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मार्च 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को नवरात्रि एवं ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

योगेन्द्र प्रताप मौर्य के बाल-गीत

योगेन्द्र प्रताप मौर्य के बाल-गीत

योगेन्द्र प्रताप मौर्य उत्कृष्ट बाल गीत रचते हैं। इनके गीतों में विषय जितने रोचक हैं, उनकी कहन उतनी ही मज़ेदार। बिलकुल बच्चों वाली मानसिकता तक जाकर वे अपने गीतों को जीवंतता देते हैं। इनके बाल-गीतों का शिल्प और भाषा भी बहुत चुस्त-दुरुस्त हैं। इसी कारण उनमें स्तरीयता और रोचकता के साथ कसावट भी बहुत अच्छी मिलती है। योगेन्द्र जी के बाल गीत बाल साहित्य की आदर्श रचनाएँ हैं।

- के० पी० अनमोल

तुम हो ख़ूब कमाल बल्ब जी

और सुनाओ हाल बल्ब जी
तुम हो ख़ूब कमाल बल्ब जी!

हो कितनी भी रात अँधेरी,
तुम करते उजियार सदा जी।
इसीलिए तो दोस्त हमारे,
चकित तुम्हारी देख अदा जी।
नीले, पीले, हरे, गुलाबी,
और बैंगनी, लाल बल्ब जी!

उत्सव या त्योहारों में तुम,
नहीं मानते कभी हार जी।
नहीं आँख है, नहीं कान है,
फिर भी हो तुम होशियार जी।
रात-रात तुम जाग-जागकर,
करते रोज़ धमाल बल्ब जी!

कई रंग के, कई ढंग के,
तुम हो छोटे और बड़े जी।
झालर भी है रूप तुम्हारा,
देख रहे हम खड़े-खड़े जी।
पुल बाँधा तारीफों के पर,
पिचकाए क्यों गाल बल्ब जी!

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जाड़ा छुट्टी लेकर ठहरा

जाड़ा
छुट्टी लेकर ठहरा।

चिड़िया दुबकी
छिपी गिलहरी,
कहाँ गई है
कुतिया झबरी,

कभी न सुधरा
मौसम बहरा।

सूरज नहीं
दिखाई देता,
कहता था वह
ख़ुद को नेता,

आज घुसा
बादल में गहरा!

स्वेटर-मफलर
मोजे-जूते,
जान बची है
इनके बूते,

बाहर है
कुहरे का पहरा।

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मिली जमानत थाने से

मौसी जी के गाँव गया है,
चाकू एक महीने से।

गाजर, मूली, प्याज़, चुकंदर,
ख़ुश हैं राहत पाने से।
मस्ती करते हैं सारे ज्यों,
मिली जमानत थाने से।
हँसते-हँसते कद्दू काका,
गिरे अचानक ज़ीने से।

आलू और रतालू बोले,
अब तो नहीं कटेंगे हम।
दो, चार या छह भागों में,
बिल्कुल नहीं बँटेंगे हम।
एक टोकरी में बैठे हैं,
हम तो बड़े करीने से।

लौकी, गोभी, सेम, टमाटर,
परवल, पालक, बैंगन जी।
और चिचिंडा दिखता जैसे,
एक नाल का है गन जी।
हम ऐसे ही मौज मनाएँ,
खीरा कहा पुदीने से।

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सचमुच की हरियाली

ऋतु वसंत की कब आएगी
महानगर में ताई!

बातूनी है, मुँह बोली है
भोली-भाली गुड़िया,
पूछ रही क्यों नहीं पेड़ हैं
यहाँ नहीं क्यों चिड़िया!

बीते दिन लेकिन कोयल कब
यहाँ कूकने आई!

पौध, झाड़ियाँ, कली, लताएँ
लेकिन प्लास्टिक वाली,
सोचो! इनसे कैसे होगी
सचमुच की हरियाली!

कृत्रिम फूल पर भला कभी भी
तितली है मँडराई!

दो कमरों में रहना-खाना
बस इतनी आज़ादी,
किस्से मुझे सुनाती थी जो
यहाँ नहीं वो दादी,

जबसे आई बहन फ्लैट में
कभी नहीं मुस्काई!

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मेरी बिटिया रानी

क्यों गुस्सा हो, मुझे बताओ
मेरी बिटिया रानी!
धीरे-धीरे सीख रही हो
नयी-नयी शैतानी।

क्यों फूलों की पंखुड़ियों को,
नोच-नोच बिखराई?
ऐसा करते तुम्हें नहीं क्यों
दया न थोड़ी आई?

सूख रहे थे ये बेचारे,
दे देती तुम पानी!

बिना झिझक तुम सच-सच बोलो,
आँसू नहीं बहाओ।
क्यों डरती हो चाचू जी से,
पास ज़रा तो आओ।

अब तो हुई सयानी हो तुम,
क्यों करती नादानी!

फूलों के ये पौधे निर्दय,
काँटे कई चुभोए।
मैं चीखी-चिल्लाई लेकिन,
फूल रहे, वे सोए।

इसीलिए तो मैंने उनको,
याद दिलाई नानी।

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कॉलोनी की सत्ता

मधुमक्खी तुम आख़िर कैसे
रच लेती हो छत्ता,
शिल्प ग़ज़ब यह सीखी हो क्या
जाकर तुम कलकत्ता!

छत्ते में जो मीठा मधु है,
ढूंँढ़ कहाँ से लाती?
दिन में कितनी बार बताओ
फूलों पर मँडराती?

दूर-दूर तक जाती हो पर
नहीं भूलती रस्ता।

छत्ते में कमरे ही कमरे,
एक नहीं दरवाज़ा।
कौन बजाता है भीतर से,
भन्नाहट का बाजा?

जिसे समझते हम सब छत्ता,
घर है वह अलबत्ता।

बाहर नहीं निकलती रानी,
क्या सबसे डरती है?
पड़े-पड़े क्या वह कमरे में,
सिर्फ मज़े करती है?

उसके ही हाथों में है क्या,
कॉलोनी की सत्ता?

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कंचे हँसते और हँसाते

हरे, दूधिये, नारंगी हैं
काले-नीले हैं,
कुछ कंचे मटमैले हैं तो
कुछ चमकीले हैं।

आज जुटी है भीड़ गली में,
पूरी बस्ती की।
कंचे का यह खेल निराला,
इतनी मस्ती की।

आकर्षक हैं सारे कंचे,
छैल-छबीले हैं।

चिटक गया मोनू का कंचा,
वह चिल्लाता है।
जीत गया है भोलू कंचा,
वह मुस्काता है।

कंचों-से इन बच्चों के
सपने रंगीले हैं।

चांसी की जेबों में कंचे,
हरदम रहते हैं।
चलो खेलने देर हो रही,
उससे कहते हैं।

कंचे हँसते और हँसाते,
बड़े हठीले हैं।

*******


बारिश बहुत लुभाती है

मम्मी मुझको बारिश
बहुत लुभाती है,
नहीं नहाते पेड़
इन्हें नहलाती है।

बादल चित्र बनाता
और मिटाता है,
कितने कौशल रोज़
मुझे दिखलाता है।

इतनी सारी ख़ुशियाँ
लेकर आती है।

दादा जी की छतरी
खुलकर हँसती है,
खेल खेलती मुझसे
करती मस्ती है।

स्वयं भीगती मुझको
ख़ूब भिगाती है।

नल के नीचे फिर से
फैली काई है,
फिसल-फिसलकर गिरता
मेरा भाई है।

दीदी गुस्सा करती
उसे उठाती है।

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तांडव ख़ूब मचाया

बेल मिली क्या इस गरमी ने
तांडव ख़ूब मचाया,
बच्चे, बूढ़े, बड़े, सयाने
हर कोई घबराया।

सुबह, दोपहर, शाम पसीना
बदलें कितने कपड़े!
गर्म हवा के झोंके भी तो
कितने मोटे-तगड़े!

चाहा लेकिन नहीं पटकनी
कोई भी दे पाया।

छुट्टी भी बेकार हुई है
कहाँ घूमने जाएँ!
घर में कितना खेलें कैसे
बाक़ी समय बिताएँ?

भाई और बहन में झगड़ा
रोज़-रोज़ करवाया।

गरमी को हथकड़ी लगाओ
बादल जल बरसाओ।
तपती-प्यासी इस धरती की
थोड़ी प्यास बुझाओ।

क्रोधित होकर आसमान ने,
फिर आदेश सुनाया।

*******


पापा मेरा दम घुटता है

पापा मेरा दम घुटता है
महानगर में।

जिस खोली में मैं रहता हूँ
वह छोटी है,
कैसे रह पाएगी दीदी
वह मोटी है।

लगती चोट खड़ा होता जब
अपने सर में।

यहाँ भीड़ है रहन-सहन भी
बेढंगा है,
बात-बात पर कहा-सुनी
झगड़ा-दंगा है।

शोर-शराबा, पीं-पीं, पों-पों
बड़े शहर में।

बहुत बिज़ी हैं अपने-अपने
कामों में सब,
ऊब चुका हूँ एक जगह पर
पड़े -पड़े अब।

लौट चलें हम पुनः गाँव में-
अपने घर में।

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रचनाकार परिचय

योगेन्द्र प्रताप मौर्य

ईमेल : yogendramaurya198384@gmail.com

निवास : बरसठी, जौनपुर (उ०प्र०)

जन्मतिथि- 10 जुलाई 1983
शिक्षा- बी. एस. सी., बी. एड
सम्प्रति- सहायक अध्यापक, बेसिक शिक्षा परिषद, जौनपुर
प्रकाशन- सूरज चाचा हाय हाय (बाल कविता-संग्रह, 2016), चुप्पियों को तोड़ते हैं (नवगीत-संग्रह, 2019), पाइप से पौधे नहलाएँ (बाल कविता-संग्रह, 2022), गीत हौसले हैं (नवगीत-संग्रह, 2022), जहाँ नहीं उजियार (नवगीत-संग्रह, 2025), नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा (बाल कविता-संग्रह, 2025)
विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं,समाचार पत्रों,ई-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। अनेक समवेत संकलनों के सहयोगी कवि।
प्रसारण- आकाशवाणी वाराणसी, महमूरगंज
पुरस्कार/सम्मान-
पं0 प्रताप नारायण मिश्र युवा साहित्यकार सम्मान, 2017 (बाल साहित्य)- भाऊराव देवरस सेवा न्यास, लखनऊ
रामानुज त्रिपाठी स्मृति बाल साहित्य सम्मान, 2018 सुलतानपुर
अभिव्यक्ति विश्वम् नवांकुर पुरस्कार, 2019 अभिव्यक्ति विश्वम् लखनऊ
बलवीर सिंह 'रंग' पुरस्कार, 2019 उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ
भाषा गौरव सम्मान, 2019 डॉ० कमल सिंह स्मृति न्यास मेरठ, उत्तरप्रदेश
रामानुज त्रिपाठी स्मृति नवगीत साहित्य सम्मान, 2020 सुलतानपुर
नरेंद्र श्रीवास्तव गीत चेतना सम्मान, 2023 कविलोक साहित्य परिषद, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
ठा० शैलजीत सिंह राठौर स्मृति सम्मान, 2024 बाल साहित्य संवर्धन संस्थान, कानपुर
सम्पर्क- ग्राम व पोस्ट- बरसठी, जनपद- जौनपुर (उ०प्र०)- 222162
मोबाइल- 9454931667