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व्यंग्य विधा की पुस्तक-सिर मुँडाते ओले पड़े- डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

व्यंग्य विधा की पुस्तक-सिर मुँडाते ओले पड़े- डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

हिंदी में व्यंग्य की किताब उस अनुपात में नहीं आ रही है, जिस अनुपात में गद्य और पद्य की अन्य विधाओं का प्रकाशन हो रहा है। अभी भी व्यंग्य का नाम आते ही हमारा ध्यान हरिशंकर परसाई, काका हाथरसी और हुल्लर मुरादाबादी जैसे कुछ लोगों तक सिमट कर रह जाता है.समकालीन साहित्य में संतोष दिवाकर एक अच्छे व्यंग्य लेखक हैं। एक समय में उनकी व्यंग्य क्षणिकायें काफ़ी सुनी जाती थी। भारतीय स्टेट बैंक में नौकरी करते हुए भी उन्होंने अपने साहित्य को जिंदा रखा है, यही कारण है कि उनके व्यंग्य की एक नई किताब सर मुंडाते ओले पड़े छप कर आई है। इस पुस्तक में उनके व्यंग्य विधा के पचहत्तर निबंध हैं। सबसे बड़ी बात कि इस निबंध के विषय हमारे आसपास के हैं, लेकिन संतोष दिवाकर अपनी प्रतिभा से इस अभिधावली को व्यंजनात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके व्यंग्य की वो धार है, जिससे कोई नहीं बच पाया है।

हिंदी में व्यंग्य की किताब उस अनुपात में नहीं आ रही है, जिस अनुपात में गद्य और पद्य की अन्य विधाओं का प्रकाशन हो रहा है। अभी भी व्यंग्य का नाम आते ही हमारा ध्यान हरिशंकर परसाई, काका हाथरसी और हुल्लर मुरादाबादी जैसे कुछ लोगों तक सिमट कर रह जाता है.समकालीन साहित्य में संतोष दिवाकर एक अच्छे व्यंग्य लेखक हैं। एक समय में उनकी व्यंग्य क्षणिकायें काफ़ी सुनी जाती थी। भारतीय स्टेट बैंक में नौकरी करते हुए भी उन्होंने अपने साहित्य को जिंदा रखा है, यही कारण है कि उनके व्यंग्य की एक नई किताब सर मुंडाते ओले पड़े छप कर आई है। इस पुस्तक में उनके व्यंग्य विधा के पचहत्तर निबंध हैं। सबसे बड़ी बात कि इस निबंध के विषय हमारे आसपास के हैं, लेकिन संतोष दिवाकर अपनी प्रतिभा से इस अभिधावली को व्यंजनात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके व्यंग्य की वो धार है, जिससे कोई नहीं बच पाया है। वो अपने शब्दों के तीर से अचूक निशाना लगाते हैं, जिससे गुनहगार तिलमिलाकर कर बस रह जाता है कोई प्रतिकार नहीं कर पाता.उदाहरण के लिए उनके निबंधों की कुछ पंक्तियां देखी जा सकती है। इस संग्रह में उनका एक निबंध है- मास्कनाम. जाहिर है मास्क से हम सब परिचित हैं, लेकिन यह व्यंग्य लेखक इसका परिचय दूसरी तरह से देते हैं- मास्क पहनने का ढंग भी अलग-अलग है। कुछ लोग पूरे मुंह को ढक कर रखते हैं, तो कुछ नाक को खुला रखते हैं और लोगों को दिखाते हैं कि देखो मेरी नाक नहीं काटी है। कुछ लोग मास्क को अपनी जेब में रखते हैं। परिचय पत्र के समान पुलिस जब पकड़ती है तो जेब से निकलकर मास्क दिखा देते हैं। ठीक इसी तरह से उनका एक निबंध है- के बी सी, जो टीवी का एक शो है, निबंधकार की व्यंग्य शैली यहां भी देखने लायक है  आदमी जीवन में बनना कुछ और चाहता है लेकिन किस्मत उसे कहीं और ले जाती है। बनते-बनते अभिनेता बन जाता है। हाँ भी जब मामला फसता है तो निराशा के क्षणों में आदमी बाबा, ज्योतिष, तांत्रिक, करियर सलाहकार आदि के शरण में चला जाता है.
आज पूरी दुनिया जल संकट की समस्या से जूझ रही है. इस निबंधकार की शैली देखें- पहले लोग यह कहते थे कि वह पानी की तरह पैसा खर्च कर रहा है और आज पानी के लिए पैसा खर्च करना पड़ रहा है। एक मुहावरा है कि पानी को बाँटा नहीं जा सकता, परंतु आज पानी भी बँट गया है.ये आरओ पानी है. डिब्बा बंद पानी है, यह साधारण पानी है। लोगों को उनकी हैसियत के मुताबिक उन्हें पीने का पानी दिया जाता है। इसी तरह इनका एक और निबंध है फेंकना, जिसमें उन्होंने इस खेल के बहाने पूरी व्यवस्था पर तंज कसा है- फ़ेंकाफेंकी तो हमारे कार्यालय की गरिमा है। आप किसी काम के लिए कार्यालय में जाते हैं, तो पहला व्यक्ति दूसरे के पास भेजेंगे दूसरा तीसरी के पास, और यही क्रम चलते हुए जब पहले के पास पहुँचेंगे,तब आप सही टेबल पर जाएँगे.
यह कुछ बानगी भर है. संतोष दिवाकर की ऐसी धार और ऐसी मिसाल उनके निबंधों में भरी पड़ी है. कहना ना होगा कि यह पुस्तक जहाँ आपका मनोरंजन और ज्ञानवर्धन करती है,वहीं कभी तिलमिलाने तो कभी पूरी सामाजिक व्यवस्था, परिदृश्य और संरचना पर सोचने को मजबूर भी करती है.कुल मिलाकर किताब पठनीय है। 

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पुस्तक- सिर मुंडाते ओले पडे
निबंधकार- संतोष दिवाकर
विधा- व्यंग्य,
पृष्ठ-167,
मूल्य- 299, वर्ष-2025
प्रकाशक- बोधि प्रकाशन,जयपुर

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रचनाकार परिचय

ज़ियाउर रहमान जाफ़री

ईमेल :

निवास : नवादा (बिहार )

नाम- डॉ.ज़ियाउर रहमान जाफरी
जन्मतिथि-10 जनवरी 1978
जन्मस्थान- भवानन्दपुर,बेगूसराय, बिहार
शिक्षा- एम.ए. (हिन्दी, अंग्रेजी, शिक्षा शास्त्र)बीएड,पत्रकारिता, पीएचडी हिन्दी, यू जी सी नेट (हिन्दी )
संप्रति- सरकारी सेवा

प्रकाशित कृतियाँ-
1. खुले दरीचे की खुशबू- हिंदी गजल
2. खुशबू छू कर आई है- हिंदी गजल
3.परवीन शाकिर की शायरी- हिंदी आलोचना
4.ग़ज़ल लेखन परंपरा और हिंदी ग़ज़ल का विकास-हिन्दी आलोचना
5. हिंदी गजल :स्वभाव और समीक्षा - हिंदी आलोचना
6. चांद हमारी मुट्ठी में है- हिंदी बाल कविता
7. आखिर चांद चमकता क्यों है- हिंदी बाल कविता
8. मैं आपी से नहीं बोलती -उर्दू बाल कविता
9. चलें चांद पर पिकनिक करने- उर्दू बाल कविता
10. लड़की तब हंसती है- संपादन

पुरस्कार एव सम्मान-
आपदा प्रबंधन पुरस्कार,बिहार शताब्दी सम्मान,यशपाल सम्मान तथा शाद अजीबाबादी साहित्य एवं समाज सेवा सम्मान समेत पचास से अधिक सम्मान एवं पुरस्कार

संपादन एवं पत्रकारिता-
संवादिया( बाल पत्रिका)जागृति, निगाह, चल पढ़ कुछ बन, साहित्य प्रभा आदि में सहयोगी संपादक एवं दैनिक हिंदुस्तान समेत कई पत्र -पत्रिकाओं में पत्रकारिता। 

विशेष-
. आकाशवाणी पटना दरभंगा भागलपुर, डीडी बिहार,ई टीवी बिहार आदि से नियमित प्रसारण
. बाल कविता नासिक के पाठ्यक्रम में शामिल
. पीएचडी उपाधि हेतु कई शोधार्थियों द्वारा ग़ज़ल साहित्य पर शोध
. देश भर के कई सेमिनारों और मुशायरों में शिरकत

पता-
C/O-एस. एम इफ़्तेख़ार काबरी
(पेशकार )
शरीफ कॉलोनी,बड़ी दरगाह, नियर बीएसएनएल टॉवर,पार नवादा
ज़िला -नवादा(बिहार) 805112
मोबाइल-6205254255
मोबाइल -9934847941