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प्रेरणा गुप्ता की लघुकथाएँ

प्रेरणा गुप्ता की लघुकथाएँ

माँजी के करुण विलाप से सबका हृदय काँप उठा, “तेरी कही बात सच हो जाएगी बहू, सपने में भी न सोचा था। अब तो ज़िंदगी पर से मेरा भरोसा ही टूट गया।”
जैसे ही चार काँधे अर्थी को उठाने के लिए आगे बढ़े, वह चीख पड़ीं, “अरे, ये तो बताओ, कौन-से घाट लिए जा रहे हो बहू को?”

बेटे की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे, काँपती आवाज़ में बोला, “उसकी देह मेडिकल कॉलेज दान के लिए भेजी जा रही है, उसकी यही तो एक अंतिम इच्छा थी।”

गांधी जी के बंदर

सुबह से मृणाल की तबीयत कुछ अनमनी-सी थी। मना करने पर भी श्रेष्ठ नहीं माना और उसे डॉक्टर को दिखाने के लिए अपने साथ कार में लेकर निकल पड़ा। बेटे का दुलार देखकर उसके चेहरे पर प्यार भरी एक स्मित मुस्कान बिखर आयी, "ईश्वर! ऐसी संतान हर माँ को दे।"

वह सोच ही रही थी कि अचानक तेज़ झटके के साथ कार रुक गयी। वह ख़ुद को सम्हालती, उसके पहले ही श्रेष्ठ कार से उतरकर बीच सड़क पर जा पहुँचा। कलेजा तेज़ी से धुक-धुक करने लगा, “हे भगवान!”

“अबे स्साले! अंधा है क्या? सड़क अपने बाप की समझ रखी है?”

देखा तो वह एक रिक्शेवाले से उलझ रहा था।

रिक्शेवाला भी दांत निपोरते हुए बोला, “तो क्या तेरे बाप की है? तू भी तो देख के चला सकता था।”

तू-तू मैं-मैं बढने लगी।

“अच्छा तो जुबान लड़ाता है! माँ...बहन... अभी मैं तेरी ऐसी की तैसी करता हूँ।”

मृणाल चीख पड़ी, “नहीं श्रेष्ठ, रुक जाओ! हाथ भी मत लगाना उसे। उसे रोकने के लिए वह भी कार से उतर पड़ी।

भीड़ एकत्र होने लगी। यतायात भी रुक गया।

“वह उसका हाथ खींचती हुई उसे कार तक ले आयी, “पागल हो गये हो क्या?”
“तुम न होती तो इसकी हड्डी-पसली एक कर देता। गुस्से से बोलता हुआ वह ड्राइविंग सीट पर जा बैठा।

“आओ, जल्दी आकर बैठो।

“नहीं! अब मुझे तेरी कार में नहीं बैठना। अच्छा ही हुआ भगवान ने तुझे बहन नहीं दी। वरना...”
“तुम भी न माँ...!”

“मुझे पता ही नहीं चला कि गांधी जी के तीन बंदरों वाली कहानी सुनने वाला मेरा बेटा न जाने कब और कहाँ खो गया?” कहते-कहते उसकी आवाज़ भर्रा गयी।

“ओह माँ! तमाशा मत बनाओ।”

“तमाशा तो तूने मेरा बनाया है। जिस दिन तू 'माँ' शब्द की इज़्ज़त करना सीख जाएगा, उस दिन मुझे माँ कहकर पुकारना।” कहती हुई वह तेज़ क़दमों से आगे बढ़ गयी।

 


ज़िंदगी की जंग

रौशनी पड़ते ही आँखें मिचमिचा उठीं और शरीर ने भी एक लम्बी अँगड़ाई ली। मगर पाँव हिलने को तैयार न थे। मन, जो सबकुछ देख रहा था, उससे रहा न गया। वह उन्हें झकझोरते हुए बोला, "चलो उठो, सुबह हो चुकी है।"

पाँव कुनमुना उठे, "बस, थोड़ी देर और ...।"

"तुम्हें हुआ क्या! तुम तो सदा अनुशासन प्रिय थे!" मन आश्चर्यचकित हो उठा।
जिह्वा को भी अब चाय की तलब लग आयी थी, मगर वह मौन साधे बैठी रही।

तभी दाँया हाथ काँपता हुआ, पाँव की ओर बढ़ चला। उन्हें सहलाता, उनकी मनुहार करने लगा।
पाँव ने धीरे से अपनी ऊँगलियाँ हिलायीं, "उठना तो चाहता हूँ, मगर पोर-पोर ऐंठा जा रहा है, नसें तनी पड़ी हैं।“ फिर एक गहरी साँस लेते हुए बोला, “हम सभी ने पिच्चासी वर्ष पूरे कर लिए, अपने जीवनकाल के। ये सब तो अब उम्र की मार है।"

"हाँँ, सही कहा। वो भी क्या दिन थे, जब देश की सीमा पर, दुर्गम पहाड़ियों पर दौड़ते हुए, तुमने क़दम-क़दम पर मेरा साथ दिया था।" पाँव को सहलाता हुआ हाथ अचानक थम गया।
"याद करो, तब हम कितने जवान हुआ करते थे। तुमने तो दुश्मनों के छक्के ही छुड़ा दिए थे। क्या धड़ाधड़ गोलियाँ बरसायी थीं उन पर!" पाँव भावुक हो उठा।
"कमाल तो हमारी इन आँखों का था। ज्यों ही ये निशाना साधतीं, मैं गोलियाँ दाग देता।"
अपना नाम सुनते ही आँखें रो पड़ीं। और मन, उदासी में डूबने लगा।

अचानक मस्तिष्क ने शरीर के सभी अंगों को सावधान करते हुए संदेश भेजा, "बीती बातें छोड़ो, वक्त आ गया है, अब मन को साधने का। मेरे वीर सिपाहियों! उठो चलो और लग जाओ अपनी दिनचर्या पर।"
सुनते ही शरीर फौरन हरकत में आ गया। ऐंठते हुए पाँव ज़मीन पर जा टिके और झूलते शरीर को साधते हुए आगे बढ़ चले, "असली जंग तो अभी बाकी है; 'ज़िंदगी की जंग'।"

 


कल की भोर

“ऐ बहू, ज़रा सुन तो ...।”
"जी माँजी, आई।”
“मेरे पास आकर बैठ! बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रही हूँ तुझसे, जो किसी और से नहीं कह सकती।” मुस्कुराते हुए, मगर स्वर गम्भीर हो चला।

माँजी के रहस्यमयी अंदाज़ ने बहू के मन में जिज्ञासा जगा दी।

“अंदर तिजोरी में एक लाल रंग की मखमली डिब्बी रखी हुई है।” धीमे से कहती वह उसके और भी नज़दीक सरक आयीं। “उस डिब्बी में दो इंच का सोने का एक तार रखा हुआ है।”
न चाहकर भी बहू की निगाहें, उनकी कमर की ओर चली गयी, जो बरसों से अनगिनत चाभियों से गुँथे गुच्छे का बोझ सम्हाले हुए थी।
"तो माँजी …?”
“तो क्या, जब मैं इस दुनिया से जाने लगूँ, तब तू उस तार में से एक छोटा-सा टुकड़ा तोड़कर, तुलसी और गंगाजल के साथ मेरे मुँह में डाल देना और बचे हुए तार से सारे कुनबे का अच्छे से भोज करा देना।”

बहू अनमनी हो उठी, “क्यों करती हैं ऐसी बातें माँजी!” कहती हुई वह उठ खड़ी हुई। माँजी ने उसका हाथ थाम कर अपनी ओर खींच लिया, “अरी, एक ख़्वाहिश और भी तो सुनती जा मेरी, मुझे ले जाने के लिए जब तैयार किया जाए ना, तो मैं चाहती हूँ, सबके सामने मुझे तैयार न करना।"

अब वह, मस्तिष्क पटल पर उभरती आकृतियों में से कुछ ख़ास-ख़ास को चुनने लगी, बड़ी दीदी, बड़ी भाभी, छोटी दीदी और मैं ... अचानक वह बोल पड़ी, माँजी, ये सारी बातें आप घर के अन्य सदस्यों को भी बता दीजिए तो बेहतर होगा।"

माँजी नाराज़ हो उठीं, "क्यों? जब तू है तो उन सबसे क्यों कहूँ? फिर धीरे से उलाहना देते हुए बोलीं, "ऊँह! उनका क्या भरोसा! मुझे भरोसा है, तो सिर्फ तुझ पर।"

एक गहरी साँस लेते हुए बहू बोली, “मगर, ज़िंदगी का तो कोई भरोसा नहीं माँजी! क्या पता पहले मैं ही चली जाऊँ!”
माँजी ने झट अपना हाथ उसके होठों पर धर दिया।

अचानक बेटे की आवाज़ कानों में पड़ते ही उनकी तंद्रा टूट गयी और वह सुबकती हुई अपने अतीत से बाहर निकल आयीं।

“माँ, कब तक इसका हाथ थामे बैठी रहोगी? अब जाने दो इसे। बाहर गाड़ी खड़ी है, सब इंतज़ार कर रहे हैं।”

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माँजी के करुण विलाप से सबका हृदय काँप उठा, “तेरी कही बात सच हो जाएगी बहू, सपने में भी न सोचा था। अब तो ज़िंदगी पर से मेरा भरोसा ही टूट गया।”
जैसे ही चार काँधे अर्थी को उठाने के लिए आगे बढ़े, वह चीख पड़ीं, “अरे, ये तो बताओ, कौन-से घाट लिए जा रहे हो बहू को?”
बेटे की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे, काँपती आवाज़ में बोला, “उसकी देह मेडिकल कॉलेज दान के लिए भेजी जा रही है, उसकी यही तो एक अंतिम इच्छा थी।”

 


मृगतृष्णा

दो दिन में ही नीतू ने गीतांजलि का मन मोह लिया था। हँसती तो मानो फूल झड़ते। अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी और कहाँ उसका पति सुमित, ऐसी पत्नी पाकर तो उसके भाग्य खुल गये।

आज नीतू वापिस जा रही थी। गीतांजलि उसके साथ उसे छोड़ने स्टेशन के लिए रवाना हो गयी। कार ड्राइव करते हुए वह उससे बातें भी करती जा रही थी।

“नीतू, तुम्हारे साथ दो दिन ऐसे बीते कि पता भी न चला। मालुम है, तुम्हारा जब फोन आया था कि तुम मुझसे मिलने आ रही हो तो मैं असमंजस में पड़ गयी थी। “हे भगवान! ये मेरे पास क्यों आ रही है? हमारी तो ज़्यादा मुलाक़ात भी नहीं है। वैसे भी मैं तुम्हारी दूर की जिठानी लगती हूँ।”

नीतू खिलखिला पड़ी। “भाभी, ये सब मैं नहीं जानती। हमारा तो सिर्फ प्यार का रिश्ता है। फिर मैं आपको जी भर के देखना भी चाहती थी, कहकर वो चुप हो गयी।

“जी भर कर मुझे देखना...? समझी नहीं मैं।”

वह चुप थी। उसकी चुप्पी गीतांजलि को रहस्यमयी-सी लगने लगी। उसका अंर्तमन उसे कुरेदने लगा था। मगर वह स्टीयरिंग सम्हालने में लगी थी।

“नीतू, तुम कुछ कह रही थी न?”

“लीजिए भाभी, स्टेशन भी आ गया।”
कुली के साथ दोनों भागती हुई प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँच गयीं। ट्रेन आ चुकी थी। सामान जँचाकर नीतू जैसे ही अपनी बर्थ पर बैठी, सिग्नल ग्रीन हो गया।

“अच्छा नीतू! पहुँचकर फोन करना और सुमित को मेरा स्नेह बोलना।” कहते हुए गीतांजलि ने नीतू का हाथ अपने हाथ में ले लिया।

उसने भी कसकर उसका हाथ थाम लिया और प्यार भरी निगाहों से देखते हुए बोली, “आपका नाम सुनकर वो ख़ुश हो जाएँगे।... आप जानना चाहती थीं न कि मैं आपको जी भरकर क्यों देखना चाहती थी? क्योंकि...।“ कहते-कहते उसका गला रुंध गया।

“हाँ-हाँ बोलो...!”

वह भर्राई हुई आवाज में बोली, “आपको नहीं मालूम, मैं जबसे शादी होकर आयी हूँ, सुमित के दिलो-दिमाग़ में बस आप...। वो आपको चाहते हैं, मुझे नहीं।”

सुनते ही गीतांजलि ने झट से अपना हाथ अपनी ओर खींच लिया, मानो उसे बड़ी ज़ोर से करेंट मार गया था। ट्रेन जा चुकी थी, मगर वह जहाँ के तहाँ खड़ी रह गयी।

 


महक

कार से उतरते ही, "बुआ आ गयीं। बुआ आ गयीं।" कहती हुई मनु मुझसे आ लिपटी।
घर में ख़ुशी का माहौल छा गया था। ऊपर से मौसम भी इतना सुहावना हो चला था कि हल्की रिमझिम-सी बारिश में मेरा मन छत पर जाने को हो आया। साथ ही अपने हाथों से बनाई क्यारी भी देखने को जी ललक आया।

"क्यों भैया, मेरे पेड़-पौधों का क्या हाल है?"
बदले में भाभी हँसकर बोली, "जाइए, मिल आइए अपने पेड़-पौधों से, कबसे आपका इंतज़ार कर रहे हैं।"

मनु को साथ लेकर मैं एक साँस में सीढ़ियाँ चढ़ती ऊपर पहुँच गयी।

अहा! एकाएक रजनीगंधा की ख़ुशबू का एक झोंका मन को महका गया।

ओह! आज भी वह अपनी बालकनी में बैठा इधर ही घूर रहा था, लफंगा कहीं का।

इतने में मनु ने हाथ हिलाकर उससे अभिवादन किया।

मैंने हल्के से उसे डाँट लगाई, "क्यों बोलती है तू उससे। मालूम नहीं, वो आदमी ठीक नहीं।"

"अरे नहीं बुआ, अंकल बहुत ही अच्छे इंसान हैं, वो अक्सर हमें गार्डनिंग टिप्स भी दिया करते हैं। मगर आप ऐसे क्यों बोल रही हैं उन्हें?"

मैं गम्भीर स्वर में बोली, "कोई यूँ ही थोड़ी न कह रही। शादी के पहले जब भी मैं पेड़-पौधे देखने छत पर आया करती, तब भी ये जनाब घूर-घूर कर देखा करते थे मेरी ओर। देखो, आज भी कैसे घूर रहे हैं।"

"ओह नो बुआ, बहुत पहले उन्होंने पापा को बताया था कि वे ख़ाली समय में हमारी छत की हरियाली निहारा करते हैं। दरअसल उन्हें पेड़-पौधों से बहुत लगाव है ना और उनके घर में तुलसी के गमले के अलावा और कुछ ज़्यादा रखने की जगह नहीं है। मालूम, ये जो इतने सारे रजनीगंधा लगे हैं ना, सब उन्हीं अंकल ने लाकर दिए हैं।"

"...!"

मनु बोले जा रही थी और मैं ठगी-सी ख़ुद की बनाई वर्षों पुरानी अवधारणा के बोझ तले, ख़ुद से ही क्षमायाचना के लिए विकल हुई जा रही थी।

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रचनाकार परिचय

प्रेरणा गुप्ता

ईमेल : prernaomm@gmail.com

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 5 फरवरी 1961
जन्मस्थान- ब्यावर (राजस्थान) भारत
लेखन विधा- लघुकथा, कहानी, कविता एवं संस्मरण
शिक्षा- स्नातक संगीत
सम्प्रति- स्वतंत्र 
प्रकाशन- लघुकथा-संग्रह 'सूरज डूबने से पहले'
सम्मान- गायन मंच पर
प्रसारण- विभिन्न लघुकथा संकलन, पत्र-पत्रिकाओं, ई पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं विभिन्न संगोष्ठियों में प्रसारित।
संपर्क- फ्लैट नम्बर : 102,आनन्द पैलेस, 10/499, खलासी लाइन(शीलिंग हाउस सीनियर विंग स्कूल के बगल में), कानपुर-(उत्तर प्रदेश)- 208001
मोबाइल- 8299872841