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जीवन के विभिन्न पहलुओं की तस्वीरों का एक कोलाज : आईने के ज़ाविये- के० पी० अनमोल

जीवन के विभिन्न पहलुओं की तस्वीरों का एक कोलाज : आईने के ज़ाविये- के० पी० अनमोल

इंसानी जीवन की ही तरह इनकी शायरी में विविध रंग देखने को मिलते हैं। ये अपने अनुभव और उससे निर्मित दर्शन के ज़रिए जीवन की एक तस्वीर हमारे सामने रखते हैं, उसकी जद्दोजहद को बयान करते हैं और उसके विसंगत की बखिया उधेड़ते हैं। अपनी समझ के मुताबिक़ अपने पाठक को जीवन जीने की नसीहतें करते दिखते हैं तो प्रेम के विभिन्न पहलुओं पर बात करते हैं।

पूर्व सैनिक और उम्दा शायर शैलेन्द्र पाण्डेय 'शैल' का ग़ज़ल संग्रह 'आईने के ज़ाविये' पिछले दिनों पढ़ने में आया। साहित्य श्री प्रकाशन, नई दिल्ली से कुछ ही माह पूर्व यह प्रकाशित होकर आया है। पुस्तक में इनकी कुल 104 ग़ज़लें संग्रहित हैं। ग़ज़ल के परंपरागत रंग की शैली में अपनी ठसक से शायरी करने वाले रचनाकार शैलेन्द्र पाण्डेय 'शैल' को पढ़ते हुए लगातार कुछ तरोताज़ा अनुभव होता रहता है। ग़ज़ल का यह इनका चौथा प्रकाशित संग्रह है, जो यह दर्शाता है कि ग़ज़ल कहने का एक ढंग इनके पास मिलता है।

इंसानी जीवन की ही तरह इनकी शायरी में विविध रंग देखने को मिलते हैं। ये अपने अनुभव और उससे निर्मित दर्शन के ज़रिए जीवन की एक तस्वीर हमारे सामने रखते हैं, उसकी जद्दोजहद को बयान करते हैं और उसके विसंगत की बखिया उधेड़ते हैं। अपनी समझ के मुताबिक़ अपने पाठक को जीवन जीने की नसीहतें करते दिखते हैं तो प्रेम के विभिन्न पहलुओं पर बात करते हैं। कुल मिलाकर शैलेन्द्र पाण्डेय 'शैल' जीवन के विभिन्न पहलुओं की तस्वीरों का एक कोलाज बनाकर पुस्तक 'आईने के ज़ाविये' के ज़रिए हमारे सामने रखते हैं।

प्रेम ग़ज़ल-जगत का सर्वाधिक पसंदीदा विषय रहा है। कहें कि मुख्य या प्राचीन तो भी ठीक ही होगा। प्रेम इंसान के जीवन का भी सर्वाधिक पसंदीदा, सर्वाधिक चर्चित या मुख्य बिंदु रहा है। यह आज भी उतना ही प्रासंगिक विषय है, जितना ग़ज़ल के आरम्भिक समय में रहा होगा और शायद उतना ही प्रासंगिक बना रहेगा, जब तक ग़ज़ल रहेगी अथवा कहें कि जब तक जीवन रहेगा।

शैलेन्द्र पाण्डेय 'शैल' की ख़ासियत है कि वे प्रचलित रूढ़ियों अथवा बिम्ब-प्रतीकों का प्रयोग करते हुए अपनी ग़ज़ल में कुछ अलग कहने-करने का प्रयास करते हैं। यहाँ पहले शेर में ऐसा ही कुछ देखने को मिलता है। दूसरे में एक धूनी-सी रमी है- एक अनहदनाद है, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है। कीजिए। तीसरे में एक प्यारी-सी तमन्ना है, एक ख़ूबसूरत मिसाल है। हम सबके मन की चाह है। आमीन। चौथे शेर में इस प्यारे-से अहसास का अंजाम है। यहाँ तक अधिकतर का प्रेम पहुँचता ही है। उसी 'पहुँच जाने' की छटपटाहट है, याद है, ताना है। देखें-

जली हैं धूप में छत पर दो आँखें
यहाँ खिड़की में इक चेहरा रखा है
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रातरानी महक रही मुझमें
कोई क़ाबिज़ है साँस पर मेरे
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बगैर नींद भी आँखों को तेरे ख़्वाब आएँ
दिए रहें न रहें, हाँ मगर उजास रहे
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तुमसे मिलकर ही तो देखे मैंने सब्ज़ारी के ख़्वाब
और तुम ही कर गये थे एक दिन बंजर मुझे

एक रचनाकार अपने और अपने आसपास के जीवन को देखते-समझते हुए, उसकी जद्दोजहद से दो-चार होते हुए अपनी सोच को लगातार पुख्ता करता चलता है और साथ ही अपने लिखे में दर्ज भी करता है ताकि हज़ारों-हज़ार लोगों को ज़िंदगी की मुश्किलों या इम्तिहानों से घबराने-लड़खड़ाने से बचा ले, थाम ले और उन्हें अह्सास कराये कि वे अकेले नहीं हैं, जिन्होंने ये थपेड़े सहे हैं। जीवन की जद्दोजहद की उपज ये शेर, जीवन का असली चेहरा भी हमारे सामने रखते हैं और निराश लोगों को उम्मीद का एक सहारा भी मुहैया कराते हैं, संवेदनाओं के लिए शब्दों का सहारा-

काम काफ़ी पड़ा है सर मेरे
पेट बैठा है पीठ पर मेरे
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मैं हूँ कि आज तक से मेरा कुछ नहीं बना
इतनी तो ठोकरों से सँवर जाना चाहिए
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अगरचे कुछ भी तैयारी नहीं है
लड़ाई हमने भी हारी नहीं है
हुनर जीने का हम भी जानते हैं
हमें ये ज़िंदगी भारी नहीं है

जीवन क्या है, उसके फ़लसफ़े क्या हैं, यह एक रचनाकार सामान्य लोगों से ज़्यादा जानता है। शायद इसलिए कि उसने ख़ुद जीवन के थपेड़े औरों की तुलना में ज़्यादा झेले होते हैं। प्रकृति ने उसे अच्छे-से तराशकर इस लायक बनाया होता है कि वह दुनिया के दुख-सुख, उसके क़ायदे, उसकी संवेदनाएँ ढंग से पढ़-समझ सके। शैलेन्द्र पाण्डेय जी उन्हीं रचनाकारों में हैं, जिन्होंने कुदरत को और उसकी असलियत को ढंग से समझा है। वे अपने शेरों में कुछ ऐसे जीवन-सूत्र बाँधते हैं, जो पाठक को राह दिखाने का काम कर सकते हैं। देखें कुछ शेर-

फ़लसफ़े पेट की भट्ठी में पिघल जाते हैं
भूख बच्चों की शराफ़त नहीं रहने देती
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ज़मीं पे हैं तो ज़मीं पाँव थामे रहती है
बुलंदियों पे फिसलने का डर भी रहता है
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अँधेरे उम्रभर पड़ते हैं ढोने
दिया ही जब दिये को काटता है

शैलेन्द्र जी जीवन-सूत्र देने के साथ-साथ पाठक के लिए कुछ नसीहतें भी अपने शेरों में बाँधते हैं, जिन पर अमल करके जीवन को उलझने से बचाया जा सकता है, सरल बनाया जा सकता है। चाहे ख़्वाब देखना हो या शहर की ओर जाना, दो देशों में जंग की परिस्थितियाँ हों या पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता; रचनाकार एक ज़िम्मेदार अग्रज की भांति अपने पाठक को बहुत प्यार से समझाता है कि-

देख परेशां होएगा
देख न ऐसे-वैसे ख़्वाब
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तुमको मिट्टी-सा मुलायम नहीं रहने देगा
तुमको पत्थर का बना देगा शहर, मत जाना
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कई जंगें हुईं पर मसअलों का हल नहीं निकला
जली है बारहा धरती इधर की भी, उधर की भी
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हक़ तेरा भी है कि तुझको धूप में छाया मिले
हाँ, मगर ये फ़र्ज़ भी कि इक शजर तैयार कर

शैलेन्द्र पाण्डेय जी एक सजग रचनाकार के बतौर अपने समय की नब्ज़ पर भी बारीक पकड़ रखते हैं। बल्कि कहूँ कि केवल पकड़ ही नहीं रखते अपनी शायरी में अपने दौर के विसंगत के चित्र भी खींचते हैं। आज के जीवन की असलियत, उसकी चुनौतियाँ तथा उसका ढंग सब रचनाकार की नज़र में है और कभी-कभार वह इन्हें अपने शब्दों के ज़रिए प्रदर्शित भी करता है।

यहाँ मरना कोई मुश्किल नहीं है
यहाँ ज़िन्दा ही रहना मसअला है
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सभी हैं मस्त अपनी ज़िंदगी में
किसी को दूसरे की क्या पड़ी है
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यहाँ ऐसे ही चलता है बिरादर
हर इक एक-दूसरे को काटता है
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घर टपकता है तो कोई इल्म कर, छप्पर बदल
क्या तरीक़ा है कि बस बुनियाद ही मिस्मार कर

शैलेन्द्र पाण्डेय 'शैल' अपनी मौज के इंसान भी हैं और रचनाकार भी। इनके पास जीने और अपनी बात रखने का अपना एक तरीक़ा है। वे शायरी को लिखते या कहते नहीं, जीते हैं। अपनी मौज में कहे गये उनके शेर पाठक-मन पर एकदम प्रहार करते हैं और उसे बरबस ही अपनी ओर खींचते हैं। ये अपनी ही रौ में बहकर शायरी के दरिया में गोते लगाते हैं। इनका यह मनमौजीपन इनकी शायरी की जान है। ईश्वर इनके भीतर के मनमौजी इंसान को हमेशा बचाए रखे ताकि इनकी शायरी यूँ ही नए आयाम गढ़ती रहे। संग्रह के प्रकाशन के लिए इन्हें बहुत-बहुत बधाई और मंगलकामनाएँ।

 


समीक्ष्य पुस्तक- आईने के ज़ाविये
रचनाकार- शैलेन्द्र पाण्डेय 'शैल'
विधा- ग़ज़ल
प्रकाशक- साहित्य श्री प्रकाशन, नई दिल्ली
संस्करण- प्रथम, 2024
मूल्य- 350 रुपए (सजिल्द)

1 Total Review

वसंत जमशेदपुरी

26 September 2025

शानदार समीक्षा, फौजी भाई(शैल जी)और समीक्षक दोनों को हार्दिक बधाई

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रचनाकार परिचय

के० पी० अनमोल

ईमेल : kpanmol.rke15@gmail.com

निवास : रुड़की (उत्तराखण्ड)

जन्मतिथि- 19 सितम्बर
जन्मस्थान- साँचोर (राजस्थान)
शिक्षा- एम० ए० एवं यू०जी०सी० नेट (हिन्दी), डिप्लोमा इन वेब डिजाइनिंग
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, दोहा, गीत, कविता, समीक्षा एवं आलेख।
प्रकाशन- ग़ज़ल संग्रह 'इक उम्र मुकम्मल' (2013), 'कुछ निशान काग़ज़ पर' (2019), 'जी भर बतियाने के बाद' (2022) एवं 'जैसे बहुत क़रीब' (2023) प्रकाशित।
ज्ञानप्रकाश विवेक (हिन्दी ग़ज़ल की नई चेतना), अनिरुद्ध सिन्हा (हिन्दी ग़ज़ल के युवा चेहरे), हरेराम समीप (हिन्दी ग़ज़लकार: एक अध्ययन (भाग-3), हिन्दी ग़ज़ल की पहचान एवं हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा), डॉ० भावना (कसौटियों पर कृतियाँ), डॉ० नितिन सेठी एवं राकेश कुमार आदि द्वारा ग़ज़ल-लेखन पर आलोचनात्मक लेख। अनेक शोध आलेखों में शेर उद्धृत।
ग़ज़ल पंच शतक, ग़ज़ल त्रयोदश, यह समय कुछ खल रहा है, इक्कीसवीं सदी की ग़ज़लें, 21वीं सदी के 21वें साल की बेह्तरीन ग़ज़लें, हिन्दी ग़ज़ल के इम्कान, 2020 की प्रतिनिधि ग़ज़लें, ग़ज़ल के फ़लक पर, नूर-ए-ग़ज़ल, दोहे के सौ रंग, ओ पिता, प्रेम तुम रहना, पश्चिमी राजस्थान की काव्यधारा आदि महत्वपूर्ण समवेत संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
कविता कोश, अनहद कोलकाता, समकालीन परिदृश्य, अनुभूति, आँच, हस्ताक्षर आदि ऑनलाइन साहित्यिक उपक्रमों पर रचनाएँ प्रकाशित।
चाँद अब हरा हो गया है (प्रेम कविता संग्रह) तथा इक उम्र मुकम्मल (ग़ज़ल संग्रह) एंड्राइड एप के रूप में गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध।
संपादन-
1. ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के मार्च 2015 से फरवरी 2021 तक 68 अंकों का संपादन।
2. 'साहित्य रागिनी' वेब पत्रिका के 17 अंकों का संपादन।
3. त्रैमासिक पत्रिका ‘शब्द-सरिता’ (अलीगढ, उ.प्र.) के 3 अंकों का संपादन।
4. 'शैलसूत्र' त्रैमासिक पत्रिका के ग़ज़ल विशेषांक का संपादन।
5. ‘101 महिला ग़ज़लकार’, ‘समकालीन ग़ज़लकारों की बेह्तरीन ग़ज़लें’, 'ज़हीर क़ुरैशी की उर्दू ग़ज़लें', 'मीठी-सी तल्ख़ियाँ' (भाग-2 व 3), 'ख़्वाबों के रंग’ आदि पुस्तकों का संपादन।
6. 'समकालीन हिंदुस्तानी ग़ज़ल' एवं 'दोहों का दीवान' एंड्राइड एप का संपादन।
प्रसारण- दूरदर्शन राजस्थान तथा आकाशवाणी जोधपुर एवं बाड़मेर पर ग़ज़लों का प्रसारण।
मोबाइल- 8006623499