एक दूसरे का मुँह देखने लग जाते हैं। किसी से कुछ कहते नहीं बनता, ब्रेक हो जाता है। कोई एक कैसे न कैसे, कोई भी बात छेड़कर ख़ामोशी को चुप करता है और बात सम्भाल लेता है, तो कभी-कभी हर कोई अपनी-अपनी बोलता जाता है, सुनता कोई नहीं, अमूमन ऐसा भी होता है। यानी कि जितना आसान बातें करना है, उतना ही मुश्किल भी। कभी-कभी तो बात करने के लिए कोई विषय ही नहीं मिलता तो ऐसे में मौसम से बात प्रारम्भ कर ली जाती हैं, क्योंकि यह सबसे अहम और प्रचलित विषय जो है। यहाँ पर रचनाकार ब्रजभूषण चतुर्वेदी जी के कुछ शेर याद आ रहे हैं :

भूखे से भगवान की बातें
रहने दे ये ज्ञान की बातें

हाथों में पहले रोटी रख
फिर करना ईमान की बातें

पूछो जाकर किसी दीये से
आँधी और तूफ़ान की बातें

वाकई भूखे भजन न होय गुपाला। ज़रूरी नहीं कि बातें परिचितों से ही होती हों, अपरिचितों में भी ख़ूब जमकर बातें हो जाया करती हैं, बस एक बार सिलसिला शुरू होने की देर होती है बस। ट्रेन आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। ट्रेन में एकदम अजनबियों के बीच या तो पूरे रास्ते बात होती ही नहीं, क्योंकि पहल कैसे हो, यह बड़ी बाधा होती है और यदि कोई एक दुस्साहस कर ले तो बातों ही बातों में बातों का कारवां ऐसा चलता है कि रुकने का नाम तक नहीं लेता चाहे मंज़िल पर आकर रेल ख़ुद ठहर जाए। हाँ, विषयगत वैविध्य यहाँ कमाल का होता है। एक और बात कि बातें करने के लिए महिलाओं को ख़ूब बदनाम किया हुआ है। उन्हें बातूनी होने के खिताब से नवाज़ा जा चुका है। जबकि पुरूष वर्ग इस प्रतिस्पर्धा में उनसे सात क़दम आगे हैं। चलिए, छोड़िए, कोई बात नहीं। यह कोई बड़ी राष्ट्रीय समस्या नहीं है। न ही विवाद का मुददा ही। लेकिन पुरुषों में एक वर्ग ऐसा भी है, जो बोलतें नहीं हैं, परन्तु भीतर ही भीतर ट्रेन की सीटी की तरह चीखते रहते हैं, कुछ इस प्रकार :

जो लोग बोलते नहीं/ भीतर ही भीतर
ट्रेन की सीटी की तरह/ दहाड़ते हैं
- कृष्णा कुमारी

ऐसे लोग मन ही मन में घुटते रहते हैं और यही घुटन कभी आक्रोश बनकर फूट पड़ती है और महाविस्फोट का रूप ले लेती है। यह स्थिति बड़ी भयानक होती है। और महिलाएँ हैं कि कोई सुने न सुने, बस अपने मन की तमाम बातों को उड़ेलती जाती हैं, बोलती जाती हैं, बड़बड़ाती रहती हैं, ख़ुद से ही बातें करती रहती हैं, इसीलिए हमेशा बरस चुके मेघों की भाँति फुल्की-फुल्की रहती हैं। इसमें बुरा भी क्या है भला! कहा भी गया है कि महिलाओं के पेट में बात नहीं टिकती। इन्ही संदर्भों से मेल खाती कुछ पंक्तियॉं अर्ज हैं-

होती है महिलाएँ
बहुत बातूनी
बिलकुल नदी की तरह

बातों ही बातों में
एक ही बात से गढ लेना
महाकाव्य
इनके बायें हाथ का खेल है

- कृष्णा कुमारी

कुल मिलाकर हर जगह संतुलन ज़रूरी होता है। हाँ, मिलकर-बैठकर बात करने से समस्या का हल ज़रूर निकल जाता है और हाँ, बातो में संतुलन नहीं रहने पर या तो बातें बहुत होती हैं या फिर मौन पसर जाता है। अधिक बातें होने पर वक़्त ज़ाया होता है, जो बहुत ग़लत है। आजकल तो फोन पर ही लोग घण्टों बतियाते रहते हैं क्योंकि फोन कंपनियो ने सस्ती सुविधाएँ मुहैया करवा रखी हैं। इससे दो क़दम आगे, चेटिंग का तो भगवान ही मालिक है। मुझे कुछ नहीं कहना। हाँ, मैं आपको बातें करने से मना नहीं कर रहीं हूँ क्योंकि कब, किससे, कितनी बातें करनी हैं, आप ख़ुद समझते हैं।

चलिए अपनी बात को यहीं विराम देती हूँ वर्ना निबंध की जगह पूरा एक ग्रंथ तैयार हो जाएगा। आपने इतनी देर तक पूर्ण मनोयोग से मेरी बात को सुना, तहे-दिल से शुक्रिया और चलते-चलते मुलाहिजा फरमाएँ-

छोड़ो ये किरदार की बातें
और है कुछ संसार की बातें
कश्ती है न खिवैया कोई
फिर भी हैं मझधार की बातें
‘कृष्णा’ कब मंजूर जहाँ को
क्यूँ करती हो प्यार की बातें!

1 Total Review

के० पी० अनमोल

27 December 2025

बहुत अच्छा निबंध। हार्दिक बधाई।

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रचनाकार परिचय

कृष्णा कुमारी 'कमसिन'

ईमेल : krishna.kumari.kamsin9@gmail.com

निवास : कोटा (राजस्थान)

जन्मतिथि- 09 सितम्बर
जन्मस्थान- चेचट, कोटा (राजस्थान)
शिक्षा- एम० ए०, एम० एड (मेरिट अवार्ड), साहित्य रत्न, आयुर्वेद रत्न, बी० जे० एम० सी० (जनसंचार एवं पत्रकारिता में स्नातक)
संप्रति- अध्यापन
प्रकाशित कृतियाँ- 'मैं पुजारिन हूँ' (कविता संग्रह, 1995), 'प्रेम है केवल ढाई आखर' (निबन्ध, 2002), 'कितनी बार कहा है तुमसे' (कविता, 2003), '..........तो हम क्या करें' (ग़जल, 2004), 'ज्योतिर्गमय” (आलेख, 2006), 'स्वप्निल कहानियॉं' (कहानी, 2006), 'जंगल में फाग' (बाल-गीत, 2009), 'क़तरा नदी में' (उर्दू ग़ज़ल), 'पहाड़ों का आमंत्रण', 'अद्भभुत है सिंगापुर' एवं 'दक्षिण की ओर' (यात्रा वृतांत), 'आमने-सामने' (साक्षात्कार)
निवास- सी- 368, तलवंडी, कोटा (राज०)- 324005
मोबाइल- 9166887276