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सुजाता की लघुकथाएँ

सुजाता की लघुकथाएँ

अपने साथियों की दर्द भरी कहानी सुनकर हवा की आँखें भीग गयीं- मेरी अपनी दास्तान कुछ ऐसी ही है भाई!

नसीहत का सौदा

माँ हाथ में एक रुपए का सिक्का लिए बाज़ार निकली। बच्चे की ललचाई आँखें सिक्के पर टिकी थीं। माँ, आते समय कुछ लेती आना!

राशन की दुकान पर लाइन लगी थी। ताक-झाँक करने के बाद वह आगे बढ़ गयी। मिठाई वाली दुकान पर मात्र भाव पूछा। चौराहे पर नसीहतों की नीलामी हो रही थी, उसने सिक्का देकर एक नसीहत ख़रीद ली, 'सहनशीलता अमूल्य धन है।'

घर जाकर ख़ुशी-ख़ुशी बच्चे के हाथ में थमा दी। बच्चा ज़िद करने लगा– मिठाई–खिलौना!
माँ ने उसे चपत रसीद की। वह रो पड़ा और सूनी आँखों से ख़ाली हथेलियों को देखता रहा।
नसीहत ज़मीन पर गिरी पड़ी थी।

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टोपियाँ

टोपियों वाला रंग-बिरंगी, भांति-भांति की टोपियाँ बेचकर पेड़ के नीचे थक कर गहरी नींद सो गया। पेड़ के ऊपर चालाक बंदर चुपचाप देख रहे थे। वे नीचे उतरे और टोपियाँ पहन, ख़ुशी से झूमने लगे। टोपियों वाला नींद से जागा और सारा माजरा जानकर हक्का-बक्का हो गया। उसने अपने टोपी उतारकर फेंक दी, लेकिन चालाक बंदर अपनी टोपियाँ फेंकने की बजाए उसकी ओर मुँह चिढ़ाकर हँसने लगे।

टोपियाँ तो उनके पास थीं ही, अब उन्हें किन्हीं कुर्सियों वालों की तलाश थी।

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काला धुआँ

धरती के चेहरे पर उदासी की लकीरें साफ़ दिखाई दे रही थीं। हवा ने पूछा- क्या बात है बहना? धरती बोली- कहने को मेरे पास बड़ी-बड़ी इमारतें, फाइव स्टार होटल, शॉपिंग प्लाज़ा और बहुत कुछ है। लेकिन मैं खुलकर साँस तक नहीं ले सकती। मेरा सारा परिवार इंसान के ज़ुल्म का शिकार है। जंगल, जानवर, हरियाली, वनस्पतियों का क़त्लेआम हो रहा है। एक ही चिंता मुझे दिन-रात खाए जा रही है, मेरे बाद मेरे बच्चों का क्या होगा?

पानी बग़ल में बैठा उनकी व्यथा-गाथा सुन रहा था। उसे लगा जैसे किसी ने उसकी दुःखती रग पर हाथ रख दिया हो। बड़ी हिम्मत कर बोला- मेरा दर्द बहुत पुराना है। बरसों से इंसान मेरा खून चूस रहा है। वह जलभक्षी हो गया है, इतना स्वार्थी कि मेरे शरीर की आख़िरी बूँद तक निचोड़ लेना चाहता है। अब और बर्दाश्त नहीं होता।

पानी की दुःख भरी कहानी सुन, अग्नि बोली- तुम सोचते होंगे मेरी ताक़त सबसे ज़्यादा है। मैं ही बिजली के रूप में ताप उत्पन्न करने वाली, प्रकाश देने वाली हूँ। पृथ्वी, जल, वायु ,आकाश मुझमें ही लीन हो जाते हैं, पर मौजूदा हालात में कितनी बेबस और परेशान हूँ। प्रदूषण की मार से अछूती नहीं। कहीं जंगल की आग फैल रही है, कहीं भट्ठी में धू–धू पुतले जल रहे हैं, अपनी ही आग में झुलस रही है धरती।

अपने साथियों की दर्द भरी कहानी सुनकर हवा की आँखें भीग गयीं- मेरी अपनी दास्तान कुछ ऐसी ही है भाई! तन-मन छलनी, शरीर पर फफोले पड़े हैं और एक वह जो मुझे तबाह करने को नित्य नए तरीके ईजाद करता, मुझ पर कालिख पोत रहा है। मैं मुक्त होते हुए भी उसकी कैद में हूँ।

ऊपर बैठे आकाश ने भी उनकी हाँ में हाँ मिलाई। धरती, जल, अग्नि और हवा बोले– तुम तो मज़े में हो भाई ,इंसान के हाथ तुम तक नहीं पहुँच सकते। आकाश ने अपने दिल में हुआ बड़ा-सा छेद दिखाते हुए कहा- तुम्हें शायद मालूम नहीं कि इंसान के स्वार्थ की लपटें कितनी ऊपर तक पहुँच गयी हैं। उसने हमें बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ख़तरे का बिगुल बज रहा है और काला धुआँ फैलता जा रहा है।

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रचनाकार परिचय

सुजाता

ईमेल : sujata.manocha@gmail.com

निवास : अमृतसर (पंजाब)

जन्मतिथि- अप्रैल 1959
जन्मस्थान- हिमाचल प्रदेश
शिक्षा- एम०फिल० (हिंदी)
प्रकाशन/ प्रसारण- 'बर्फीला मौन जब पिघलता है', 'देखना तब' एवं 'धूप सहेली' काव्य पुस्तकें प्रकाशित प्रमुख पत्र–पत्रिकाओं में मूल एवं अनुदित रचनाएँ प्रकाशित। रेडियो, दूरदर्शन, कवि सम्मेलनों में भी हिस्सेदारी।
विशेष- अनुवाद में रुचि। पंजाबी और अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद।
निवास- अमृतसर (पंजाब)
मोबाइल- 9888569778