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नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

डॉ० स्वदेश भटनागर की कविताएँ

डॉ० स्वदेश भटनागर की कविताएँ

देह के भूगोल की कार्यप्रणाली का यह सच
मुझे ब्रह्मांड की किताब का
सबसे सुंदर चित्र बना देता है

प्रार्थना

हे प्रभो!
मुझे हिचकी भरे आँसुओं में आनंद दो
इतना कि
अपने होठों के सफ़ेद बाग़ीचे में
मुस्करा सकूँ मैं
जैसे
मुस्कराता है वृक्ष चिड़ियों की रोशनी में

प्रभो!
मुझे सदा अपनी सुई की चोंच में
सूरजमुखी की तरह स्थिर रखना
खेत से बड़ा पेट कभी मत देना
न अश्व से अधिक श्रम की शक्ति
देना तो
ऋग्वेद के चरवाहों की करुणा ज़रुर देना
और
तोलस्तोय वाले किसानों से ज़्यादा
ज़मीन मत देना मुझे
जो मेरे इस्तेमाल में न आए कभी

प्रभो!
मेरे अँधेरों को देना एक संपूर्ण दृष्टि
उतना देना जल, जितनी दूर तक रोटी की ख़ुशबू
सदैव खाता रहे अदृश्य मेरी थाली में
मैं खाता रहूँ उसकी जूठन अपनी थाली में

प्रभो!
कभी मेरे सत्य को तर्क मत देना
मत देना मुझे वह,
जिसके लिए प्रार्थना करती हो पृथ्वी
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के मध्य
आँसुओं की लय पर
बाँसुरी बजती रहे सदा मेरी

प्रार्थना में
प्रार्थना की सरस्वती बहती रहे।

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चित्र

अपने पैर बहुत अच्छे लगते हैं मुझे
ये धूप में चलकर तुम तक पहुँचते हैं
ये रास्ते का नक़्शा होते हैं

अपनी आँखें बहुत अच्छी लगती हैं मुझे
इनसे निकलती हैं आत्मा की आवाज़ें
पानी की चिंगारियाँ

अपने हाथ बहुत अच्छे लगते हैं मुझे
ये कबूतर जैसे दिखते हैं
कभी नहीं भूलते घर का रास्ता
बताते हैं
जीवन गोल है अपनी परणति में

अपने स्पर्श बहुत अच्छे लगते हैं मुझे
छुअन के समय पृथ्वी
पुड़ियाभर हँसी, पुड़ियाभर आँसू
यही क़ैफ़ियत है इनकी

और चुंबन
अरे ये तो देह का बीजमंत्र होते हैं
उलझे बालों को
चेहरे पर ही सुलझा देते हैं

देह के भूगोल की कार्यप्रणाली का यह सच
मुझे ब्रह्मांड की किताब का
सबसे सुंदर चित्र बना देता है

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बुद्धिमान मनुष्य : पीड़ित आकाश

फुटपाथ!
तुम बिस्तर बन जाओ

कूड़ेदान!
तुम रोटी हो जाओ

मूर्ख!
तुम कुत्तों को
ज्ञानियों से लड़ाओ

फूल!
तुम भाड़ में चने की तरह भुन जाओ

लड़की!
तुम समुद्र के साथ लेट जाओ

चाकू!
यह सदी तुम्हारी है
जीभर कर हँसो

आत्मा!
तुम भेड़िए की लार बनकर
ज़मीन पर टपको

मनुष्य!
तुम केवलआकाश देखो

यह हिंसा का नवीन संस्करण है

मनुष्य जब बुद्धिमान हो जाता है
आकाश पीड़ित होने लगता है

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पवित्र बेचैनी

कभी वह
पत्थर तोड़ता है
स्वयं की वंदना करता है

कभी वह
शीशा तोड़ते हुए
किरच-किरच होता है
अपने आपको चुभता है

कभी वह
लकड़ी चीरकर
चिंगारी-चिंगारी होता है

कभी वह
अँधेरे में धुआँ-धुआँ होता है
कभी सरापा स्याह-स्याह

अजीब व्याकरण है उसकी बेचैनी का
रोटी माँगता है, पानी माँगता है न साँसें

उसका बेचैनी में लथपक्ष होना
और बात है
बेचैनी से लबालब होना कुछ और बात

उसके बूँद-बूँद टूटकर अंतरिक्ष में
बिखरने से पहले ही
गीली हो जाती हैं मेरी आँखें

क्या इतनी पवित्र हो सकती है
किसी की बेचैनी?

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सादर निवेदन

क्या तुम बता सकते हो
रोटी में
रोटी की कितनी ख़ुशबू है!

क्या तुम बता सकते हो
एक इच्छा में
किस रंग के पसीने की चिंगारियाँ होती हैं!

क्या तुम बता सकते हो
एक नर्क बनाने में
कितने स्वर्गों को एलियन होना पड़ा!

क्या तुम बता सकते हो
अपने चेहरे में
कितने चेहरों को डुबोया है तुमने!

क्या तुम बता सकते हो
नाव
पानी से बाँधी जाती है या तट से!

उत्तरों की इस जद्दोजहद में
एक रचनात्मक अँधेरा छुपा है

तुम्हें सिर्फ मुर्गे की भोर की बाँग होना है

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रचनाकार परिचय

स्वदेश भटनागर

ईमेल : bharti19852232@gmail.com

निवास : मुरादाबाद (उ०प्र०)

जन्मतिथि- 18 दिसम्बर, 1954
जन्मस्थान- आगरा (उ०प्र०)
शिक्षा- एम० ए० (हिन्दी, अंग्रेजी एवं दर्शनशास्त्र) पीएच० डी०
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, दोहे, नज़्में, कतआत एवं गद्य कविताएँ
प्रकाशन- चार कविता संग्रह प्रकाशित, देशभर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
प्रसारण- आकाशवाणी, रामपुर से रचनाओं का नियमित प्रसारण
संपर्क- निकट कैलटन स्कूल, लाईनपार, मुरादाबाद (उ०प्र०)- 244001
मोबाइल- 7983639799