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ग़ज़लगोई को समझने के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए : आसमां तू ही बता- के० पी० अनमोल

ग़ज़लगोई को समझने के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए : आसमां तू ही बता- के० पी० अनमोल

संग्रह की ग़ज़लों के विषय विविधता भरे हैं। लहजे को परंपरागत ही रखते हुए मक़सूद साहब परंपरागत घेरे के बाहर से भी अपने कथ्य चुनते हैं, साथ ही अपनी कहन को विशेष रखने का प्रयास करते हैं और यहाँ वे गज़लगोई में सफल हो उठते हैं।

आसमां तू ही बता मक़सूद अनवर 'मक़सूद' साहब की कुल 73 ग़ज़लों और 3 नज़्मों का एक ख़ूबसूरत संग्रह है। मक़सूद साहब की शायरी का स्वभाव परंपरागत लहजे का है। उर्दू भाषा, फ़ारसी के भारी-भारी शब्द लिए हुए है। लेकिन कविता के हम हिन्दी-भाषी प्रशंसकों के लिए भी कई मायनों में यह संग्रह पठनीय कहा जा सकता है। कुछ समय पहले इरा पब्लिशर्स, कानपुर की प्रबंधक श्रीमती अलका मिश्रा ने हिन्दी संस्करण का यह संग्रह भिजवाया था। इनकी ग़ज़लों से गुज़रते हुए मुझे कुछ बिंदुओं ने रोका और इसी कारण इस संग्रह का पढ़ा जाना मेरे लिए सार्थक हुआ।

दरअसल उर्दू की ग़ज़लों को सुनते-पढ़ते हुए मैंने यह हमेशा सीखा है कि किस तरह ग़ज़ल जैसी विधा का रखरखाव किया जाता है। यह रखरखाव भाव और भाषा दोनों स्तर पर देखा जा सकता है। वहाँ भावों को बड़ी ही कुशलता के साथ बहुत बारीकी से बहर में पिरो दिया जाता है कि ग़ज़ल की प्रतीकात्मकता की ख़ूबी बनी रहे और सॉफ्टनेस भी बरक़रार रहे। साथ ही कहाँ, कैसे, कब, कौनसा शब्द किस तरह बरता जाना चाहिए, यह समझ भी हम यहाँ से हासिल कर सकते हैं। उर्दू ग़ज़ल की ये ख़ूबियाँ 'आसमां तू ही बता' की ग़ज़लों में भी बराबर देखी जा सकती है। इसके अलावा इन ग़ज़लों की एक और ख़ूबी ने बार-बार मेरा ध्यान खींचा, वो यह कि इनके सानी मिस्रों की रवानी और बनावट देखने लायक होती है।

संग्रह की ग़ज़लों के विषय विविधता भरे हैं। लहजे को परंपरागत ही रखते हुए मक़सूद साहब परंपरागत घेरे के बाहर से भी अपने कथ्य चुनते हैं, साथ ही अपनी कहन को विशेष रखने का प्रयास करते हैं और यहाँ वे गज़लगोई में सफल हो उठते हैं। दुनिया का एक अच्छा-ख़ासा तज़्रिबा इनके पास है और अपने इस तज़्रिबे की बदौलत उन्होंने दुनिया की एक सधी हुई समझ विकसित कर ली है। यह समझ अक्सर इनके शेरों में उपस्थित होकर पाठकों के लिए कई तरह के मश्विरे, फ़लसफ़े और नसीहतें सामने रखती है। यहाँ रचनाकार अपने लेखन के ज़रिए समाज को राह दिखाने के अपने काम को अंजाम देता दिखता है। इस ढंग के कुछ शेर देखिए-

गिरफ़्त कैसी हो मुट्ठी पे नाज़ मत करना
तेरे ख़िलाफ़ ये कंकर न बोलने लग जाएँ
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ख़ामोशी तक़रीर से बेह्तर भी होती है कहीं
बा'ज़ मौक़े पर बहुत कुछ बोलकर हासिल नहीं
(तक़रीर= बयान)
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खपत है ख़ूब इसी पैदावार की 'मक़सूद'
ये कायनात मसाइल का कारख़ाना है
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उसको पाने की कोशिश में जान तेरी हलकान है क्यूँ
दुनिया अंदर से पीतल, ऊपर से सोने का पानी है
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घुटन होती तो है मक़सूद अपने तंग कमरों में
हम आँगन तो उठाकर ला नहीं सकते हैं गाँवों के

संग्रह के रचनाकार की अपने दौर, अपने समय की गतिविधियों पर भी नज़र लगातार बनी हुई है। वह अपने समाज के भीतर-बाहर जो हो रहा है, उसे बराबर देख-सुन रहा है। वह अपने समय की खोखली चकाचौंध के मायने भी जानता है और उसके संभावित प्रभाव भी। और यह भी जानता है कि इस चकाचौंध के सर्जक कितने कायर हैं। दो शेर देखिए-

ये अलमिया है चमकते जगमगाते दौर का
रोशनी होते हुए भी हम उजाले में नहीं
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उनके चेहरे पे चमकते हैं लहू के छींटे
आईना उनको दिखाओगे तो डर जाएँगे

'गागर में सागर भरना' ग़ज़ल ही नहीं, समस्त कविता की ख़ासियत है। यही ख़ासियत तो इसे गद्य से अलग करती है। बहुत कम और नपे-तुले शब्दों में बहुत सारा, बहुत ज़रूरी, इशारों-इशारों में कह जाना कविता की अनिवार्यता है। यह अनिवार्यता ग़ज़ल के लिए 'सुपर अनिवार्य' होती है। प्रतीकात्मकता की यह ख़ूबी एक तरह से ग़ज़ल की जान समझी जाती है। मक़सूद अनवर साहब के कई-कई शेर इस ख़ूबी की उम्दा मिसालें हैं। ऐसी ही दो मिसालें देखिए-

चंद लम्हों में हुआ करता है तय लम्बा सफ़र
क्या है वो रफ़्तार जो सिक्कों के पहिए में नहीं
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जड़ों के पास की मिट्टी बहुत कजला गयी कैसे
बुरे असरात भी होते हैं क्या पेड़ों की छाँवों में

ऊपर अपनी बात आरम्भ करते हुए मैंने एक बिंदु का ज़िक्र किया था कि 'इनके सानी मिस्रों की रवानी और बनावट देखने लायक होती है'। एक ग़ज़लकार के हाथ यह हुनर तब आता है, जब इस विधा में वह सिद्धहस्त हो जाता है। सानी मिस्रों की रवानी पानी की तरह बहती हुई हो और ऊला मिस्रे अकेले दम पे मुकम्मल कविता हो तो समझिए वह ग़ज़लकार उस्तादी के फ़न तक आ पहुँचा है। मक़सूद साहब के इन शेरों में सानी मिस्रों की रवानी पर ध्यान दीजिए और फिर इनकी सिद्धहस्तता को सराहिए-

हो नहीं सकती अना इक ख़ाकसारी से बुलंद
बोरिये में जो मसर्रत है वो साफ़े में नहीं
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ख़ामोशी तो मसअले का हल नहीं लगती है और
बात बिगड़ी है हमेशा बात मनवाते हुए
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तमन्ना दिल की बर आए, तुझे 'मक़सूद' मिल जाए
ज़मीं की गोद में लाकर कहो तो आसमां रख दूँ

ऊपर मैंने यह भी कहा था कि इनके पास अपनी तरह की कहन, अपनी तरह के तेवर हैं। प्रेम जैसे प्राचीन और अति प्रचलित विषय पर तभी कुछ मार्के का कहा जा सकता है, जब किसी रचनाकार के पास अपनी ख़ुद की तरह की कहन हो, शैली हो। प्रेम को देखिए किस तरह मक़सूद साहब अपनी तरह से शेरों में अभिव्यक्त करते हैं! इश्क़े-मिज़ाजी से इश्क़े-हक़ीक़ी की छाप भी यहाँ उभर कर दिखती है-

तेरी लौ मैं जल सकता हूँ, कैसे उड़ा ले जाऊँ तुझे
इतनी तो औक़ात नहीं है कोई पतंगा चील बने
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डरता हूँ कि ये साँसों की लछमन रेखा लाँघ न जाए
तेरी यादों की धक-धक से दिल का है नुक़सान बहुत
________

एक उनका ख़याल क्या आया
बे-ख़याली ही बे-ख़याली है

अच्छी या कहूँ उत्कृष्ट शायरी का आनंद लेने के साथ-साथ, संग्रह 'आसमां तू ही बता' ग़ज़लगोई को समझने के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए। इस बेह्तरीन संग्रह के सर्जक मक़सूद अनवर 'मक़सूद' साहब को दिली मुबारकबाद के साथ इस उम्दा संग्रह के प्रकाशन के लिए प्रकाशक को भी बधाई और शुभकामनाएँ।

 


समीक्ष्य पुस्तक- आसमां तू ही बता
रचनाकार- मक़सूद अनवर 'मक़सूद'
विधा- ग़ज़ल (उर्दू)
प्रकाशन- इरा पब्लिशर्स, कानपुर (उ०प्र०)
संस्करण- प्रथम, 2021
मूल्य- 200 रुपए (पेपरबैक)

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रचनाकार परिचय

के० पी० अनमोल

ईमेल : kpanmol.rke15@gmail.com

निवास : रुड़की (उत्तराखण्ड)

जन्मतिथि- 19 सितम्बर
जन्मस्थान- साँचोर (राजस्थान)
शिक्षा- एम० ए० एवं यू०जी०सी० नेट (हिन्दी), डिप्लोमा इन वेब डिजाइनिंग
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, दोहा, गीत, कविता, समीक्षा एवं आलेख।
प्रकाशन- ग़ज़ल संग्रह 'इक उम्र मुकम्मल' (2013), 'कुछ निशान काग़ज़ पर' (2019), 'जी भर बतियाने के बाद' (2022) एवं 'जैसे बहुत क़रीब' (2023) प्रकाशित।
ज्ञानप्रकाश विवेक (हिन्दी ग़ज़ल की नई चेतना), अनिरुद्ध सिन्हा (हिन्दी ग़ज़ल के युवा चेहरे), हरेराम समीप (हिन्दी ग़ज़लकार: एक अध्ययन (भाग-3), हिन्दी ग़ज़ल की पहचान एवं हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा), डॉ० भावना (कसौटियों पर कृतियाँ), डॉ० नितिन सेठी एवं राकेश कुमार आदि द्वारा ग़ज़ल-लेखन पर आलोचनात्मक लेख। अनेक शोध आलेखों में शेर उद्धृत।
ग़ज़ल पंच शतक, ग़ज़ल त्रयोदश, यह समय कुछ खल रहा है, इक्कीसवीं सदी की ग़ज़लें, 21वीं सदी के 21वें साल की बेह्तरीन ग़ज़लें, हिन्दी ग़ज़ल के इम्कान, 2020 की प्रतिनिधि ग़ज़लें, ग़ज़ल के फ़लक पर, नूर-ए-ग़ज़ल, दोहे के सौ रंग, ओ पिता, प्रेम तुम रहना, पश्चिमी राजस्थान की काव्यधारा आदि महत्वपूर्ण समवेत संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
कविता कोश, अनहद कोलकाता, समकालीन परिदृश्य, अनुभूति, आँच, हस्ताक्षर आदि ऑनलाइन साहित्यिक उपक्रमों पर रचनाएँ प्रकाशित।
चाँद अब हरा हो गया है (प्रेम कविता संग्रह) तथा इक उम्र मुकम्मल (ग़ज़ल संग्रह) एंड्राइड एप के रूप में गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध।
संपादन-
1. ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के मार्च 2015 से फरवरी 2021 तक 68 अंकों का संपादन।
2. 'साहित्य रागिनी' वेब पत्रिका के 17 अंकों का संपादन।
3. त्रैमासिक पत्रिका ‘शब्द-सरिता’ (अलीगढ, उ.प्र.) के 3 अंकों का संपादन।
4. 'शैलसूत्र' त्रैमासिक पत्रिका के ग़ज़ल विशेषांक का संपादन।
5. ‘101 महिला ग़ज़लकार’, ‘समकालीन ग़ज़लकारों की बेह्तरीन ग़ज़लें’, 'ज़हीर क़ुरैशी की उर्दू ग़ज़लें', 'मीठी-सी तल्ख़ियाँ' (भाग-2 व 3), 'ख़्वाबों के रंग’ आदि पुस्तकों का संपादन।
6. 'समकालीन हिंदुस्तानी ग़ज़ल' एवं 'दोहों का दीवान' एंड्राइड एप का संपादन।
प्रसारण- दूरदर्शन राजस्थान तथा आकाशवाणी जोधपुर एवं बाड़मेर पर ग़ज़लों का प्रसारण।
मोबाइल- 8006623499