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प्रेम और सौंदर्य- राजेन्द्र वर्मा

प्रेम और सौंदर्य- राजेन्द्र वर्मा

हमारा प्रयोजन बाहरी रूप-रंग बनाए रखने से नहीं है, जिसकी दुर्दशा हमने भरपूर कह सुनाया, वरन सौंदर्य से हमारा प्रयोजन आंतरिक चरित्र अथवा शील पालन से है और मनोहर का शब्द मनुष्य के चेहरे के वास्ते न करके शील अथवा स्वभाव के लिए हम प्रयोग करते हैं, क्योंकि शारीरिक सौंदर्य पहले तो सबको प्राप्त नहीं है और न यत्न किए जाने से सबको मिल सकता है तब हम क्यों दूसरे प्रकार के सौंदर्य के लिए यत्न न करें! जो थोड़े प्रयत्न में मिल सकता है और न इसके बढ़ने की कुछ अवधि है। जहाँ तक बढ़ाते जाइए, कभी आप यह नहीं कह सकते कि हमारे अधिक अच्छे होने की और गुंजाइश नहीं है। इस शील-पालन के सौंदर्य के विषय में अद्भुत बात देखी जाती है कि जो शील-पालन के सौंदर्य से पूर्ण हैं, वे अपने को कुरूप ही मानते हैं; अर्थात जो अच्छे हैं, वे सदा यही मानते हैं कि मेरे में लाखों दोष और ऐब भरे हैं।

प्रेम की उष्मा से भला कौन परिचित नहीं? यह प्रेम ही है, जो हमें सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा देता है। पारस्परिक संबंधों में बाँधता है, एक से एक रिश्तों को जन्म देता है, जो हृदय की विभिन्न भावनाओं को पल्लवित-पुष्पित होने का अवसर देता है। माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, दादा-दादी, मामा-मामी, नाना-नानी, प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी जैसे रिश्तों में संजीवनी भरता है। मित्रता के मूल में भले ही आपसी स्वभाव और विचार की एकरूपता हो, पर उसका आधार हृदय में उमड़ता प्रेम ही है, जो अपने जैसे किसी व्यक्ति से संवाद करना चाहता है, प्रतिरूप के सम्मुख हृदय खोलना चाहता है। निश्चय ही यह प्रेम है, जो हमें आत्मानुशासन में बाँधता है, मन में आस्था-विश्वास भरता है और जीवन में कुछ कर गुज़रने की ठानने में मदद करता है।

जिस प्रकार शारीरिक जीवन की रक्षा के लिए हमें हवा, पानी, भोजन, वस्त्र, घर आदि की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए प्रेम की आवश्यकता होती है। समाज में एक-दूसरे से जुड़ने के लिए हम बड़ों को आदर-सम्मान देते हैं, छोटों को स्नेह देते हैं और बराबर वालों से हार्दिक भावनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। परिवार में इसकी तीव्रता अधिक होती है, पर इसके मूल में प्रेम ही है। प्रेम के अनेक रूप हैं, पर उन सबसे हमें प्रेम होता है, क्योंकि उनसे आत्मीयता होती है। आत्मीयता में एक कल्याणकारी भावना रहती है, जो अनायास होती है और मानवीय मूल्यों की पक्षधर होती है। हमारा हृदय जितना विशाल होता है, हमारा प्रेम उतना ही विस्तार पाता है। फिर हमारे प्रेम की परिधि में परिजन, पुरजन से लेकर सभी देशवासी आ जाते हैं। महामानवों के प्रेम का विस्तार समस्त विश्व के वासी, चेतन-अचेतन और चर-अचर हर किसी तक होता है। फिर न कोई अपना और न पराया। यह प्रेम की उच्च अवस्था है।

प्रेम के बिना जीवन नीरस है। सरसता प्रेम का स्निग्ध स्वरूप है। वह मन को सुंदर लगता है, लुभाता है। प्रेम ही सौंदर्य को देखने की दृष्टि प्रदान करता है। वह सौंदर्य का वरण करता है। उसे कुछ भी असुंदर नहीं भाता, इसलिए वह संसार को सुंदर बनाने का प्रयास करता है। मनुष्य के सौंदर्यबोध के मूल में प्रेम ही है। जब हमारे हृदय में प्रेम होता है तो हमें संसार की हर वस्तु सुंदर लगती है, दूसरों की दृष्टि में वह भले ही सुंदर न हो। उसका आकर्षण मन को प्रफुल्लित करता है। हम शांति और आनंद का अनुभव करते हैं। यदि मन में अशांति हो तो सुंदर वस्तु भी असुंदर लगती है। वह बिलकुल भी आकर्षित नहीं करती। मन उससे उचाट-सा हो जाता है। दुनिया उजड़े चमन की तरह लगती है।

प्रेम जब आँखों से छलकता है तो वह दृश्य संसार का सुंदरतम दृश्य होता है। यह करुणा को प्रेम और सहानुभूति से देखने की दृष्टि है। उसे देखकर हमें उससे प्रेम होता है, भले ही वह अपरिचित ही क्यों न हो। कभी-कभी तो कल्पना के पात्रों से इतनी करुणा होती है कि हमारा प्रेम अटूट बंधन की तरह आजीवन बना रहता है, जैसे कथा-कहानी के पात्र। प्रेमचंद के कई पात्र इस श्रेणी में आते हैं। गोदान का 'होरी', निर्मला की 'निर्मला', सद्गति का 'दुखी', सवा सेर गेहूँ का ‘शंकर’, क़फ़न के 'घीसू-माधो', पंच परमेश्वर की 'खाला' आदि हमारे मानस में हमेशा के लिए छुपे रहते हैं और तनिक चर्चा होने पर वे कारुणिकता के साथ हमारी आँखों के सामने प्रकट हो जाते हैं।

यहाँ प्रेमचंद के एक और विचार को भी समझने की ज़रूरत है। वे कहते हैं, “जो रो नहीं सकता, वह प्रेम भी नहीं कर सकता। रुदन और प्रेम, दोनों एक ही स्रोत से निकले हैं।” बिलकुल सही बात है। सच्चा प्रेम बिना करुणा के नहीं उपजता। रुदन भी करुणा का तीव्रतम रूप है, जो आँसू बनकर झरता है। रुदन में आँसू निकलते हैं तो प्रेम में भी निकलते हैं। दोनों ही करुणा और हृदय की सरलता के द्योतक हैं। एक सरल हृदय का व्यक्ति ही निश्छलता से हँस सकता है और करुणा से रो सकता है। चतुर-चालक व्यक्ति के बस के ये दोनों ही कार्य नहीं। तभी तो कवि-नाटककार प्रसाद जी कहते हैं, "प्रेम चतुर मनुष्यों के लिए नहीं है; वह तो शिशु से सरल हृदयों की वस्तु है।"

हम स्वभाव से सौंदर्य प्रेमी हैं। हम सुंदर से सुंदर चीज़ें देखना चाहते हैं। उसके लिए चाहे हमें कुछ श्रम भी करना पड़े, जेब भी ढीली करनी पड़े। बाल कटाना, हजामत बनवाना या दाढ़ी-मूँछ सेट करवाना, बालों में डाई लगवाना, फेशियल करवाना, मेकअप करवाना इसके उदाहरण हैं। स्त्रियों का घंटों सजना-सँवरना तो मज़ाक का विषय बन चुका है। सुंदर दिखने की चाह में सोने-चाँदी के तरह-तरह के आभूषणों के पीछे स्त्रियाँ पागल-सी रहती हैं लेकिन सौंदर्य का मर्म कुछ और है?

हिंदी के प्रारंभिक निबंधकारों में अग्रगण्य बालकृष्ण भट्ट अपने निबंध, 'सौंदर्य का मर्म' में लिखते हैं, "कौन ऐसा होगा, जो रूपवान नहीं होना चाहता अथवा अपने शरीर में यदि कुछ कब्ज या दोष है तो उसे दूर करने की चेष्टा नहीं करता? कौन ऐसा है, जो घड़ी दो घड़ी की ख़्वाहिश से चेहरे की सफाई और बालों की दृष्टि में नहीं हुआ था। कौन ऐसा होगा, जो अपने को दूसरों से किसी अंश में कभी कुरूप मानता है। यहा, वही मसल ठीक जान पड़ती है कि लोग अपने को उन आँखों से नहीं देखते, जिससे कि और दूसरे उन्हें देखते हैं।

"मनुष्य के इस लालची हृदय में जहाँ नाम की, पदवी की, संतान की, धन की लालसाएँ हैं, वहाँ रूपवान होने की भी अवश्य है। यह पिछली हवस किसी की पूरी हुई है या पूरा होना संभव हो? कभी नहीं। कहने का तात्पर्य है कि रूपवान होने का अभिमान यद्यपि सैकड़ों को है, पर रूप कोई ऐसी वस्तु नहीं है कि उसके फिराक में पड़े रहने से हाथ लग जाए। अब इस सौंदर्य को दो टूक देखिए। आप बाल, दाँत, आँख, चेहरा, स्वभाव ही से बड़े सौंदर्य और रूप की पताका हैं, तब भी उनमें नित्य संस्कार की आवश्यकता है। एक दिन भी आप बालों में कंघी न करें, दाँतों को न माँजें, चेहरे को न धोएँ; देखिए, दूसरे ही दिन वह प्राकृतिक सौंदर्य आपका नष्टप्राय और अस्त-व्यस्त हो जाएगा।

"हमारा प्रयोजन बाहरी रूप-रंग बनाए रखने से नहीं है, जिसकी दुर्दशा हमने भरपूर कह सुनाया, वरन सौंदर्य से हमारा प्रयोजन आंतरिक चरित्र अथवा शील पालन से है और मनोहर का शब्द मनुष्य के चेहरे के वास्ते न करके शील अथवा स्वभाव के लिए हम प्रयोग करते हैं, क्योंकि शारीरिक सौंदर्य पहले तो सबको प्राप्त नहीं है और न यत्न किए जाने से सबको मिल सकता है तब हम क्यों दूसरे प्रकार के सौंदर्य के लिए यत्न न करें! जो थोड़े प्रयत्न में मिल सकता है और न इसके बढ़ने की कुछ अवधि है। जहाँ तक बढ़ाते जाइए, कभी आप यह नहीं कह सकते कि हमारे अधिक अच्छे होने की और गुंजाइश नहीं है। इस शील-पालन के सौंदर्य के विषय में अद्भुत बात देखी जाती है कि जो शील-पालन के सौंदर्य से पूर्ण हैं, वे अपने को कुरूप ही मानते हैं; अर्थात जो अच्छे हैं, वे सदा यही मानते हैं कि मेरे में लाखों दोष और ऐब भरे हैं।”

पुरातन समय से ही जब आदमी में सौंदर्य की चेतना आयी, तबसे ही हर आदमी सुंदर दिखने और किसी भी चीज़ को सुंदर देखने का आदी हो चुका है। घी का लड्डू टेढ़ा भी सुस्वादु होता है, फिर भी उसे गोल बनाया जाता है ताकि सुंदर लगे। बरफ़ी भी इसी तरह चौकोर बनाई जाती है— आयताकार तिरछे काटकर आकर्षक बनाई जाती है। कहने का आशय यह कि बाहरी सौंदर्य प्राप्त करने के लिए मनुष्य को श्रम-परिश्रम भी करना पड़ता है, पर इसका कुछ विशेष औचित्य नहीं। यह क्षण भर की बात है। तमाम साज-सजावट से आप एक नज़र में किसी को सुंदर लग सकते हैं, लेकिन अगर आप में कोई विशेष गुण नहीं है, उच्च चरित्र नहीं है, समाज में किसी के काम आने के लायक़ नहीं हैं, तो आप सुंदर दिखने के बावजूद असुंदर ही सिद्ध हो जाते हैं। सौंदर्य वस्तुतः मन की वह अवस्था है, जो यह दर्शाती है कि किसी वस्तु या कलात्मक कार्य को लेकर संवेदना और भावना किस प्रकार अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती है। दूसरे शब्दों में, कला, संस्कृति और प्रकृति का मन पर प्रतिअंकन ही सौंदर्य है।

प्रश्न उठता है कि हमारा सौंदर्यबोध कैसा है और कैसा होना चाहिए? इसके उत्तर के लिए, आइए जानें कि सौंदर्य को लेकर कतिपय विद्वान क्या कहते हैं?
सौंदर्य क्या है? किसी वस्तु या कृति को देखकर यदि हम यह अनुभूत करें कि वह सुंदर है तो इसके साथ यह प्रश्न भी उत्पन्न होगा कि वह वस्तु या कृति सुन्दर अथवा उदात्त क्यों है? इसके दो पक्ष हैं— एक, उस वस्तु का आस्वाद क्या है और हमारी सौंदर्य-दृष्टि क्या है? किसी कलाकृति के सृजन में स्थिति दूसरी होती है। उससे कलाकार को सृजनात्मकता का आनन्द मिलता है और सहृदय पाठक और दर्शक को रसानुभूति का आनन्द, वह भले ही सौंदर्य के प्रचलित मानकों पर खरी उतरे या नहीं।

कविता, संगीत, अभिनय, नृत्य, चित्र, आदि सभी ललित कलाओं के माध्यम अलग-अलग है किंतु रस की अभिव्यक्ति और अनुभूति सभी कला-रूपों में समान रूप से होती है। काव्य में रस का महत्त्व सर्वोपरि है। कविता चाहे किसी रूप में ही क्यों न हो पर उसमें यदि स्वाभाविक रस नहीं, गति नहीं, सौन्दर्य नहीं, जीवन के लक्षण नहीं तो वह व्यर्थ है। हम अनेक प्रकार के काव्य से गुज़रते हैं, पर कोई-कोई ही हमारे मर्म को सहज ही छू लेता है और हमें आनंद से भर देता है। स्पष्ट है, यह उसका सौंदर्य ही है। लेकिन उसे सहज और स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होना चाहिए। इस प्रसंग में पाश्चात्य कवि, कीट्स का कथन है- "काव्य यदि सहज रूप में नहीं उद्भूत होता, जैसे वृक्ष में पत्तियाँ तो यही अच्छा होगा कि वह उद्भूत ही न हो।"

प्रेमचंद अपने लेख, 'साहित्य का उद्देश्य' में कहते हैं, "हमारी सारी कमज़ोरियों की ज़िम्मेदारी हमारी कुरुचि और प्रेमभाव से वंचित होने पर है। जहाँ सच्चा सौंदर्य-प्रेम है, जहाँ प्रेम की विस्तृति है, वहाँ कमज़ोरियाँ कहाँ रह सकती हैं! जब तक कलाकार ख़ुद प्रेम से छककर मस्त न हो और उसकी आत्मा स्वयं इस ज्योति से प्रकाशित न हो, वह हमें यह प्रकाश क्योंकर दे सकता है!" प्रश्न यह है कि सौंदर्य है क्या वस्तु? प्रकटतः यह प्रश्न निरर्थक-सा मालूम होता है, क्योंकि सौंदर्य के विषय में हमारे मन में कोई शंका-संदेह नहीं। हमने सूरज का उगना और डूबना देखा है, उषा और संध्या की लालिमा देखी है, सुंदर सुगंधि-भरे फूल देखे हैं, मीठी बोलियाँ बोलनेवाली चिड़ियाँ देखी हैं, कल-कल निनादिनी नदियाँ देखी हैं, नाचते हुए झरने देखे हैं— यही सौंदर्य है।

"इन दृश्यों को देखकर हमारा अंतःकरण क्यों खिल उठता है? इसलिए कि इनमें रंग या ध्वनि का सामंजस्य है। बाजों का स्वरसाम्य अथवा मेल ही संगीत की मोहकता का कारण है। हमारी रचना ही तत्त्वों के समानुपात में संयोग से हुई है; इसलिए हमारी आत्मा सदा उसी साम्य तथा सामंजस्य की खोज में रहती है। साहित्य कलाकार के आध्यात्मिक सामंजस्य का व्यक्त रूप है और सामंजस्य सौंदर्य की सृष्टि करता है।"

वे तत्समय के कलाकार की रचना-दृष्टि पर सवाल उठाते हैं, “उनकी (कलाकार की) दृष्टि अभी इतनी व्यापक नहीं कि जीवन-संग्राम में सौंदर्य का परमोत्कर्ष देखें। उपवास और नग्नता में भी सौंदर्य का अस्तित्त्व संभव है, इसे कदाचित वह स्वीकार नहीं करता। उसके लिए सौंदर्य सुंदर स्त्री में है- उस बच्चोंवाली ग़रीब रूपरहित स्त्री में नहीं, जो बच्चे को खेत की मेड़ पर सुलाये पसीना बहा रही है। उसने निश्चय कर लिया है कि रंगे होठों, कपोलों और भौंहों में निस्संदेह सुंदरता का वास है- उसके उलझे हुए बालों, पपड़ियाँ पड़े हुए होठों और कुम्हलाये हुए गालों में सौंदर्य का प्रवेश कहाँ?”

सौंदर्य बाहर की वस्तु नहीं। सौंदर्य क्या है, इस बारे में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कथन महत्त्वपूर्ण है। वे लिखते हैं, “सौंदर्य बाहर की कोई वस्तु नहीं है, मन के भीतर की वस्तु है। जैसे वीरकर्म से पृथक वीरत्व कोई पदार्थ नहीं, वैसे ही सुंदर वस्तु से पृथक सौंदर्य कोई पदार्थ नहीं। कुछ रूप-रंग की वस्तुएँ ऐसी होती हैं, जो हमारे मन में आते ही थोड़ी देर के लिए हमारी सत्ता पर ऐसा अधिकार कर लेती हैं कि उसका ज्ञान ही हवा हो जाता है और हम उन वस्तुओं की भावना के रूप में ही परिणत हो जाते हैं। जिस वस्तु के प्रत्यक्ष ज्ञान या भावना से तदाकार परिणति जितनी ही अधिक होगी उतनी ही वह वस्तु हमारे लिए सुंदर कही जाएगी। इस विवेचन से स्पष्ट है कि भीतर-बाहर का भेद व्यर्थ है। जो भीतर है, वही बाहर है।"

आगे वे कहते हैं, “सौंदर्य का दर्शन मनुष्य मनुष्य में ही नहीं करते, प्रत्युत पल्लव-गुम्फित पुष्पहास में, पंक्षियों के पक्षजाल में, सिंदूराभ सांध्य दिगंचल के हिरण्य-मेखला-मंडित घनखंड में, तुषारावृत्त तुंग-गिरि-शिखर में, चंद्रकिरण से झलझलाते निर्झर में और न जाने कितनी वस्तुओं में वह सौंदर्य की झलक पाता है।” सौंदर्य को लेकर कवियों-साहित्यकारों का क्या रुख़ होना चाहिए, इस पर हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन महत्त्वपूर्ण है, "साहित्य के उपासक अपने पैर के नीचे की मिट्टी की उपेक्षा नहीं कर सकते। हम सारे बाह्य जगत को असुंदर छोड़कर सौंदर्य की सृष्टि नहीं कर सकते। सुंदरता सामंजस्य का नाम है। जिस दुनिया में छोटाई और बड़ाई में, धनी और निर्धन में, ज्ञानी और अज्ञानी में, आकाश-पाताल का अंतर हो, वह दुनिया बाह्य सामंजस्य नहीं कही जा सकती और इसीलिए वह सुंदर भी नहीं है। इस बाह्य असुंदरता के ढूह में खड़े होकर आंतरिक सौंदर्य की उपासना नहीं हो सकती। हमें उस बाह्य असौंदर्य को देखना ही पड़ेगा। साहित्य सुंदर का उपासक है, इसलिए साहित्यिक को असामंजस्य को दूर करने का प्रयत्न पहले करना होगा; अशिक्षा और कुशिक्षा से लड़ना होगा; भय और ग्लानि से लड़ना होगा।"

यहाँ यह बात सीधे-सीधे जुड़ती है कि सौंदर्य वास्तव में मनुष्य की मनःस्थिति पर निर्भर करता है। यदि किसी के मन में किसी बात को लेकर उथल-पुथल मची हो, तो उसे सुंदर से सुंदर वस्तु भली न लगेगी। भूखे आदमी का सौंदर्य रोटी में बसता है, पुष्प का सौंदर्य उसे न भाएगा। कहावत भी है कि जब पेट भरा हो तो सब भला लगता है- 'भूखे भजन न होए गुपाला।' यहाँ मार्क ट्वेन का यह कथन भी महत्त्वपूर्ण है, "अगर ज़ेहन संतुलित हो तो हर वस्तु में सौंदर्य होता है और अगर ये संतुलन न हो तो सुंदर से सुंदर वस्तु भी ग़ुस्सा जगा सकती है।"

सौंदर्य स्वयं कोई भाव नहीं, वह हमारे मन की अवस्था और दृष्टिकोण पर निर्भर है। हमारी दृष्टि यदि व्यापक है तो दृश्यमान वस्तुएँ विस्तार पाती हैं और सौंदर्य ग्रहण करती हैं। इसलिए संसार में सौंदर्य की खोज के लिए ज़रूरी है कि हमारा मन सुंदर हो। यहाँ पश्चिमी विचारक एमर्सन का कथन प्रासंगिक है, "सुंदरता की खोज में हम चाहे संसार का चक्कर लगा आएँ, वह अगर हमारे अंदर नहीं है तो कहीं नहीं मिलेगी।"

यहाँ यह भी देखने वाली बात है कि सौंदर्य को देखने का हमारा दृष्टिकोण क्या है? हम जिससे अपनापन रखते हैं, प्रेम करते हैं; वह हमें सुंदर लगता ही है। वह चाहे कोई व्यक्ति हो या वस्तु। अपनी प्रेमिका को छोड़ प्रेमी को कोई स्त्री सुंदर नहीं लगती, कोई और नहीं भाती, भले ही वह सामान्य या प्रचलित अर्थ में बिलकुल सुंदर न हो। औरों की दृष्टि में वह कुरूप तक हो सकती है। लैला-मजनू की प्रेम-कथा सारी दुनिया में मशहूर है। सुनते हैं कि लैला साँवले रंग की थी और उसके नक़्श-नैन भी अति साधारण थे। कहने का अर्थ यह कि वह ‘सुंदर’ नहीं थी। फिर भी मजनू उसी पर फ़िदा था, उसे ख़ुदा की तरह चाहता था, उसके प्रेम में पागल था। तभी तो लोक में यह कहावत, भले ही थोड़ी भोंडी है परंतु चल पड़ी है : 'दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज़ है?'

पति-पत्नी में अगर सच्चा प्रेम हो तो एक-दूसरे से अधिक सुंदर दुनिया में कोई जोड़ा नहीं। माँ-बाप को अपने बच्चे से अधिक कोई प्यारा नहीं, वही सबसे सुंदर है- भले ही सामान्य दृष्टि से वह सुंदर हो, न हो। एक अति साधारण नक्श-नैन और काले रंग के बच्चे को भी माँ नहला-धुला कर, तेल-फुलेल लगाकर उसके माथे पर काला टीका लगाती है ताकि किसी की नज़र न लगे। यहाँ सुंदरता का पैमाना छलकता हुआ प्रेम है। इसी प्रकार किसी बच्चे के लिए माँ से अधिक सुंदर कोई नहीं। शिशु जब माँ की गोदी में उसका दूध पीना शुरू करता है तो माँ का चेहरा ही और उसकी आवाज़ पहचानता है और माँ की गोदी में सुरक्षित महसूस करता है। किसी और के पास जाने पर रोने लगता है। उसके लिए उसकी माँ से सुंदर दुनिया में कोई नहीं है।

एक किशोर, जिसकी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति उसके पिता द्वारा की जाती है, उसके लिए पिता से अधिक कोई आदमी सुंदर नहीं। यहाँ सुंदरता का संबंध उपयोगिता के सिद्धांत से जुड़ जाता है। बच्चों के अप्रिय व्यवहार, पढ़ाई-लिखाई न करने या अधिक शैतानी करने पर उसके माता-पिता और गुरु आदि प्रायः कठोर बर्ताव करते हैं, पर इसके बावजूद उनके हृदय में पलता नैसर्गिक प्रेम कम नहीं हो जाता। यह बच्चों सहित घर-बाहर के सभी लोग समझते हैं। फिर ये स्थितियाँ सदैव के लिए नहीं रहतीं। बच्चों में जब दुनियादारी की समझ पैदा होती है, तो उसके मन में माता-पिता और गुरु के प्रति सम्मान और आत्मीयता का भाव जाग्रत हो जाता है, जो आजीवन रहता है।

जब हमारा आत्मीय बोध विस्तृत हो जाता है तो हमारा मानवीय बोध अधिक प्रबल हो उठता है। हमारी दृष्टि व्यापक हो जाती है। हृदय में स्वार्थ, वैमस्य आदि के लिए कोई स्थान नहीं रहा जाता। ऐसे में सौंदर्य के वे मानक पुष्ट होने लगते हैं, जो प्रेम पर आधारित होते हैं। हमारा सौंदर्यबोध परिष्कृत हो जाता है। हमारे मानवीय मूल्य वैश्विक और प्राणीमात्र से संलग्न हो जाते हैं। प्रेम का विस्तार स्वार्थ की सीमाएँ तोड़ देता है और स्वार्थ-साधना तुच्छ लगने लगती है। ऐसे में सभ्यता के आवरण से ढँके हुए सौंदर्य के बने-बनाए मानक व्यर्थ प्रतीत होने लगते हैं। तथाकथित असुंदर प्राणी, वस्तु या दृश्य भी सुंदर लगने लगती हैं। गंदी नाली में लोटता सूअर और किल्लोल करते उसके बच्चे नैसर्गिक रूप से सुंदर लगने लगते हैं। प्राणीमात्र से सहज प्रेम इन्ही दशाओं में होता है। तब संसार में कुछ भी असुंदर नहीं दिखता। कोई भी घृणा का पात्र नहीं होता। यहाँ जनकवि नागार्जुन की एक कविता के अंशों का उद्धरण अप्रासांगिक न होगा। वे मादा सूअर को मादरे-हिंद का दर्जा देते हैं। पंक्तियाँ देखें-

पैने दाँतोंवाली
धूप में पसरकर लेटी है
मोटी-तगड़ी अधेड़ मादा सूअर

जमना-किनारे
मख़मली दूबों पर
पूस की गुनगुनी धूप में
पसरकर लेटी है
यह भी तो मादरे-हिन्द की बेटी है
भरे-पूरे बारह थनोंवाली!

लेकिन अभी इस वक़्त
छौनों को पिला रही है दूध
मन-मिजाज़ ठीक है
कर रही है आराम
अखरती नहीं है भरे-पूरे थनों की खींच-तान
दुधमुँहे छौनों की रग-रग में
मचल रही है आख़िर माँ की ही तो जान!
जमना-किनारे
मख़मली दूबों पर पसरकर लेटी है
यह भी तो मादरे-हिन्द की बेटी है!

सौंदर्य को बाह्य आभूषणों की आवश्यकता नहीं। वह जब तक अनाभूषित है, स्वयं आभूषित है। यह नैसर्गिक सौंदर्य ही मूल्यवान है। हमें किसी वस्तु को उसी रूप में देखना और सराहना चाहिए, जैसे प्रकृति ने उसे बनाया है। यही प्रकृति से तादात्म्य है। गुलाबी रंग के फूल को आप गाढ़े लाल से नहीं रंग सकते। कोशिश करने पर वह अपना सौंदर्य खो देगा और आपका प्रयास भी हास्यास्पद सिद्ध होगा। सफेद रंग की बेला को किसी रंग में हम नहीं देखना चाहते। चटख लाल रंग का गुड़हल अथवा कनेर का पीला फूल ही आँखों को भाता है। उसकी शोभा उसी रंग-रूप में है, जो प्रकृति ने उसे प्रदान किया है।

सौंदर्य सदैव सामंजस्य में होता है। जब हम कहते हैं कि कोई दृश्य सुंदर है तो उसका अर्थ यह है कि जो भी चीज़ें दृश्य विशेष में दिख रही हैं- आकार में वे संतुलित ढंग से हैं- न छोटी, न बड़ी, न अधिक लम्बी या चौड़ी- सभी सटीक अनुपात में हैं। रंग-संयोजन भी अच्छा है। बे-ढंगे चित्र या रेखांकन कार्टून को जन्म देते हैं। लेकिन इसका अपवाद भी हैं। सौंदर्य जब प्रेम, आनंद अथवा सत्य के सापेक्ष होता है तो उसका स्वरूप बदल जाता है। वह भौतिक स्वरूप तक सीमित नहीं रह जाता। कोई संज्ञा भले कितनी ही बे-ढंगी हो, बने-बनाए ढाँचे के विपरीत हो लेकिन जब वह मन की आँखों से देखी जाती है तो उसके मानक बदल जाते हैं। किसी वस्तु या प्राणी के प्रति जब मन में प्रेम होता है तो उसमें सौंदर्य की प्रतिष्ठा स्वमेव हो जाती है। प्रेम के बढ़ने के साथ उसके सौंदर्य में भी वृद्धि होती है। इसलिए ही कहा गया है कि सौंदर्य का माधुर्य कभी कम नहीं होता, वह निरंतर बढ़ता रहता है। हमें सौंदर्य को समझने की ज़रूरत है।

सौंदर्य यदि सत्य का बोध नहीं कराता तो वह व्यर्थ है। संसार में सुंदर क्या है? सुंदर वह वस्तु है, जो आनंद प्रदान कराए, चित्त को शांत रखे और वह शाश्वत सत्य का अंग भी हो। स्वार्थ या काम-वासना के वशीभूत हमें यदि कोई व्यक्ति या वस्तु सुंदर लगती है तो ज़रूरी नहीं कि वह सुंदर ही हो। देखना होगा कि उसमें सत्य का अंश कितना है? किसी वस्तु या जीव को देखकर हमारे मन में यदि किंचित प्रेम नहीं उपजता, हर्ष नहीं उपजता अथवा सत्य का बोध नहीं होता तो वह क्योंकर सुंदर हो सकती है?

प्रेमचंद एक जगह लिखते हैं, "जो वस्तु आनंद नहीं प्रदान कर सकती, वह सुंदर नहीं हो सकती; और जो सुंदर नहीं है, वह सत्य भी नहीं हो सकती।” इस प्रकार वे सत्य, आनंद और सौंदर्य को एक साथ प्रतिष्ठित करते हैं। यह सत्यं-शिवं-सुंदरं को आसानी से समझने और जीवन में उतारने की बात है।

वास्तव में सत्य ही सौंदर्य है और सौंदर्य ही सत्य, पर इसे न केवल समझने की आवश्यकता है बल्कि व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। लेकिन इसकी समझ प्रेम के बिना कैसे आएगी? इसलिए जब हम प्रेम को प्राथमिकता देंगे, तब सत्य और सुंदर स्पष्ट होते जाएँगे। जीवन शील से सुंदर और सार्थक बनता है। कला और साहित्य उसमें प्रेरक और सहायक की भूमिका निभाते हैं। कला चाहे जिस क्षेत्र की हो, उससे सत्य का सौंदर्य निखरता ही है, मनुष्य-भाव तीव्रतर होता है और मूल्य प्रतिष्ठित होता है। कहना न होगा कि कला के केंद्र में मनुष्य है और उसका अंतिम लक्ष्य सौंदर्य की सृष्टि है। उसका उत्स सत्य से अवश्य हुआ है पर उद्देश्य सौंदर्य की सच्ची परख के साथ मनुष्यता की रक्षा है।

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KP Anmol

15 October 2025

एक उच्च श्रेणी का सार्थक ललित निबंध। पढ़कर बहुत कुछ सीखा-जाना।

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रचनाकार परिचय

राजेन्द्र वर्मा

ईमेल : rajendrapverma@gmail.com

निवास : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 8 नवम्बर 1957
जन्मस्थान- बाराबंकी (उ.प्र.) के एक गाँव में
प्रकाशन-
पाँच ग़ज़ल संग्रह, तीन गीत/नवगीत-संग्रह, दो दोहा-संग्रह, दो हाइकु-संग्रह, ताँका, पद, और सात व्यंग्य-संग्रह,
निबंध, उपन्यास, कहानी, लघु कहानी, लघुकथा, आलोचना, काव्य-शास्त्र सहित तीन दर्ज़न पुस्तकें प्रकाशित।
महत्वपूर्ण संकलनों में सम्मिलित।
संपादन-
हिंदी ग़ज़ल के हज़ार शेर, गीत-शती, गीत-गुंजन।
साहित्यिक पत्रिका अविरल मंथन (1996-2003)
पुरस्कार/ सम्मान-
उ.प्र.हिन्दी संस्थान के श्रीनारायण चतुर्वेदी और महावीरप्रसाद द्विवेदी नामित पुरस्कारों सहित देश की अनेक
संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
अन्य।
विशेष- लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा रचनाकार पर एम फिल.।
अनेक शोधग्रन्थों में संदर्भित। चुनी हुई कविताओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद।
एक निबंध स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम में सम्मिलित।
सम्पर्क- 3/29 विकास नगर, लखनऊ 226 022 (मो. 80096 60096)