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राघव दुबे 'रघु' की लघुकथाएँ

राघव दुबे 'रघु' की लघुकथाएँ

"मेरा यह जीवन आपका दिया हुआ है, अब आप ही हमारे लिए माँ भी हो और पिताजी भी।" कहते हुए बेटा उनके कपड़े बदलने लगा था।

फ़ीका शृंगार

"देख तो रत्ना, मैं कैसी लग रही हूँ? आज करवा-चौथ का व्रत हैं न इसलिए पूरे बीस हज़ार रुपये ख़र्च करके आयी हूँ l पार्लर वाली ने मुझे सुबह से ही बुला लिया था और अपने जादुई हाथों से मुझमें देखो कैसा निखार ला दिया है!" पार्लर से लौटते ही मिसेज गुप्ता, अपनी कामवाली बाई से अपने रूप का फीडबैक लेने लगींl
"अरे वाह दीदी! एकदम हिरोइनी माफ़िक लग रही हो आपl सच में जादू कर दिया पालर वाली नेl साहब जब आएँगे तो क़सम से दीदी, आपको देखते ही रह जाएँगे।"
"अरे झाड़ पर मत चढ़ा मुझे। देख ये साड़ी भी देख; पूरे दस हज़ार की आयी है। तेरे साहब ने बुटीक से ख़ुद ऑर्डर की है।"
"बहुत सुंदर है दीदी। छूते ही मैली हो जाए। आप पर ख़ूब जचेगी।"
"अरे तू नहीं मनाती करवा-चौथ?"
"मनाती हूँ न दीदी।"
"अच्छा, क्या तैयारियाँ करी हैं तूने, बता तो ज़रा?"
"क्या तैयारी दीदी? हमारे पास इतना पैसा कहाँ कि नई साड़ी ला सकें, पालर जा सकें।"
"मतलब तेरा मरद कुछ नहीं करता तेरे लिए?"
"करता है न दीदी। आज सुबह से उसने मुझे कुछ नहीं करने दिया। कहता है कि तेरा उपवास है, तू आराम कर। झाड़ू, पौंछा, बर्तन, कपड़े सब आज उसने ही किया। मैंने मेहंदी लगाई तो वो मुझे ही निहारता रहा। मेरे बालों को आज उसने ही बनाया। मुझे मेहंदी लगाकर उसने अपने हाथों से मेरा शृंगार किया। ये गजरा देखो दीदी! अपने हाथों से बनाया है उसने।"
"सच में रत्ना, तू बहुत नसीब वाली है रे!" कहते हुए मिसेज गुप्ता ने उसके गजरे को निहारा तो उसके सामने उसे अपना बेशकीमती शृंगार एकदम फ़ीका लग रहा था।

 

 

सफ़ाई

पत्नी के जाने के बाद मनोहर नहीं चाहते थे कि अपने अस्वस्थ शरीर को लेकर बेटे-बहू के पास रहें और अपने पड़ोसी श्यामलाल की तरह जिल्लत की ज़िंदगी गुज़ारें लेकिन इकलौते बेटे-बहू की ज़िद के आगे उनकी एक न चली। इसलिए मनोहर जबसे शहर आये तबसे ही कुछ अनमने-से रहते थे।

आज रात से ही उनका शरीर कुछ साथ नहीं दे रहा था। शायद किडनी की बीमारी फिर से बढ़ गई थीl आधी रात से ही बार-बार पेशाब जाते हुए वे बहुत थक चुके थेl इस बार बहुत तेज़ दर्द हुआ और वे बाथरूम तक जाने के लिए आगे बढ़े ही थे कि उनके पैर जबाव दे गये और वे गिर पड़े।
गिरने की आवाज़ सुनकर बेटा-बहू दौड़ते हुए कमरे में आ गये।

"क्या हुआ पिताजी, आप ठीक तो है?" कहते हुए बेटे-बहू ने मनोहर को बेड पर बिठा दिया l
"कुछ नहीं बेटा, शायद किडनी की प्रॉब्लम बढ़ गई है। पर तुम चिंता मत करो, मैं सब साफ़ कर दूँगा। तुम लोगों को परेशान नहीं करूँगा।" कहते हुए मनोहर का पूरा शरीर काँपने लगा।
"कैसी बात करते हैं पिताजी, हम दोनों किसलिए हैं? आपकी देखभाल के लिए ही न! आपको परेशानी बढ़ गई और आपने बताया भी नहीं। मेरा यह जीवन आपका दिया हुआ है, अब आप ही हमारे लिए माँ भी हो और पिताजी भी।" कहते हुए बेटा उनके कपड़े बदलने लगा था। कुछ ही देर में बहू-बेटे ने कमरे की सफ़ाई कर दी थी और शायद मनोहर के मन की भी....।

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रचनाकार परिचय

राघव दुबे 'रघु'

ईमेल : raghavdubeyraghu@gmail.com

निवास : इटावा (उ०प्र०)

संप्रति- शिक्षा विभाग बिहार में कार्यरत
प्रकाशन- देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं यथा- मनोहर कहानियाँ, अदबनामा, विवेचना ओज, विश्वगाथा, प्रेरणा अंशु, अमर उजाला, पल्लवन, सुवासित इत्यादि में रचनाओं का निरंतर प्रकाशन
संपर्क- महावीर नगर, अड्डा पाय, इटावा (उ०प्र०)- 206003
मोबाइल- 8439401034