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प्रतीक झा 'ओप्पी' की कविताएँ

प्रतीक झा 'ओप्पी' की कविताएँ

ओपेनहाइमर की नीली आँखों ने
सबकुछ भस्म कर दिया
अब खबर है-
भौतिकी ने प्रतिशोध की ठान ली है

कर्त्तव्य ही पूजा है

तुम वर्षों से यही कहते आए हो-
कर्म ही पूजा है।
पर आज मैं तुमसे पूछता हूँ-
कर्त्तव्य को पूजा क्यों नहीं कहते हो?
कर्म की अनेकों छायाएँ
हमें कर देती हैं भ्रमित-
उचित-अनुचित की सीमाओं में
परिस्थिति और सन्दर्भों की उलझनों में
पर कर्तव्य-
सदैव होता है उचित कर्म
सत्य, विवेक और धर्म से जुड़ा हुआ
अब मानवता को कर्म नहीं
कर्त्तव्य की आवश्यकता है
कान्ट और ब्रैडले जैसे दार्शनिकों ने भी
कर्तव्य को ही माना है परम

तो अब तुम नया मन्त्र दो
नई चेतना जगाओ-
कर्त्तव्य ही पूजा है
यह स्वर हर दिशा में फैलाओ

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उसने कब पूछा था

रातों को जागना मना था
रात में लिखना मना था
मगर मैं तो पूरी रात
सिर्फ सिगरेट सुलगाता रहा
और बस यही सोचता रहा-
आख़िर मेरी पत्नी ने आख़िरी बार
कब पूछा था मुझसे
चलो, आज मेरे हाथ का बना कुछ खा लो!

अब तो रोटियाँ भी मशीन-सी लगने लगी हैं
न उनमें स्वाद है, न वह आदत पुरानी
वो जो कभी मुस्कराकर कहती थी
ज़िद न करो, गरम है अभी- छू भी मत।

अब मैं देखता हूँ
दीवारों पे हमारी तस्वीर धुंधली है
और रसोई में हर शाम
सन्नाटा पकता है

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जिसे कोई नहीं हरा सका : ओपेनहाइमर

वर्षों से चला आ रहा
भौतिकी का घमण्ड
चूर-चूर हो गया
जब उसका सामना
ओपेनहाइमर से हुआ

औरों की तरह
भौतिकी ने भी सोचा
वह अपनी
जटिलता और रहस्यों में
उसे उलझा देगी
थका देगी
तोड़ देगी
लेकिन
ओपेनहाइमर की नीली आँखों ने
सबकुछ भस्म कर दिया
अब खबर है-
भौतिकी ने प्रतिशोध की ठान ली है
वह निकली है
सहयोगियों की खोज में
सुना है
वह गणित, विज्ञान,
दर्शनशास्त्र, साहित्य और धर्म
से हाथ मिलाना चाहती है
ताकि ओपेनहाइमर पर
आख़िरी आक्रमण कर सके
अपना बदला पूरा कर सके
पर उसे क्या पता
ओपेनहाइमर
इन सबको पहले ही
जीत चुका है

जैसे ही
वे उसका नाम सुनेंगे
अपने द्वार
तुरन्त बन्द कर लेंगे

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वसंत जमशेदपुरी

28 June 2025

सार्थक सृजन

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रचनाकार परिचय

प्रतीक झा 'ओप्पी'

ईमेल : kvpprateekjha@gmail.com

निवास : प्रयागराज (उत्तरप्रदेश)

जन्मस्थान- चन्दौली (उत्तरप्रदेश)
संप्रति- शोध-छात्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज (उत्तरप्रदेश)