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हिन्दी ग़ज़ल के क्षितिज पर चमकता सितारा : के० पी० अनमोल- डॉ० भावना

हिन्दी ग़ज़ल के क्षितिज पर चमकता सितारा : के० पी० अनमोल- डॉ० भावना

के० पी० अनमोल की ग़ज़लें रवायती शायरी से अलग बड़ी शिद्दत से अपनी ज़मीन तलाशती नज़र आती हैं। शेरों के कहने का अंदाज़, बिम्बों का अलहदा प्रयोग और समसामयिक घटनाओं पर पैनी नज़र इन्हें इनके ही अन्य समकालीन शायरों से अलग करती है।

के० पी० अनमोल का जन्म 19 सितम्बर को साँचोर (राजस्थान) में हुआ था। इन्होंने एम० ए० एवं यू०जी०सी० नेट (हिन्दी) तथा डिप्लोमा इन वेब डिजाइनिंग की शिक्षा ली है। देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी ग़ज़लें, दोहे, गीत, कविता, समीक्षा एवं आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। इनके अब तक 'इक उम्र मुकम्मल' (2013), 'कुछ निशान काग़ज़ पर' (2019), 'जी भर बतियाने के बाद' (2022) एवं 'जैसे बहुत क़रीब' (2023) ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी ग़ज़लें, आलेख व समीक्षाएँ कविता कोश, अनहद कोलकाता, समकालीन परिदृश्य, अनुभूति, आँच, हस्ताक्षर आदि ऑनलाइन साहित्यिक उपक्रमों पर प्रकाशित होती रहती हैं। इनका संग्रह 'चाँद अब हरा हो गया है' (प्रेम कविता संग्रह) तथा 'इक उम्र मुकम्मल' (ग़ज़ल संग्रह) एंड्राइड एप के रूप में गूगल प्ले स्टोर पर भी उपलब्ध है। इन्होंने ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के मार्च 2015 से फरवरी 2021 तक 68 अंकों के संपादन के साथ-साथ 'साहित्य रागिनी' वेब पत्रिका के 17 अंकों का संपादन भी किया।

इसके अलावा त्रैमासिक पत्रिका ‘शब्द-सरिता’ (अलीगढ, उ.प्र.) के 3 अंकों का संपादन, 'शैलसूत्र' त्रैमासिक पत्रिका के ग़ज़ल विशेषांक का संपादन, ‘101 महिला ग़ज़लकार’, ‘समकालीन ग़ज़लकारों की बेह्तरीन ग़ज़लें’, 'ज़हीर क़ुरैशी की उर्दू ग़ज़लें', 'मीठी-सी तल्ख़ियाँ' (भाग-2 व 3), 'ख़्वाबों के रंग’ आदि पुस्तकों, 'समकालीन हिंदुस्तानी ग़ज़ल' एवं 'दोहों का दीवान' एंड्राइड एप का संपादन इत्यादि भी किया है। इनकी ग़ज़लें दूरदर्शन राजस्थान तथा आकाशवाणी जोधपुर एवं बाड़मेर केन्द्रों पर प्रसारित होती रहती हैं।

दरअसल के० पी० अनमोल बेहद संजीदा शायर हैं, जिनकी मेहनत, लगन और ग़ज़ल के प्रति दीवानगी क़ाबिले-तारीफ़ है। पता नहीं लोगों को क्यों लगता है कि साहित्यकार होना, उस पर भी शायर होना रातों-रात प्रसिद्धि की गारंटी समझी जाती है। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि साहित्य महज खाये, पिये और अघाये रचनाकारों की जगह भर नहीं है। यहाँ एक-एक शब्द को रचने के लिए न जाने कितनी पीड़ा से गुज़रना होता है। ग़ज़ल साहित्य की सभी विधाओं में सबसे मुश्किल विधा मानी जाती है। ग़ज़ल लिखना एक साधना है, जो बड़ी मुश्किल से नसीब होती है। जो लोग यह सोचते हैं कि महज दो मिसरों की तुकबंदी से शेर बनते हैं और इन्हीं शेरों के क्रम से एक मुकम्मल ग़ज़ल तो, यह उनकी सबसे बड़ी भूल है। ग़ज़ल का अपना अलग व्याकरण है और अलग कहन का अंदाज़ भी। ग़ज़ल संबंधी तमाम बारीकियों को सीखने के बाद ही कोई रचनाकार ग़ज़ल की दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज कर सकता है। कहना न होगा कि यह हुनर और लियाकत के० पी० अनमोल ने अपनी मेहनत और लगन से अर्जित की है।

के० पी० अनमोल की ग़ज़लें रवायती शायरी से अलग बड़ी शिद्दत से अपनी ज़मीन तलाशती नज़र आती हैं। शेरों के कहने का अंदाज़, बिम्बों का अलहदा प्रयोग और समसामयिक घटनाओं पर पैनी नज़र इन्हें इनके ही अन्य समकालीन शायरों से अलग करती है। ग़ज़ल जब प्रेमिका से वार्तालाप से अलग हो, समाज के रंजो-ग़म को अपना बना लेती है तब इसके तेवर कविता की ज़मीन की तरह खुरदरे हो जाते हैं। पर, ग़ज़ल कभी भी अपनी बनावट और बुनावट में समझौता करना पसंद नहीं करती। ग़ज़ल अगर ग़ज़लियत से भरपूर हो तो वह अपने हर इक शेर में बहुत कुछ सोचने पर मज़बूर कर देती है। इनके संग्रह 'कुछ निशान काग़ज़ पर' से यह शेर देखें-

मुझसे नफ़रत भी दिखावे के लिए कर थोड़ी
इसी नफ़रत ने मुहब्बत का भरम रक्खा है

इस शेर से गुज़रते हुए भले ही 'पल भर के लिए कोई मुझे प्यार कर ले, झूठा ही सही' का ख़याल आता हो, पर यह बात परम सत्य भी तो है। कहते हैं कि तक़रार के बाद के प्यार का अपना अलग ही मज़ा है और अगर यह नफ़रत अपने ही महबूब की हो तो फिर क्या कहने?

आजकल थोड़ी-सी ज़मीन, चंद रूपये-पैसे और झूठे अहम के लिए भाई-भाई दुश्मन हो जाते हैं। एक ही उदर से जन्मे, एक ही साथ पले-बढ़े जब दुश्मनों की तरह बर्ताव करने लगते हैं तो शायर का हृदय चाक हुए बिना नहीं रहता। शेर देखें-

एक गज टुकड़ा ज़मीं का देखिए
भाई को भाई से अनबन दे गया

वहीं जब शायर आज की राजनीति की तरफ अपनी दृष्टि करता है तो बेचैन हो जाता है। स्वार्थ की चादर में सिर से पाँव तक लिपटे सियासी लोग आम आदमी को महज खिलौनों की तरह इस्तेमाल करते हैं। इस बाबत कुछ शेर देखें-

सियासत को कहाँ ये हाथ आया
ये मज़हब नाम का जो टोटका है

या

है मज़हब अब कुछ जेह्नों में
दंगों में उपजे डर जैसा

आजकल प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है, उसका ख़ामियाजा हम सभी भुगतने पर मज़बूर हो रहे हैं। पानी का जल-स्तर काफी नीचे जा चुका है और हमारे देश की आबादी पानी के लिए बहुत परेशानी में है। ऐसे में, शेर देखें-

जान  लो  पर्यावरण  अनमोल  है सबके लिए
डालते इसकी जड़ों में क्यों हो मट्ठा, बस करो

आज का दौर बहुत मुश्किल भरा है। पीपल की ठंडी हवा, चौपाल की बातें घर-परिवार के बीच से कहाँ ग़ायब हो गयी, यह किसी को नहीं मालूम! अब आदमी के पास रिश्तेदारी निभाने तक का वक्त भी नहीं बचा है। स्वभाविक है इस बहुत तेज़ भागते युग में बीवी, बच्चे, ऑफिस, साथी, रिश्ते-नाते सबको एक साथ ख़ुश करना और रखना आसान नहीं है। शेर देखें-

दफ्तर, बच्चे, बीवी, साथी, रिश्ते-नाते, दुनियादारी
सबसे सबको ख़ुश रख पाना इतना तो आसान नहीं है

भारत को दुनिया में देवभूमि का दर्जा प्राप्त है। संस्कार और तहज़ीब इसकी संस्कृति हैं। अपने पुरखों का आदर-सत्कार करना हमारी रगों में शामिल रहा है।पर, आजकल सुख-सुविधाओं की चाहत में आदमी सबकुछ भुला बैठा है। बुजुर्ग घर के ड्राइंग रूम से कब बालकनी में चले गये, पता ही नहीं चला। ज़रूरत है आज की पीढ़ी को संस्कार और तहज़ीब की शिक्षा देने की ताकि वे इन ग़लतियों से बच सकें। शेर देखें-

बुजुर्गों को सुनो-समझो, बहुत अच्छी तरह रक्खो
ये तुमसे कितनी उम्मीदें लगाकर जी रहे होंगे

या

उम्र के अपने तकाज़े हैं ज़रा गौर करें
इसको बिल्कुल न छला जाए यही बेहतर है

आज की पीढ़ी मोबाइल और कंप्यूटर के साथ जीवन जीते स्वयं भी एक गैजेट में तब्दील हो गयी है। जिसे देखो, वह फेसबुक, वाट्सएप्प जैसे सोशल साइट्स में इस कदर उलझा है कि अपने बच्चे, परिवार और पड़ोसी तक को भुला बैठा है। ऐसे में, कोई शायर जब इस तरह के शेर कहता है तो दिल को ठंडक ज़रूर महसूस होगी ही। शेर देखें-

तुम्हारे साथ घड़ी भर को खेलकर बच्चो
मेरे बदन ने दिनों की थकन उतारी है

के० पी० अनमोल एक ऐेसे ग़ज़लकार हैं, जिनकी समय की नब्ज़ पर गहरी पकड़ है। वे बड़ी-बड़ी बातें भी एक शेर के माध्यम से आसानी से कह जाते हैं। ग़ज़लकार की कई ग़जलों में समय व सच की त्रासदी है तो कई में सुखद भविष्य का संदेश भी है। स्वार्थ और उन्माद की घटनाएँ उन्हें अंदर तक कचोटती हैं, जिन्हें उन्होंने एक शेर में इस तरह व्यक्त किया है-

फिर एक वक्त की किरचन चुभी है सीने में
फिर एक हादसा आँखों में उतर आया है

बदलते दौर में इंसानियत की परिभाषा किस तरह बदल रही है, यह भी उनके शेर में देखा जा सकता है। उन्हें यह कहने में गुरेज नहीं है कि अपनी हालत के लिए स्वयं इंसान ही ज़िम्मेदार है। इंसानियत सिर्फ शब्द बनते जा रहे हैं। आम आदमी की पीड़ा काे महसूस करने वाला आदमी ही इस दौर में संवेदनाओं के गिरते स्तर को समझ सकता है। शेर देखें-

तक़दीर चीज़ क्या है उसे इल्म ही नहीं
जिसको नतीजा चाहिए सिक्का उछाल कर
किसको था ये गुमान कि इंसान एक दिन
रख देगा अपनी ज़ात का जीना मुहाल कर

हालाँकि के० पी० अनमोल की शायरी में सिर्फ नकारात्मक चीज़ें नहीं हैं। उन्होंने समाज को जैसा देखना चाहा है, वैसी तस्वीर भी हमारे सामने रखी है। वे कहते हैं कि इस धरती की ख़ूबसूरती हमने ही बनायी है। हमारा हिंदुस्तान हमारे परिश्रम का फल है। संवेदनाओं को बचाए रखने से ही हमारा देश ज़िंदा रहेगा। शेर देखें-

सबने मिल कर सींचा है इस धरती को
ऐसे ही तो ज़िंदा हिन्दुस्तान रहा

कहना न होगा कि 'कुछ निशान कागज पर' गज़ल संग्रह में सभी आवश्यक विषयों पर शेर कहे गये हैं, जो शायर की परिपक्व दृष्टि का परिचायक है तथा संग्रह की तमाम ग़ज़लें पाठकों को बाँधकर रखने में सक्षम है। अब मैं इनके दूसरे ग़ज़ल संग्रह पर आती हूँ।

ग़ज़ल कविता की उत्कृष्ट विधा है। आजकल ग़ज़ल का मुख्य उदेश्य कविता से विमुख हुए पाठकों को पुन: कविता से जोड़ने का है। ग़ज़ल अपने रूप, रंग, बनाव व स्वभाव की वजह से दूर से पहचानी जा सकती है। ग़ज़ल की मुहावरेदारी, व्यंजकता, क्षिप्रता और प्रभाव ही उसे दिल में सीधे उतार देते हैं और उसकी अनुगूंज पाठकों के भीतर उतरती चली जाती है। ग़ज़ल की विकास प्रक्रिया को ध्यान में रखकर फ़िराक गोरखपुरी साहब ने सच ही कहा था कि "ग़ज़ल जब परवान चढ़ती है तो भावात्मक चरमोत्कर्ष की एक श्रृंखला बना देती है; जैसे नाटक में क्लाइमैक्स होता है, वैसे ही एक के बाद दूसरा, लगातार क्लाइमैक्स।" सच कहूँ तो ग़ज़ल पाठक के रूह में समाकर संवाद करती है। यही वजह है कि हिन्दी ग़ज़लों के पाठकों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। हिन्दी ग़ज़ल से मेरा अभिप्राय वैसी ग़ज़लों से है, जिनकी भाषा, शिल्प, मुहावरा, बिम्ब, प्रतीक, तथ्य और कथ्य हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप हों। आज हिन्दी ग़ज़ल लेखकों पर एक तरह की नई ज़िम्मेदारी आ गई है, जो सिर्फ़ अंतर्वस्तु या भाव वस्तु के स्तर पर ही नहीं बनी है बल्कि रूपगत संरचना के स्तर पर भी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज की हिन्दी ग़ज़ल ने अपनी अलग भाषा एवं शिल्प की तलाश कर ली है तथा हिन्दी कविता के बरक्स न सिर्फ खड़ा होने बल्कि उससे बेहतर करने की ओर अग्रसर है। दुष्यंत के बाद हिन्दी ग़ज़ल को हिन्दी ग़ज़लकारों ने अपनी मेहनत से नई ऊँचाइयाँ दी हैं। इनके संघर्ष का ही परिणाम है कि देश की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाएँ आज ग़ज़ल को सम्मानपूर्वक छाप रही हैं।

ग़ज़ल को अपने खून-पसीने से सींचने वालों में एक युवा नाम के० पी० अनमोल का भी है। के० पी० अनमोल अपनी मेहनत के बल पर हिन्दी ग़ज़ल के जाने पहचाने व ज़रूरी नाम बन गये हैं। कोई भी रचनाकार अगर कम उम्र में बड़ी सफलता हासिल करता है तो कहीं न कहीं उसमें कुछ विशेष गुण ज़रूर होता है और उसकी यही विशेषता उसे वैशिष्ट्य की श्रेणी में लाकर खड़ा करती है।

के० पी० अनमोल की ग़ज़लों में सामाजिक एवं राजनीतिक विसंगतियों के साथ-साथ वर्तमान की सड़ांध के प्रति आक्रोश के स्वर भी सुनाई पड़ते हैं। यह कहने में मुझे कोई गुरेज़ नहीं कि इन्होंने अपनी मेहनत के दम पर अपनी एक अलग ज़मीन बनाई है। इनकी ग़ज़लों को अगर आप बारीकियों से देखेंगे तो उसमें जीवन का हर एक रंग आपको समाहित मिलेगा। उदाहरणस्वरूप मैं यह कह सकती हूँ कि इनकी ग़ज़लों में प्रेम के रंग के साथ-साथ घर-परिवार, दोस्ती, वैमनस्य, सामाजिक सरोकार, बाज़ारवाद, पूँजीवाद, पर्यावरण तथा भूमंडलीकरण के रंग भी आपको देखने को मिलेंगे।

के० पी० अनमोल आम आदमी की पीड़ा को बा-ख़ूबी समझते हैं। स्वार्थ भरी राजनीति, धर्म और जाति की पहरेदारी करते समूह और समाज में नफ़रत के फैलाव ने तो लोगों का जीना मुहाल कर ही रखा है। साथ ही महंगाई भी सुरसा के मुँह की तरह दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। शायर ने बस एक शेर में आज के समाज का पूरा चित्रण कर दिया है-

नफ़रत, हिंसा, दंगे, महंगाई, आतंक
इस छाती पर जाने कितने भाले हैं

शायर ने एक तरफ समाज का वास्तविक चित्रण किया है तो वहीं, हौसला रखने वाले लोगों की उड़ान को भी शब्द दिये हैं। शायर कहता है कि जिनके पास हौसला होता है, वे कभी घबराते नहीं हैं। हर मुश्किल का सामना करने के बाद वे अपनी मंज़िल पाकर ही दम लेते हैँ। कुछ ऐसी ही संवेदनाओं की बानगी इन शेरों में व्यक्त हो रही है-

जो फन से हाथ मिला ले, न बोर होते हैं
हुनर की पोटली वाले न बोर होते हैं

उड़ान सीखते पंछी ने चहचहा के कहा
उड़ान सीखने वाले न बोर होते हैं

के. पी. अनमोल कहते हैं कि क़ामयाबी ऐसे नहीं समझी जाती। उसके पीछे की मेहनत और संघर्ष को भी जानना ज़रूरी होता है। क़ामयाबी को समझने के लिए हमें उस व्यक्ति के जुनून और दर्द को भी समझना होगा, जो क़ामयाब हुआ है। अगर जीवन में एक उद्देश्य हो तो मेहनत और जुनून से आदमी कभी पीछे नहीं भागता। शायर ने इस बात को, इस शेर में बहुत ख़ूबसूरती से रखा है-

क़ामयाबी को अगर ठीक से समझना हो
उसके पीछे का जुनूँ, जोश और लगन पढ़ना

शायर ने आपसी सामंजस्य की बाबत बड़ा ही बेहतरीन शेर कह; यह संदेश दिया है कि हमें एक साथ चलना है तो एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करनी होगी। यदि हमें भावनाओं की कद्र करना नहीं आता तो जीवन भर साथ चलने की बात बे-मानी है। टूटते परिवारों की व्यथा इस शेर में व्यक्त हुई है-

एक-दूजे की ज़रूरत में नहीं ढल सकते
यानी वे लोग कभी साथ चल नहीं सकते

बहू का मतलब बेटी है। यदि आपने उसे बेटी समझा है तो बहू भी आपको सास नहीं, माँ समझेगी। पारिवारिक रिश्तों और आपसी संवेदना का बड़ा ख़ूबसूरत चित्रण के. पी. अनमोल ने इस शेर में किया है। बहू को बेटियाँ समझा जाए तो आपसी रिश्तों में कभी खटास नहीं आएगी। शेर देखें-

वो बेटियों-सी बहू है उसे दुआएँ दो
वो अपने हाथ से माँ को दवाई देती है

मनुष्य की ख़्वाहिशों का कोई अंत नहीं। यह दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही हैं। आज वह चाँद पाना चाहता है तो कल सूरज को पाना चाहेगा पर सरकार है कि उसकी आपसी सद्भावना की ख़्वाहिश भी पूरी होने नहीं देती। शेर देखें-

बस इक उम्मीद कि सब चैन से मिलजुल के रहें
बस इक उम्मीद तो सरकार सलामत रखे

टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर एक शेर देखें-

वो वीडियो कॉल से इस बार चाँद देखेगी
अगर ये हो गया तो बात बन गई समझो

युवाओं के पलायन पर के. पी. अनमोल ने अपनी संवेदनाओं को बहुत अच्छी तरह से रखा है। वे कहते हैं कि नौकरी की खोज में शहर जाने वाले युवाओं की खेती में रुचि नहीं है। वह रुपए कमाने के लिए शहर जाता है लेकिन अपने खेत छोड़कर। यदि वह आधुनिक तरीके से खेती करे तो नौकरी से ज़्यादा रुपया कमा सकता है। शहरीकरण के दौर में युवाओं के पलायन ने खेती-किसानी को बहुत नुकसान पहुँचाया है। शायर चाहता है कि युवा अपने गाँव में ही रहे और खेती करे। शेर देखें-

युवा शहर की तरफ चल दिए हैं गाँवों से
ज़मीन खेत है बेकार कहो है कि नहीं

दूसरा शेर इसी संदर्भ में देखें-

जाकर शहर में पैरों को मिल जाएगी ज़मीन
कुछ दिन से इस ही सोच में अपना उमेद है

सफल गृहस्थ जीवन में एक-दूसरे के साथ की चाह रखते जोड़े के भावों को शब्द देता उनका यह शेर देखें-

हाथ पकड़कर चलना तेरा सुख देता है भीतर तक
हाथ पकड़कर चलते रहना अक्सर ही खाने के बाद

सामाजिक ताने-बाने और धार्मिक विभेद पर के. पी. अनमोल का यह शेर बहुत ख़ूबसूरत बन पड़ा है। शायर कहना चाहता है कि जब सभी धर्म के लोग एक-से हैं तो मतभेद क्यों! सृष्टि के संचालक ने हम सभी को एक जैसा बनाया है। किसी में कोई भेद नहीं किया तो हम पृथ्वी पर क्यों आपस में मतभेद कर रहे हैं। शेर देखें-

बंटी, करीम, श्याम, नवल एक से हैं पर
पीछे कुमार, ख़ान, तिवारी में भेद है

के. पी. अनमोल कहते हैं कि आज़ादी भी एक सीमा तक ठीक लगती है। आज़ाद होते हुए हम इतने बहक न जाएँ कि अपनी मर्यादा का भी होश नहीं रहे। हमें आज़ादी चाहिए लेकिन उसका एक बंधन भी हो। हमारी स्वतंत्रता का मतलब किसी दूसरे को नुकसान या ठेस पहुँचाना नहीं है। हम अपनी सभ्यता और संस्कृति के दायरे में ही रहकर कोई काम करें। उन्होंने इस भाव को अपने इस शेर में ढाला है-

कुछ बेड़ियाँ भी ठीक हैं पैरों के वास्ते
हर चीज़ से निजात की आदत न डालिए

आज की ज़िंदगी में बाज़ारवाद हावी है। हमारा रोज़ का खान-पान और रहन-सहन का तरीक़ा भी बाज़ार से तय होता है। बाज़ार हमारे घरों में भी घुस गया है। हम वही करते हैं, जो बाज़ार हमें करने को विवश करता है। शायर कहता है कि हमें अपनी ज़िंदगी जीनी है तो बाज़ार के मोह से बाहर निकलना होगा। हम अपनी ज़रूरतों को देखें। बाज़ार का हिस्सा नहीं बनें। शेर देखें-

बस ढोंग के ही दम पे हर इक चीज़ बिकेगी
बाज़ार अजब शय है, अजब शय है, अजब शय

स्पष्ट है कि इनकी ग़ज़लें समाज का आईना बन, हर एक विषय को छूने का न केवल माद्दा रखती है बल्कि पूरी ईमानदारी से अपनी बात कहने में भी सक्षम हैं। के. पी. अनमोल ने अपने अथक श्रम से जो ज़मीन अर्जित की है, वह और उर्वर हो और उनकी ग़ज़लें रोज़ नई इबारत लिखने में क़ामयाबी हासिल करे। आमीन।

तुम्हें छूनी है इक दिन क़ामयाबी की नई मंज़िल
तुम्हारी कोशिशों में इक अजब-सा चाव दिखता है

कहना न होगा कि के. पी. अनमोल ने कम उम्र में ही बड़ी लकीर खींच दी है। उन्होंने न केवल ग़ज़ल लेखन में अपनी जगह बनायी है बल्कि ग़ज़ल आलोचना में भी उनका काम रेखांकित करने योग्य है।

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रचनाकार परिचय

डॉ० भावना

ईमेल : bhavna.201120@gmail.com

निवास : मुज़फ्फ़रपुर (बिहार)

जन्मतिथि- फ़रवरी 1976
जन्मस्थान- मुज़फ्फ़रपुर (बिहार)
शिक्षा- एम.एस.सी., पीएच.डी. (रसायन शास्त्र), डी.ऐन.एच.ई., एल.एल.बी.
सम्प्रति- व्याख्याता (रसायन शास्त्र विभाग) एवं सम्पादक आँच, वेब पत्रिका
प्रकाशन- 'अक्स कोई तुम-सा', 'शब्दों की क़ीमत', 'चुप्पियों के बीच', 'मेरी माँ में बसी है...' तथा 'धुँध में धूप' ग़ज़ल संग्रह, 'सपनों को मरने मत देना' (काव्य संग्रह), 'हम्मर लेहु तोहर देह' (बज्जिका कविता संग्रह), 'हिन्दी ग़ज़ल के बढ़ते आयाम', 'कसौटियों पर कृतियाँ', 'बदलते परिवेश में हिन्दी ग़ज़ल', 'हिन्दी ग़ज़ल भाषा और मूल्यांकन तथा 'हिन्दी ग़ज़ल : दृष्टि और संकल्पनाएँ' (आलोचना) प्रकाशित। Some Complexes of Benzothiazole Derivative (रसायन शास्त्र) प्रकाशित।
कृतित्व पर कार्य- ‘डॉ० भावना की ग़ज़ल धर्मिता: विविध आयाम और मूल्यांकन’ (सं- डाॅ० माधवी), ’डॉ० भावना की प्रतिनिधि ग़ज़लें’ (सं- डॉ० विनय शुक्ल), ‘डॉ० भावना का ग़ज़ल साहित्य चिंतन और दृष्टि’ (सं- डॉ० ज़ियाउर रहमान जाफ़री)
विशेष- उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगाँव के एम०ए० (हिन्दी) द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम में शामिल पुस्तक (हिन्दी ग़ज़ल के पंचरत्न) के ग़ज़लकारों में से एक।
सम्पादन- कविता के दरवेश: दरवेश भारती, इक्कीसवीं सदी की ग़ज़लें, यह समय कुछ खल रहा है, समकालीन ग़ज़ल के हस्ताक्षर: अनिरुद्ध सिन्हा, डॉ० शान्ति कुमारी: संकल्प से सिद्धि तक'
विशेष संपादन- 'गीत गागर' पत्रिका के 'युवा महिला ग़ज़ल विशेषांक' का संपादन
सम्मान/पुरस्कार-
बिहार राजभाषा विभाग के द्वारा हिन्दी कविता और आलोचना क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए
महादेवी वर्मा पुरस्कार, अंबिका प्रसाद दिव्य अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार, राजभाषा पाण्डुलिपि पुरस्कार, दुष्यंत कुमार रजत स्मृति सम्मान, अपराजिता सम्मान, लिच्छवी महोत्सव सम्मान, तिलकामाँझी राष्ट्रीय सम्मान, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, पटना द्वारा उर्मिला काॅल सम्मान, सृजन लोक युवा कविता सम्मान, चेन्नई इत्यादि
निवास- आद्या हॉस्पिटल, ज़ीरोमाइल, मुज़फ्फ़रपुर (बिहार)
मोबाइल- 9546333084