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प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की पंद्रहवीं कड़ी

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की पंद्रहवीं कड़ी

समीर जब शिखा के चेहरे पर अनायास आई मुस्कुराहट की वजह पूछता तो शिखा उसे अधिकांशतः कुछ भी बोलकर टाल जाती थी, पर कभी सच भी बोल देती थी कि प्रखर की किस बात पर हँसी है। समीर भी कई बार उसकी बातों पर मुस्कुराता था, और शिखा के पूछने पर बता देता था। पर तीनों किस बात पर क्यों हँस रहे हैं, यह वजह सबकी बहुत अपनी थी। कुल मिलाकर तीनों की ज़िंदगी रिटायर होने के बाद भी बहुत रफ़्तार से चलने लगी थी।

एक लंबे अरसे बाद दोनों फिर से रिटायर होने के बाद अब मिले थे। वो भी उम्र के उस पड़ाव पर, जहाँ हर आता दिन कभी भी ज़िंदगी में पूर्ण-विराम के लगने की ओर इशारा कर रहा था, और दूसरी ओर ज़िंदगी, शेष समय को जितना भी संग-साथ मिले, उसमें बहुत जीए-सा महसूस करना चाहती थी। दोनों ने जो धैर्य एक-दूसरे से बिछड़ने के बाद सारी उम्र रखा था। शायद उसी के उपहारस्वरूप दोनों एक-दूसरे के पड़ोसी बने थे। अब इसकी भी मर्यादा रखना दोनों की ही ज़िम्मेदारी थी। आज एक बार फिर अतीत ने दोनों को पूरी रात का जागरण करवा दिया था।

अगले दिन जब शिखा अपने छोटे-से बगीचे में पानी लगा रही थी तभी प्रखर बाहर आया और बाउंड्री पर आकर शिखा से बोला-
"रात सो पायी तुम शिखा! इतने सालों बाद तुम्हारा मिलना, अब ईश्वर कौनसी परीक्षा चाहता है इस उम्र में? तुमसे मिलने के बाद आजकल बार-बार अतीत में पहुँच जाता हूँ। तुमसे एक बात और साझा करना चाहता हूँ। तुम्हारा नंबर मैं कभी डिलीट नहीं कर पाया। वो हमेशा से पहले डायरी में फिर मोबाइल में रहा। तुम्हारी किसी भी चीज़ को मैं अपनी ज़िंदगी से पूरी तरह डिलीट नहीं करना चाहता था। तुम्हारे हाथों से लिखी गयी वो कविता, जिसे मैं दिल के पास वाली पॉकेट में सहेजकर लाया था, आज भी मेरे पास है। जिसने मुझे महसूस करवाया, हम कभी दूर जाकर भी दूर नहीं होंगे। तुम्हारा नंबर हो या तुम्हारी कविता, मुझे तुम्हारे बहुत पास होने के अहसास हमेशा देते रहे। हमेशा लगता था विदा लेने से पहले शायद कभी एक बार...। शिखा यही छोटी-छोटी बातें हमें ज़िंदा रखती हैं, सच में।... और शायद इन्हीं बातों के सहारे इतना लंबा जीवन कट गया।"

"ओह! बहुत प्यारे हो तुम प्रखर! तुम तो मेरे से ज़्यादा मज़बूत निकले। मैंने तो तुम्हारा नंबर इसलिए अपने पास से हटा दिया था क्योंकि मैं अपने दिल को बहुत दिनों तक तुमसे बात न करने के लिए रोक नहीं पाती। ख़ैर सो नहीं पायी प्रखर सारी रात मैं। समीर पूछ भी रहे थे, क्यों नहीं सो रही हो। उनसे यही कहा कि शायद रात के समय चाय पी ली है, नींद ग़ायब हो गई है। अभी तो मेरा दिमाग़ भी काम नहीं कर रहा। बस तुम ही तुम घूम रहे हो, पर मैं नहीं चाहती कोई हमारे रिश्ते को ग़लत समझे।"

"सच कहा तुमने शिखा। मैं तो अकेले रहता हूँ, तुम्हारे तो पति साथ हैं। बस एक काम करोगी, हर रोज़ सवेरे जब पानी लगाने आओगी तब मुझे अपना चेहरा ज़रूर दिखा देना। ईश्वरने यह संजोग शायद इसलिए बनाया हो कि मरने से पहले तुमको देखता-देखता मरूँ।"

"तुम सच में आज भी पागल हो प्रखर! हाँ, ध्यान रखूँगी। अब मैं भी हमेशा तुम्हें महसूस करना चाहती हूँ।”

इसके बाद रोज़ ही एक-दूसरे का चेहरा देखकर 'गुड मॉर्निंग' कहने का क्रम बन गया। प्रखर और शिखा के दिन की शुरुआत इसी के साथ होती थी। सवेरे एक दूसरे को मिलने और देखने की ख़ुशी दोनों को बहुत आत्मीय से आगोश में बाँध लेती।

समीर जब शिखा के चेहरे पर अनायास आई मुस्कुराहट की वजह पूछता तो शिखा उसे अधिकांशतः कुछ भी बोलकर टाल जाती थी, पर कभी सच भी बोल देती थी कि प्रखर की किस बात पर हँसी है। समीर भी कई बार उसकी बातों पर मुस्कुराता था, और शिखा के पूछने पर बता देता था। पर तीनों किस बात पर क्यों हँस रहे हैं, यह वजह सबकी बहुत अपनी थी। कुल मिलाकर तीनों की ज़िंदगी रिटायर होने के बाद भी बहुत रफ़्तार से चलने लगी थी।

दोनों परिवारों के बीच मेल-जोल भी काफ़ी बढ़ गया। कभी प्रखर शिखा के यहाँ आ जाते तो कभी यह दोनों प्रखर के यहाँ चले जाते। ख़ूब बातें, गप्पें होतीं। प्रखर हमेशा ध्यान रखते कि कभी रिश्तों की गरिमा ख़राब न हो। एक साल से ऊपर बहुत अच्छे से गुज़र चुका था। प्रखर अक्सर ही अपनी पत्नी प्रीति की बातें समीर और शिखा से साझा करते।

इतने ऊँचे ओहदे पर काम करने से प्रखर में बातचीत करने का ग़ज़ब सलीक़ा आ गया था। उसकी बातें किसी का भी मन मोहने में सक्षम थी। शायद तभी समीर भी उससे इतनी बातें कर पाते थे। समीर की फ़िजूल में बातें करने की आदत नहीं थी। न ही ऐसे लोगों की संगत उन्हें पसंद थी। गिनती के दोस्तों में उनका अच्छे से गुज़ारा होता था।

एक दिन प्रखर ने समीर को बताया कि उसका बेटा चाहता है कि अब वो भी उसके पास पहुँच जाए। चूँकि उन्होंने प्रीति के जाने के बाद कुछ समय उसकी यादों के साथ गुज़ारने को कहा था, पर अब प्रीति को गए हुए भी काफ़ी समय हो चुका है। प्रणय को लगता है कि उसे अब बेटे के पास पहुँच जाना चाहिए।

प्रखर की बात सुनकर समीर का मन बहुत छोटा-सा हो गया। इतने सालों बाद उसे प्रखर जैसा मित्र मिला था। आज उसकी बातें सुनकर समीर ने प्रखर से पूछा- "फिर क्या सोच रहे हो प्रखर? अब यह मत बोलना कि मुझे और शिखा को छोड़कर जा रहे हो।"

प्रखर ने मुस्कुराते हुए कहा- "बहुत अच्छा बेटा है समीर मेरा। पर वहाँ जाकर मेरा भी जी नहीं लगता। समझ नहीं आ रहा क्या करूँ! जाने न जाने जैसे दोनों ख़याल साथ-साथ चलते है। कभी लगता है कि जिस ओल्ड ऐज की ओर बढ़ रहा हूँ। किसी रोज़ दिक्कत हो गई तो सब बोलेंगे बेटे के पास जाना चाहिए था। पर नहीं, अब मन नहीं है। अब तुम दोनों को छोड़कर भी कहीं जाने का मन नहीं करता।" अपनी बात रखकर प्रखर ने शिखा की ओर देखा। शिखा ने उसके मन की बात भाँपते हुए अपने चेहरे को घुमा लिया।

अगले दिन सवेरे जब दोनों गार्डन में पानी लगाते हुए मिले तो शिखा ने बॉउन्ड्री पर आकर धीमे से कहा- “प्रखर! तुम सच में बेटे के कहने से उसके पास चले तो नहीं जाओगे?”
प्रखर ने असहमति में सिर हिलाकर कहा- "शिखा! तुम्हें देखते हुए मरना चाहता हूँ। कहीं नहीं जाऊँगा शिखा मैं।...खोकर फिर से मिली हो.....अब जान-बूझ कर कहीं नहीं जाऊँगा। अभी स्वस्थ हूँ, मुझे कोई दिक्कत भी नहीं। काका-काकी के होने से घर भी बहुत अच्छे से चलता है। वो दोनों भी मुझे छोड़कर नहीं जाना चाहते।"

आज शिखा को कहीं भीतर से महसूस हुआ कि उसकी खोई हुई धड़कनें वापस चलने लगी हैं। कोई है, जो सिर्फ़ उसके लिए आज भी जीना चाहता है। कल रात जब प्रखर ने प्रणय की इच्छा बताई थी, तबसे ही शिखा मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि कहीं प्रखर ने जाने की तैयारी न कर ली हो।

प्रखर की बात सुनकर शिखा ने सिर हिलाकर अपनी सहमति जताई, और कहा- "अब मेरे से दूर मत जाना प्रखर! अब तुम्हारा दूर जाना मुझे उम्र से पहले ही न मार दे। तुम्हें आसपास महसूस करके भी बहुत संतुष्टि मिल जाती है।"
तब प्रखर ने चुपके-से शिखा से बोला- "काश! इस समय तुम्हें मैं गले लगा पाता। बरसों-बरस पहले जो पल तुम्हारे साथ ठहर गये थे, आज भी उनका स्पर्श मेरे साथ है शिखा।"

सवेर-सवेरे एक-दूसरे को महसूस कर दोनों जल्द ही वापस मिलने का वादा कर अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए।

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रचनाकार परिचय

प्रगति गुप्ता

ईमेल : pragatigupta.raj@gmail.com

निवास : जोधपुर (राजस्थान)

जन्मतिथि- 23 सितंबर, 1966
जन्मस्थान- आगरा (उत्तरप्रदेश)
शिक्षा- एम०ए० (समाजशास्त्र, गोल्ड मैडलिस्ट)
सम्प्रति- लेखन व सोशल-मेडिकल क्षेत्र में काउंसिलिंग
प्रकाशन- तुम कहते तो, शब्दों से परे एवं सहेजे हुए अहसास (काव्य-संग्रह), मिलना मुझसे (ई-काव्य संग्रह), सुलझे..अनसुलझे!!! (प्रेरक संस्मरणात्मक लेख), माँ! तुम्हारे लिए (ई-लघु काव्य संग्रह), पूर्ण-विराम से पहले (उपन्यास), भेद (लघु उपन्यास), स्टेप्लड पर्चियाँ, कुछ यूँ हुआ उस रात (कहानी संग्रह), इन्द्रधनुष (बाल कथा संग्रह)
हंस, आजकल, वर्तमान साहित्य, भवंस नवनीत, वागर्थ, छत्तीसगढ़ मित्र, गगनांचल, मधुमती, साहित्य भारती, राजभाषा विस्तारिका, नई धारा, पाखी, अक्षरा, कथाबिम्ब, लमही, कथा-क्रम, निकट, अणुव्रत, समावर्तन, साहित्य-परिक्रमा, किस्सा, सरस्वती सुमन, राग भोपाली, हिन्दुस्तानी ज़ुबान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, नई दुनिया, दैनिक नवज्योति, पुरवाई, अभिनव इमरोज, हिन्दी जगत, पंकज, प्रेरणा, भारत दर्शन सहित देश-विदेश की लगभग 350 से अधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन और अनुवाद।
कविता अनवरत, कविता अभिराम, शब्दों का कारवां, समकालीन सृजन, सूर्य नगरी की रश्मियाँ, स्वप्नों की सेल्फ़ी, कथा दर्पण रत्न, छाया प्रतिछाया, सतरंगी बूंदें, संधि के पटल पर आदि साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
प्रसारण-
जयपुर दूरदर्शन से चर्चा व आकाशवाणी से सृजन का नियमित प्रसारण
सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में कविता का स्थान विषय पर टी.वी. पर एकल साक्षात्कार
संपादन- अनुभूतियाँ प्रेम की (संपादित काव्य संकलन)
विशेष-
राजस्थान सिन्धी अकादमी द्वारा कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' का अनुवाद।
कहानियों और कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' पर शोध।
प्रतिष्ठित कथा प्रधान साहित्यिक पत्रिका 'कथाबिम्ब' के संपादक मण्डल में क्षेत्रवार संपादक
कहानियों व कविताओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद
हस्ताक्षर वेब पत्रिका के लिए दो वर्ष तक नियमित 'ज़रा सोचिए' स्तंभ
सम्मान/पुरस्कार-
हिंदी लेखिका संघ, मध्यप्रदेश (भोपाल) द्वारा 'तुम कहते तो' काव्य संग्रह पर 'श्री वासुदेव प्रसाद खरे स्मृति पुरस्कार' (2018)
'अदबी उड़ान काव्य साहित्य पुरस्कार' काव्य संग्रह तुम कहते तो और शब्दों से परे पुरस्कृत व सम्मानित (2018)
साहित्य समर्था द्वारा आयोजित अखिल भारतीय 'डॉ० कुमुद टिक्कू कहानी प्रतियोगिता' श्रेष्ठ कहानी पुरस्कार (2019 और 2020)
विद्योत्तमा फाउंडेशन, नाशिक द्वारा 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' कहानी संग्रह 'विद्योत्तमा साहित्य सम्राट सम्मान' से पुरस्कृत (2021)
श्री कमल चंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता प्रथम पुरस्कार 2021
कथा समवेत पत्रिका द्वारा आयोजित 'माँ धनपति देवी स्मृति कथा साहित्य सम्मान' 2021, विशेष सम्मान व पुरस्कार
लघु उपन्यास भेद पुरस्कृत मातृभारती 2020
विश्व हिंदी साहित्य परिषद द्वारा 'साहित्य सारंग' से सम्मानित (2018)
अखिल भारतीय माथुर वैश्य महासभा के राष्ट्रीय सम्मेलन में 'समाज रत्न' से सम्मानित (2018)
डॉ० प्रतिमा अस्थाना साहित्य सम्मान, आगरा (2022)
कथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा राज्य स्तरीय सम्मान 'रघुनंदन त्रिवेदी कथा सम्मान' स्टेपल्ड पर्चियांँ संग्रह को- 2023
पंडित जवाहरलाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी, राजस्थान द्वारा 'इंद्रधनुष' बाल कथा संग्रह को 'बाल साहित्य सृजक' सम्मान 2023 
जयपुर साहित्य संगीति द्वारा 'कुछ यूँ हुआ उस रात' को विशिष्ट श्रेष्ठ कृति सम्मान 2023
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