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कुसुमलता सिंह की बाल-कहानियों का संग्रह : हवा की घंटी- सुरेन्द्र विक्रम

कुसुमलता सिंह की बाल-कहानियों का संग्रह : हवा की घंटी- सुरेन्द्र विक्रम

हवा की घंटी कुसुमलता सिंह की 10 बालकहानियों का संग्रह है, जिनमें एक ओर साहस तथा रोमांच है तो दूसरी ओर कुछ अच्छा करने का संकल्प और कठिन परिश्रम को ही सफलता का विकल्प मानने का फार्मूला बताया गया है। जीवन में सफलता के शिखर पर चढ़ने की कामना तो सब करते हैं लेकिन उसके लिए कठोर परिश्रम को अपनाने के लिए तैयार कम ही लोग होते हैं। जो कठिन परिश्रम करते हैं, सफलता आगे बढ़कर उनके चरण चूम लेती है।

लेखन, संपादन और प्रकाशन ये तीनों मिलकर ऐसा अद्भुत त्रिकोण बनाते हैं, जिसके अंदर क‌ई और कोण समाहित रहते हैं। ये कोण परिश्रम के साथ मिलकर प्रतिभा को एक विशिष्ट आयाम प्रदान करते हैं। ऐसी त्रिकोणीय प्रतिभा की धनी कुसुमलता सिंह संपादक, प्रकाशक और बालसाहित्य की सर्जक के साथ-साथ एक अनुवादक के रूप में भी अपनी पहचान बनाने में सफल रही हैं। छुपम-छुपाई, गिलहरी का सहयोग, हाथी का सलाम, मछुआरा और मेंढ़क, मीठे गीत, छोटी चींटी की बड़ी दावत, फिर खिल ग‌ए फूल, अपना घर सबसे अच्छा, चित्र का रहस्य, खट्टी मीठी कहानियाँ तथा आम के दोस्त जैसी पुस्तकों के माध्यम से बालसाहित्य सृजन, लिटिल बर्ड प्रकाशन तथा बचपन सोसायटी फॉर चिल्ड्रंस लिटरेचर एंड कल्चर के संस्थापक के साथ हिन्दी से अंग्रेजी में क‌ई पुस्तकों के अनुवादक के रूप में कुसुमलता सिंह जी ने न केवल अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है, बल्कि बालसाहित्य के विकास के लिए आज भी लगातार काम कर रही हैं।

हवा की घंटी कुसुमलता सिंह की 10 बालकहानियों का संग्रह है, जिनमें एक ओर साहस तथा रोमांच है तो दूसरी ओर कुछ अच्छा करने का संकल्प और कठिन परिश्रम को ही सफलता का विकल्प मानने का फार्मूला बताया गया है। जीवन में सफलता के शिखर पर चढ़ने की कामना तो सब करते हैं लेकिन उसके लिए कठोर परिश्रम को अपनाने के लिए तैयार कम ही लोग होते हैं। जो कठिन परिश्रम करते हैं, सफलता आगे बढ़कर उनके चरण चूम लेती है।

संग्रह की पहली कहानी गीत का असर में इस बात पर बल दिया गया है कि कभी भी किसी का मज़ाक़ नहीं उड़ाना चाहिए। मिट्टी के बर्तन और खिलौने बेचने वाला व्यापारी चुन्नी हमेशा बरगद के पेड़ के नीचे बैठने वाले बूढ़े का मज़ाक़ उड़ाया करता था। वह अपने गधे से कहता- "जा देख, सामने चबूतरे पर तेरा भाई बैठा है। ज़रा हालचाल पूछ ले।" फिर वह बूढ़े से कहता- "अरे बाबा, तुम्हारा भाई इतनी देर से तुम्हारे पास खड़ा है, उसका हालचाल तो पूछ लो।" (पृष्ठ- 2)

चुन्नी की इस हरकत से बूढ़ा तंग आ गया था। एक दिन दीवाली के अवसर पर जब चुन्नी अपने गधे की पीठ पर मिट्टी के दीए, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियाँ और अन्य खिलौने लादकर जा रहा था तो पेड़ के पास पहुँचते ही बूढ़े ने चुन्नी से कहा– "तुम रोज़ कहते हो कि मैं अपने भाई का हालचाल पूछूँ। तो आज मैं अपने भाई से बात कर लेता हूँ।"

बूढ़ा गधे के पास गया और अपनी जेब में रखी डिबिया निकालकर उसमें बंद मधुमक्खी को गधे के कान के अंदर डाल दिया। मधुमक्खी की भनभनाहट से गधा परेशान होकर इधर-उधर कूदने लगा। ऊपर से चुन्नी को ऐसी दुलत्ती लगाई कि उसकी पीठ पर लदे हुए सारे दीए, गणेश-लक्ष्मी और खिलौने सब गिरकर टुकड़े-टुकड़े हो गये। चुन्नी ने अपने हुए नुक़सान के हर्जाने के लिए थानेदार से बूढ़े की शिकायत की तो अपनी सफाई में उसने जो कहा, उससे सभी की हँसी छूट गयी- "मैंने तो बस इतना ही कहा कि गधे मेरे भाई, यह चुन्नी तुम पर रोज़ इतना बोझा लादता है। तुम ज़रूर थक जाते होगे। तुम्हारा मन बहलाने के लिए मैं अपनी छोटी बहन को तुम्हारे पास छोड़ देता हूँ। यह अच्छा गाना गाती है। यह गाएगी और तुम सुनोगे। मन करे तो नाच भी लेना। गाना सुनते रहोगे तो थकान भी नहीं लगेगी। बस यही कहकर मैंने अपनी मधुमक्खी बहन को गधे भैया के कान में डाल दिया।" (पृष्ठ- 4)
निष्कर्ष यह कि रोज़-रोज़ किसी की हँसी उड़ाने का परिणाम ऐसा ही होता है।

मैं यह कर सकता हूँ सही अर्थों में एक संकल्प कथा है। इसे 'साहस कथा' भी कहा जा सकता है। रोशन पढ़ने में होशियार तो था, लेकिन अपने पैर की समस्या के कारण न तो अधिक भाग-दौड़ कर पाता था और न ही खेल-कूद में अधिक रुचि लेता था। दूसरी ओर उसका दोस्त दीपक फुर्तीला होने के कारण पढ़ाई के साथ -साथ हॉकी, फुटबॉल जैसे खेलों में भी बराबर भाग लेता था। दीपक चाहता था कि रोशन भी उसके साथ खेल-कूद में हिस्सा ले, लेकिन रोशन अपना अधिकांश समय पुस्तकें पढ़ने में ही व्यतीत करता था।

दीपक के बार-बार कहने पर रोशन ने उसे अपनी समस्या बताई- "दीपक मैं स्वस्थ नहीं हूँ। माँ कहती है मैं सात महीने में ही पैदा हो गया था, इसलिए कमज़ोर हूँ। बचपन में सड़क दुर्घटना में मेरी बायीं टाँग में चोट लग गयी थी, उसे काटना पड़ा था। अब मेरी यह टाँग नकली है देखो! इसीलिए मेरे जूते तुम सबसे अलग हैं, मेरी तकदीर ही खोटी है।" (पृष्ठ- 6)

रोशन का उत्साह बढ़ाने के लिए दीपक ने अपनी जो कहानी बताई, उससे रोशन का चौंकना स्वाभाविक था- "मेरे हृदय में बचपन से ही छेद था। उसका ऑपरेशन हो चुका है। ऑपरेशन के बाद जब मैं अस्पताल में था तो वहाँ मैंने एक किताब पढ़ी। उसमें लिखा था कि बिना हिम्मत हारे रोज़-रोज़ के अभ्यास करने से हमें मंज़िल मिल जाती है।" (पृष्ठ- 7)

इसके साथ ही दीपक ने मैदान में जमी हुई दूब का उदाहरण देते हुए बताया कि बार-बार रौंदे जाने, जानवरों द्वारा चले जाने तथा रोलर चलाए जाने के बाद भी दूब हरी हो जाती है। दीपक की हिम्मत बँधाने की इस कला ने रंग दिखाया और रोशन ने स्वीकार कर लिया कि मैं यह कर सकता हूँ।

खेल कहानी में मातृत्व प्रेम का ऐसा खेल खेला गया है, जो परिवार में प्रेम की धुरी है। इसी प्रेम के चारों ओर परिवार घूमता रहता है। अनवर की अम्मी उसकी बीमार नानी को देखने गयी हैं। क‌ई दिन बाद भी अम्मी के न लौटने पर अनवर ज़िद पकड़ लेता है कि जब अम्मी आएँगी, मैं तभी स्कूल जाऊँगा। उसके अब्बू समझाते हैं कि- "तुम्हारी नानी बीमार हैं। तुम्हारी अम्मी अपनी अम्मी से मिलने गयी हैं। बस एक-दो दिन में आ जाएँगी। बातें बंद, स्कूल की तैयारी करो।" अब्बू ने फिर कहा- "अभी एक-दो दिन और। तीन दिन तो हो गये अम्मी को गये। मुझे अम्मी की याद आ रही है।" कहते-कहते वह ज़ोर से रोने लगा। (पृष्ठ- 10)

अनवर को तो हर हाल में मम्मी को बुलाना ही था। वह इतने सारे तर्क देता है कि अब्बू परेशान हो जाते हैं- "अम्मी हेलीकॉप्टर में बैठकर आ जाएँ। गुब्बारे वाली टोकरी में बैठकर आ जाएँ।" कहते हुए अनवर के रोने की आवाज़ तेज़ हो गयी।

परिवार में बातचीत चल ही रही थी कि तभी मोबाइल पर रिया को अम्मी की आवाज़ सुनाई देती है। अनवर लपककर बात करने लगता है- "मम्मी आप कहाँ हैं? हम कुछ नहीं जानते। ट्रेन नहीं है तो प्लेन से आ जाइए। प्लेन नहीं है तो कार से आ जाइए। बस जल्दी आ जाइए। पानी वाले जहाज से आ जाइए न!" कहकर वह रोने लगा। (पृष्ठ- 11)

अम्मी ने बातचीत में ही बता दिया कि मैं हवा वाले घोड़े पर बैठकर आ रही हूँ। तभी दरवाज़ा खुलता है, और जुगनू के भौंकने की आवाज़ आने लगती है। अम्मी रिक्शे से उतर रही हैं। अनवर और रिया को तो जैसे सारी खुशियाँ ही मिल गईं।

शीर्षक कथा हवा की घंटी, जिसे अंग्रेज़ी में विंडचाइम कहते हैं। कहानी की पूरी कथावस्तु तैराकी प्रतियोगिता के इर्द-गिर्द घूमती है। हनीफ दूसरों को नदी में तैरते हुए देखता तो उसे लगता कि तैरना सचमुच एक कला है, इसीलिए यह कठिन भी है। उसकी भी इच्छा होती कि वह तैरना सीखे लेकिन उसकी अम्मी उसे पानी में उतरने ही नहीं देती थीं। एक दिन उसके मामू घर आये तो उसने मामू के सामने अपनी तैरना सीखने की इच्छा जताई। मामू स्वयं बहुत अच्छे तैराक थे। उनकी प्रेरणा से हनीफ धीरे-धीरे तैराकी सीखता हुआ प्रतियोगिता में भी भाग लेने के उद्देश्य से भोपाल जाता है। वहाँ भोपाल के प्रसिद्ध ताल में डूबते हुए एक बच्चे को बचाकर उसने न केवल साहस का परिचय दिया बल्कि अपनी तैराकी में निपुणता को भी प्रमाणित कर दिया।

उसके मामू ने हनीफ की प्रशंसा करते हुए कहा कि- "तुमने डूबते बच्चे की जान बचाई, वह तो जीवन का सबसे बड़ा इनाम है। यह देखो पूरा अखबार तुम्हारे साहस की प्रशंसा कर रहा है। तुम्हारा नाम, तुम्हारे गाँव का नाम, तुम्हारा कोच का नाम साथ ही तुम्हारे इस नाचीज़ मामूजान फ़रीद का नाम भी छपा है।" (पृष्ठ- 19)

घरौंदा आपसी मेल-जोल पर आधारित कहानी है। दो अलग-अलग संप्रदाय की लड़कियाँ टूकी और सलमा अपनी-अपनी मम्मियों को बड़ी चालाकी से न केवल आपस में मिला देती हैं बल्कि दीपावली के त्योहार के बहाने सौहार्द्र की मिसाल भी प्रस्तुत करती हैं। परिवार के बच्चों ने जिस तरह उन्हें आपस में मिलाया, उससे दोनों मम्मियों की हँसी छूट गयी- "बहन! इन दोनों बच्चियों ने दीपावली की रोशनी हमारे दिल और दिमाग़ में भी कर दी। आप आइए न हमारे पास हम लोग मिलकर त्यौहार मनाएँगे, यह तो यादगार दीपावली है।" (पृष्ठ- 23)

साहसी बीज कहानी लोककथा पर आधारित है। बीज अपनी संकल्पशक्ति के बल पर ही निर्जन प्रदेश में भी उगकर अपनी पहचान बना लेता है। कहानी में एक छोटा-सा फूल का बीज तेज़ हवा के सहारे उड़ते-उड़ते गढ़वाल पर्वत पर पहुँच जाता है। उसे देखकर झाड़ी ने समझाया कि तुम यहाँ से कहीं और चले जाओ। इस माहौल में तुम खो जाओगे। लेकिन बीज ने कहा कि मैं कठिनाइयों से नहीं डरता हूँ, अगर आप लोग मेरी सहायता करेंगे तो मैं सारी कठिनाइयों का सामना कर लूँगा।

धीरे-धीरे बीज ने आकार ग्रहण करना शुरू किया। उसमें पत्तियाँ निकलीं तो भेड़ उसे चर ग‌ई, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर से उसमें न‌ई पत्तियाँ आ गयीं। अब झाड़ियों की मदद से बीज फूल का आकार लेने लगा। सभी की मदद से धीरे-धीरे वहाँ फूलों की घाटी बन गयी। यह लोगों में चर्चा के केन्द्र में भी आ गई- "सबने यह सुना कि गढ़वाल के पर्वतों में नई किस्म का फूल खिला है। लोग फूलों की घाटी देखने आने लगे।" (पृष्ठ- 27)

आम का रस कहानी भी लोककथा पर आधारित है। इसे पढ़ते हुए अनायास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाटक 'अंधेर नगरी' याद आ गया, जिसमें अंधेर नगरी का राजा चौपट है। उसके ऊल-जुलूल कामों से जैसे पाठकों/दर्शकों को अनायास हँसी आ जाती है, ठीक वैसे ही मीठीपुर के राजा मधुर द्वारा आम खाने से गिरे हुए रस से जो बतंगड़ शुरू होता है, वह कहानी के अंत में ही जाकर समाप्त होता है। आम के गिरे हुए रस पर भिनभिनाती मक्खियों पर बिल्ली झपटती है, फिर वहाँ कुत्ते आ जाते हैं। मीनू सेठ और साबिर हलवाई की इन कुत्तों की वजह से लड़ाई हो जाती है।

जब मामला राजा के पास पहुँचता है तो वे कुत्तों को तीन महीने पिंजरे में बंद करके खाना-पीना बंद करने का आदेश दे देते हैं। तभी पता चलता है कि यह लड़ाई तो बिल्लियों के कारण हुई है तो राजा कुत्तों की जगह बिल्लियों को पिंजरे में बंद करने का आदेश दे देते हैं। अंत में राजा जब मंत्री से मक्खियों के आने का कारण पूछते हैं तो वह बताता है कि खिड़की से गिरते हुए आम के रस के कारण मक्खियाँ इकट्ठी हो गई थीं। राजा को इस बात का दुख होता है कि ज़रा-सी लापरवाही से ये सभी घटनाएँ हुई हैं।

अभ्यास का जादू कहानी में इस बात पर बल दिया गया है कि बार-बार अभ्यास करने से कठिन से कठिन काम भी संपन्न हो जाते हैं। बोपदेव को व्याकरण की चीजें याद नहीं होती थीं, जिससे वह बहुत चिंतित रहता था। एक बार बोपदेव ने तालाब की सीढ़ियों पर बैठे हुए देखा कि कुछ स्त्रियाँ पानी भरने के लिए मिट्टी के घड़े लेकर आईं। घड़ा रखते ही थोड़ा इधर-उधर होता व बाद में एक जगह स्थिर हो जाता था। ध्यान से देखने पर पता चला कि घड़े को एक ही जगह पर बार-बार रखने से पत्थर थोड़ा घिस गया था, इसी वजह से घड़ा उसमें टिक जाता था। बोपदेव को यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई थी कि- "अच्छा तो घड़ा ऐसे टिका था। बार-बार पत्थर की सीढ़ी पर एक ही जगह मिट्टी के घड़े रखने से उसने पत्थर को ही काट दिया। यानी हम किसी कार्य को करने का बार-बार अभ्यास करें तो उसमें अवश्य सफलता मिलेगी।" (पृष्ठ- 32)

बोपदेव ने इसे गुरुमंत्र मान लिया और अभ्यास करते-करते एक दिन उसे सारी चीजें कंठस्थ हो गयीं। बारहवीं शताब्दी की इस घटना के कारण ही बोपदेव का पूरा जीवन ही बदल गया। आगे चलकर उन्होंने मुग्ध-बोध व्याकरण नामक पुस्तक लिखी, जो बांग्ला भाषा का उत्कृष्ट ग्रंथ माना जाता है।

तीन गहने कहानी ईश्वरचंद्र विद्यासागर के बचपन की एक महत्त्वपूर्ण घटना से जुड़ी हुई है। इसमें माँ अपने बेटे को जिन तीन गहनों के बारे में बताती है, उनमें अप्रत्यक्ष रूप से लोक कल्याण छिपा हुआ है। उनकी माँ ने कहा कि- "मुझे तीन गहने की बड़ी चाह है। पहला इस गाँव में एक स्कूल बनवाना, दूसरा यहाँ दवाखाना खुलवाना, तीसरा ऐसा कोई केन्द्र बनवाना, जहाँ से तुम सबकी मदद कर सको। तुम्हारे अच्छे काम को देखकर लोग पूछें कि आखिर ईश्वरचंद्र विद्यासागर की माँ कौन है, जिसने अपने बेटे को इतनी अच्छी शिक्षा दी?"

आगे चलकर ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अपनी माँ के इन गहनों को साकार करके उनका अक्षरशः पालन किया।

अंतिम कहानी पोशम्पा भ‌ई पोनप्पा खेलगीत पर आधारित है। कहानी में बड़े विस्तार से गीत के माध्यम से इस खेल को समझाया गया है। पार्क में बैठे हुए पीटर अंकल ने इस खेल को ब्रिटिश सभ्यता से जोड़कर इसकी संकल्पना को जब विस्तार से बताया तो टुनटुन सहित उसके सारे साथी इस खेल को बार-बार खेलने के लिए प्रोत्साहित हुए।

पूरी पुस्तक की प्रस्तुति इतनी आकर्षक है कि इसे पढ़ने के लिए मन लालायित हो जाता है। पुस्तक का बहुरंगी आवरण तथा हर कहानी में दिए गए चित्र इतने प्रभावशाली और मनमोहक हैं कि बरबस आँखें टिकी रह जाती हैं। तथ्य तो यह है कि बच्चों की पुस्तकों में ऐसे ही चित्र होने चाहिए ताकि उन्हें ख़रीदकर पढ़ने के लिए वे अपना मन बना सकें। पुस्तक में उच्चकोटि का काग़ज़ भी इस्तेमाल किया गया है, जो इतना मज़बूत है कि बार-बार पुस्तक पलटने पर भी कहीं से ज़रा-सा भी मुड़ता नहीं है। इस शानदार पुस्तक के लिए कहानीकार और प्रकाशक (हालांकि दोनों एक ही हैं) को बधाई तो बनती ही है।

 


समीक्ष्य पुस्तक- हवा की घंटी
रचनाकार- कुसुमलता सिंह
संस्करण- प्रथम, 2022
प्रकाशक- लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, दरियागंज, न‌ई दिल्ली

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रचनाकार परिचय

सुरेन्द्र विक्रम

ईमेल : vikram.surendra7@gmail.com

निवास : लखनऊ (उ०प्र०)

जन्मतिथि- 01 जनवरी, 1961
जन्मस्थान- बरोखर, इलाहाबाद (उ०प्र०)
पता- सी-1245, एम. आई. जी. राजाजीपुरम, लखनऊ (उ०प्र०)- 226017
मोबाइल- 9450355390