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शिवानी शान्तिनिकेतन की कहानी 'संदूक'

शिवानी शान्तिनिकेतन की कहानी 'संदूक'

उसी रात एक तीखी बहस की आवाज़ सुनीता के कानों में पड़ी, जो कि उसके बेटे-बहु के कमरे से आ रही थी। उसे पता था कि इस बहस का कारण वही है। उसे लग गया था कि शायद अपने बाप की तरह अनिकेत को भी उसका डांसर होना पसंद नहीं आया। वह चुपचाप अपने कमरे में लौट आयी। उसने सोच लिया था, जो शौक़ उसके घर के कलह का कारण बने, उसे वह जड़ से ही ख़त्म कर देगी।


बेटे अनिकेत और बहू सुप्रिया को आता देख सुनीता ने झट-से अपना संदूक बंद कर दिया। उन दोनों को कोई आश्चर्य न हुआ क्योंकि माँ पहले भी कई बार ऐसा कर चुकी थी। जब घर में सन्नाटा होता या वह कुछ परेशान होती तो बस अपना संदूक खोलकर बैठ जाती लेकिन किसी की आहट मिलते ही तुरंत उसे ताले के हवाले कर देती। वैसे तो सुनीता का कमरा व अलमारियाँ किसी ताले की मोहताज़ नहीं थी लेकिन न जाने क्यों वो एक पुराने-से संदूक को हमेशा ताले की नज़र में रखती।

"माँ..! फिर आपने हमको आता देख अपना पिटारा बंद कर दिया। आख़िर क्या है इसमें ऐसा, जो आप किसी को देखने नहीं देतीं। अरे मुझें न सही कम से कम अपने बेटे को ही बता दीजिए।" सुप्रिया ने ताने मारते हुए कहा।
"कुछ नहीं है बच्चो! बस कुछ इधर-उधर का सामान है। तुम्हारे देखने वाली कोई चीज़ नहीं है।" संदूक को बेड के नीचे खिसकाते हुए सुनीता बोली। लेकिन बेटे को भी माँ की बात हज़म नहीं हुई। उसने तुरंत पलटकर कहा, "इधर-उधर की चीज़ों को भला कोई इतना सहेजकर रखता है क्या? जबकि आपके गहने और दूसरी क़ीमती चीज़ें ऐसे ही अलमारी में पड़ी हुई हैं। आज आपको बताना ही पड़ेगा माँ कि इसमें क्या है? ऐसी कौनसी चीज़ है, जो आप हमको नहीं बताना चाहती हैं?" कहते हुए अनिकेत ने माँ के हाथों से चाभी ले ली। सुनीता के बहुत मना करने के बावजूद भी उसने संदूक का ताला खोल दिया।

अनिकेत को लगा कि संदूक में कुछ क़ीमती सामान होगा लेकिन उसमें तो कुछ पेपर की कटिंग्स पड़ी थीं, साथ ही माँ की कुछ फोटोग्राफ्स, जिसमें वे परंपरागत डांस की मुद्रा में थीं। साथ में कुछ सर्टिफिकेट्स और कुछ छोटी-मोटी ट्रोफ़ियाँ भी रखी थीं। अनिकेत के साथ सुप्रिया हैरानी से उनको देखने व पढ़ने लगी।

"माँ! आप एक क्लासिकल डांसर थी?" अनिकेत ने हैरानी से माँ की ओर देखते हुए पूछा।
"डांसर थी नहीं बेटा! आज भी हूँ, लेकिन अब ये शौक़ मेरे मन में दब के रह गया है।" कहते हुए सुनीता की आँखें नम हो गयीं।
"लेकिन क्यों माँ!" अनिकेत ने ट्रॉफी को हाथ में लेते हुए कहा।
"अब जो बीत गया, सो बीत गया। पुरानी बातों को अब दोहराने से क्या फ़ायदा।" सुनीता ने उसके हाथ से ट्रॉफी लेकर वापिस संदूक में रख दी।

सुनीता का रूखा व्यवहार देखकर इस बार सुप्रिया बोली, "ये सब देखकर तो लग रहा है कि आप एक बड़े स्तर की डांसर थीं। ये सब तो किसी न किसी कॉम्पटीशन की फोटो व कटिंग्स है, जिसमें आपने कुछ न कुछ प्राइज़ जीता है, लेकिन आपने इन सबको इतना छिपाकर क्यों रखा है?"

सुप्रिया की बात पर सुनीता ने एक लंबी साँस भरते हुए कहा, "तुम्हारे पिताजी की वजह से। उन्हें नहीं पसंद था कि एक ऊँचे अफ़सर की बीबी स्टेज पर परफॉर्म करे। जबकि उन्होंने मेरा डांस देखकर ही मुझे पसंद किया था। खैर उन्हें नहीं पसंद था तो मैंने भी अपने शौक़ को दबा लिया।"
"पर मम्मी जी! अब तो पापाजी हमारे बीच नहीं हैं। अब तो आप अपने मन की दबी हुई इच्छा को पूरा कर सकती हैं।" सुप्रिया बोली, लेकिन अनिकेत चुप रहा। सुनीता ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसे डांस का बचपन से ही शौक़ था इसीलिए उसने कत्थक में प्रवीण की डिग्री हासिल की और बड़े-बड़े मंचों पर अपने डांस का जलवा बिखेरने लगी। बड़े-बड़े सांस्कृतिक प्रोग्रामों में उसकी परफॉर्मेंस के बगैर वह आयोजन अधूरा-सा लगता। ऐसे ही एक बड़े मंच पर शहर के एक बड़े अधिकारी उस पर मोहित हो गये और जल्द ही वह एक बड़े अधिकारी की पत्नी कहलाने लगी। शादी के बाद एक-दो परफॉर्मेंस देते ही उसके पति को उसका इस तरह सबके बीच मशहूर हो जाना पसंद नहीं आया और उसने भी अपने रिश्ते को बचाने के लिए अपने जुनून से समझौता कर लिया और अपनी तरक्की के चिह्नों को ताले में क़ैद कर लिया।

उसी रात एक तीखी बहस की आवाज़ सुनीता के कानों में पड़ी, जो कि उसके बेटे-बहु के कमरे से आ रही थी। उसे पता था कि इस बहस का कारण वही है। उसे लग गया था कि शायद अपने बाप की तरह अनिकेत को भी उसका डांसर होना पसंद नहीं आया। वह चुपचाप अपने कमरे में लौट आयी। उसने सोच लिया था, जो शौक़ उसके घर के कलह का कारण बने, उसे वह जड़ से ही ख़त्म कर देगी।

दूसरे दिन सुप्रिया सुनीता के कमरे में आती हुई बोली, "मम्मीजी! मुझे आपके संदूक की चाभी चाहिए।"
सुनीता थोड़ी हैरान हुई। उसने हिचकिचाते हुए संदूक की चाभी उसे दे दी। सुप्रिया ने सभी चीज़ों को बाहर निकाला और ट्रॉफीज़ को ले जाकर ड्राइंगरूम में और दूसरी चीज़ों के बीच सजा दिया।

"ये क्या बहू! इसकी जगह यहाँ नहीं है। इसको वहीं वापिस मेरे संदूक में डाल दो। आज ही मैं इन सबको आग लगा दूँगी। मुझे पता है, अनिकेत को भी ये सब पसंद नहीं है।"
"नहीं मम्मीजी, इसकी सही जगह तो यही है और अभी तो मैं आपके सर्टिफिकेट को भी फ्रेम कराकर यही रखूँगी। और रही अनिकेत की बात तो उन्होंने आपके लिए कुछ और सोचकर रखा है, ओर वो मैं आपको अभी नहीं बता सकती।"
"अनिकेत ने भला मेरे लिए क्या सोच होगा?" सोचते हुए सुनीता आश्चर्य में पड़ गयी।

कुछ दिनों बाद अनिकेत और सुप्रिया उसे पास के ही एक घर में ले गये, जहाँ 'घुंघुरू डांस एकेडमी' का बोर्ड लगा हुआ था और नीचे सुनीता का नाम पड़ा था। सुनीता अचम्भे से उन दोनों की तरफ देखने लगी।

"यक़ीन नहीं हो रहा है न! ये आईडिया अनिकेत का ही है। मुझे लगा कि आप कोई डांस एकेडमी जॉइन कर लें और वहाँ जाकर क्लासेज़ ले सकती हैं। लेकिन अनिकेत ने ही ये सुझाव दिया कि क्यों न माँ अपनी डांस क्लासेज़ शुरू करें, जिसमें गली-मुहल्ले की लड़कियाँ व औरतें भी सीख सकें, जिन्होंने आपकी तरह किसी न किसी वजह से अपनी इच्छाओं को दबाकर रखा है।"

"क्या सच में!" सुनीता की आँखों में ख़ुशी के आँसू तैर गये।
"हाँ, सच में माँ!" पीछे से अनिकेत ने भी आकर माँ को थाम लिया। तीनों ने ख़ुशी के साथ उस अकेडमी मे प्रवेश किया।

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Umesh Mehta

25 September 2025

Bahot khub. Bdhai ho

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रचनाकार परिचय

शिवानी शान्तिनिकेतन

ईमेल : shivanishantiniketan@gmail.com

निवास : बोलपुर (पश्चिम बंगाल)