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अली अबदुलरेज़ाई की कविताओं का नीता पोरवाल द्वारा अनुवाद

अली अबदुलरेज़ाई की कविताओं का नीता पोरवाल द्वारा अनुवाद

अली अबदुलरेज़ाई (10 अप्रैल, 1969) एक ईरानी-ब्रिटिश कवि, लेखक, साहित्यिक और राजनीतिक विश्लेषक हैं। आपकी 70 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं। 2001 में ईरान छोड़ने से पहले आपको समकालीन फ़ारसी साहित्य और कविता के सबसे नवीन कवियों में से एक के रूप में जाना जाता था। अंग्रेज़ी अनुवाद डॉ० अबोल फ़रूशन द्वारा।

भूकम्प

वह एक उंगली उठाती है
माफ़ कीजिए टीचर!

अगर टीन की छतें ढह जाएँ
और लोहे की भारी-भरकम बीमों के नीचे
वह 'पवित्र गाय' गिर जाए
तो क्या हमारी मौत हमेशा पक्की है?

टीचर के चेहरे पर एक सिहरन दौड़ गई
उसने अपनी जेबों से हाथ बाहर निकाले
और मानो आसमान उस क्लास पर टूट पड़ा

चकनाचूर हुई बेंचें
बच्चों के हाथों से छूटी हुईं किताबें
और वे दीवारें
जिन्होंने अपने साथियों के लिए क्या-क्या सपने संजोए थे
पर वहाँ सिर्फ........

मलबे में से एक हाथ बाहर निकला
और उठी हुई एक उंगली से मानो एक आवाज़ गूँज उठी थी-

माफ़ कीजिए सर!
क्या मैं खड़ी हो सकती हूँ?

********


युद्ध और शांति

शान्ति-
किसी की माँ नहीं थी
जो शाम ढलते ही घूंघट ओढ़ ले
जो गली में नीचे उतर जाए
और उकडूं बैठकर अपने बेटे की
ग़ैर-मौजूदगी को देखती रहे
जो गेंद के बजाए
एक बारूदी सुरंग पर कूद गया था

उसकी आँखें गहरे समुद्री नीले रंग की थीं
हम भी, जो जीतने का इरादा रखते थे
कर्बला के रेगिस्तान के बीच
उन आँखों के पानी से अपनी प्यास बुझा सकते थे

हम, जिन्होंने इतने सारे गोल किए थे,
हमारे पास खेलने के लिए कोई मैदान नहीं था
न ही ऐसे जूते थे, जिनसे हम गेंद को किक मार सकें
न कोई गेंद थी, न ही कोई दोस्त
फिर भी
हम आपस में खेल सकते थे
बिना गेंद वाले मैच के मैदान में

कभी-कभी, जब हमारे पास खेलने के लिए
कोई मैदान नहीं होता था
तो कम से कम हम गलियों में तो घूम सकते थे
और किसी को पीट तो सकते थे
पर अब क्या?
जब युद्ध छिड़ गया है

उसकी आँखें किसी घाव जैसी थीं
चेहरे पर लाल निशान
और हम, जिन्हें युद्ध के लिए बुलाया गया था
हमने अपनी सारी जमा-पूंजी एक साथ जुटाई
और फिर एक प्लास्टिक की गेंद का इंतज़ाम किया
जिसके पीछे हम दौड़ सकें

फिर
एक-एक करके हम कर्बला में इकट्ठा हुए
और 'छह खिलाड़ियों वाला' मैच खेलने का इंतज़ाम किया
फिर नाश्ता हुआ, ट्रेन आई, नमाज़ की चटाई बिछी
और हमने एक-दूसरे को अलविदा कहा

जब हम वहाँ पहुँचे
तो हमारे हर गड्ढे के पीछे एक तोप का गोला रखा था
दोनों गोल-पोस्टों के बीच खेल हवा में खेला जा रहा था
जो सबसे तेज़ दौड़ता, वही सबसे पहले गोल-पोस्ट तक पहुँचता था
एक बार फिर, हमारे पास खेलने के लिए कोई मैदान नहीं था,

बल्कि गेंद के बजाए ज़मीन के नीचे बारूदी सुरंगें थीं
जितनी चाहो, उतनी
जिससे हमारे पैर उनसे टकराकर यहाँ-वहाँ छितर सकें।

********


सेंसरशिप

मेरे शब्दों के क़त्ले-आम में
उन्होंने मेरी आख़िरी पंक्ति का सिर काट दिया है
और ख़ून, स्याही की तरह काग़ज़ पर गिर रहा है
पूरे पन्ने पर मौत पसरी हुई है
और ज़िंदगी, किसी पत्थर से टूटी
एक अधखुली खिड़की की तरह हो गई हो

एक नई बंदूक ने दुनिया को ख़त्म कर दिया है
और मैं, आयातित सामान की तरह,
इस गली के दरवाज़ों से गुज़रता हुआ
अब भी वही छोटा-सा कमरा हूँ
जो यहाँ से विदेश वास करने चला गया होऊं

मैं, अपनी ज़िंदगी में,
जो इस छोटे से पन्ने की पंक्तियों के लिए क़लम जैसा हूँ, एक माँ हूँ
बिल्ली के पंजे अब भी उछल-कूद कर रहे हैं
उस चूहे को डराने के लिए
जो उस बिल की ओर भाग रहा है, जिसे उन्होंने बंद कर दिया था

स्कूल में सीखे सबक़ की तलाश में
मैं अब अपनी जिल के लिए 'जैक' जैसा प्रेमी नहीं रहा
मैं अपना नया होमवर्क कर रहा हूँ
तुम उसे काट दो

और उस लड़की के भीतर- जो इस कविता के अंत में लड़खड़ाकर गिरेगी
एक घर बनाओ
जिसका दरवाज़ा किसी ज़ख्म की तरह खुला हो
और मौत के किनारों के बीच से
उस कमरे की तरह, जो इस घर से चला गया हो- ख़ुशी-ख़ुशी जिया हो

एक ऐसी लड़की, जो मुझे अपना बनाना चाहती थी
और मुझे अपनी ओर खींचने के लिए अपनी आवाज़ में प्यार के टुकड़े घोलती थी
जिससे मैं उसके शरीर के मंदिर की ओर खिंचा चला जाऊं
जिससे मेरी आँखें घूमती रहें, घूमती रहें- और मुझे फिर से एक दरवेश बना दें

कैसे ये आँखें- ये रीते कोटर-
दो लोगों के प्रेम-मिलन के बीच हज़ार हाथों वाली हो जाती हैं
कैसे होने का यह पहलू- जहाँ मैं हूँ-
ईरान में और भी ज़्यादा 'दूसरा' हो जाता है
पिता, माँ, मेरे भाई!

मेरी हालत किसी घाव से भी ज़्यादा नाज़ुक है
लेखन मुझसे भी ज़्यादा नपुंसक हो गया है
और लंदन- अपने मौसम की सुनहरी लटों के साथ- अब भी
एक बहन की तरह इंतज़ार कर रहा है
कि मौत मेरे शरीर पर पसर जाए
ताकि ज़िंदगी मुझे फिर से मार डाले

मेरा दिल उस कवि के लिए रो रहा है
जिसकी शब्दों की कतार लंबी होती जा रही है
उस बे-शाख चिड़िया के लिए, जिसने अपनी चहचहाहट निगल ली है
उस कौवे की वापसी के लिए, जिसके सिर पर कोई तार नहीं है
और ख़ुद अपने लिए भी
जो बिजली की तरह इस घर से चला गया है
मैं कभी कोई था
मैंने एक बेवकूफी की- मैं एक कवि बन गया

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रचनाकार परिचय

नीता पोरवाल

ईमेल : neeta.porwal@gmail.com

निवास : अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 15 जुलाई, 1970
जन्मस्थान- अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)
प्रकाशन- वियतनाम के सुप्रसिद्ध जनवादी कवि माई वान फान के महाकाव्य 'लाल आत्माएँ' और 'उड़ चला मन पांखी', लेबनान के महान चिंतक और दार्शनिक ख़लील जिब्रान की पुस्तक 'द प्रोफेट' और फ़्रांस के जाने-माने लेखक एंटोनी डे सेंट-एक्जुपेरी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘द लिटिल प्रिंस’ के साथ-साथ रवीन्द्रनाथ टैगोर, यूनान के प्रसिद्ध कवि नाजिम हिकमत, यूनानी कवयित्री सप्फो जैसे अनेक महत्वपूर्ण कवियों और कथाकारों की रचनाओं का अंग्रेजी से हिंदी में रूपांतरण और डॉ० ब्रजेश वर्मा के उपन्यास My Days with Hindustan का हिंदी से अंग्रेजी में रूपान्तरण।
निवास- अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)