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नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

लिली मित्रा की कविताएँ

लिली मित्रा की कविताएँ

काला मुँह लिए झूठ झेल रहा है अवसाद
कर लेगा आत्महत्या
बिना कोई सुसाइड नोट लिखे

बदलते दृष्टिकोण

चलते हैं सड़क पर
दो पैर, दो आँखें, एक मस्तिष्क
और 'अनेक दृष्टिकोण'
एक ही व्यक्तित्व में
जो हर दिन
एक ही जगह को
नए रूप में देखते हैं

जिस दिन चलो
उलझनों के साथ
उस दिन
धंसी सड़कें जूझती दिखती हैं
उन पर फेंके गये मलबे को पाटने में,
हरे पेड़ से भी दिखता है
झाँकता कोई सूखा दरख़्त,
बिजली के तार लगते हैं
आसमान पर बिखरा जंजाल
यहाँ तक की
ठीक से काम कर रही
लाल-बत्तियों के बावजूद भी
ट्रैफ़िक लगता है
तितर-बितर

कभी चले जो
निर्विकार भाव संग
तो दिखता है
उसी पथ पर कितना कुछ
एक साथ चलता हुआ
और सब कुछ
अपनी अलमस्ताई धुन में
बिना किसी अवरोध के
बेरोक-टोक
गुज़रता हुआ
हर उबड़-खाबड़ को
चुनौती मान
टाप कर आगे बढ़ता हुआ
चीखते बिलावजह हाॅर्न
अनसुना करता
बस चलता हुआ
बढ़ता हुआ
टापता हुआ, सम्भलता हुआ
बिना झुंझलाए
बिना खिसियाए

दो आँखें बनाती चलती हैं
एक ही बिन्दु पर
दृष्टि के नए कोण

*********


खंडहर

बहुत मुश्किल होता है
तबाही के बाद फिर से बसना
बहुत कुछ बिखरा होता है आसपास
अतीत के अवशेषों के साथ
कुछ अनमना-सा, अचकचाया-सा
अंगड़ाई लेता, बहुत नाज़ुक
बहुत कच्चा, डरा हुआ

ज़रा-सी आवाज़ से चटख जाता है,
छुप जाता है,
भूल जाता है आरम्भ का 'अ'
और अंत का 'त'

घुमड़ती रहती है तो बस बीच की बेचैनी
वॉन गॉग की पेंटिंग के गहरे नीले सलेटी
घुमावदार बादलों की तरह
जो न बरस पाती है, न गरज पाती है

अपने ही भीतर चलने लगती है
बखिया की तरह
सी देती है अभिव्यक्ति का मुख
कस देती है उंगलियों को

आदमी के भीतर बस जाता है
एक अभिशप्त 'कुलधारा'
अपने इतिहास को
प्रेतात्माओं के रुदन से बयान करता।

*********


सच का बाज़ार

दुनिया में कितने सच हैं
जितने आदमी, उतने सच

सच अब
अभेद्य दीवारों के पीछे छिपकर नहीं रहता
सबके पास अपने-अपने कैमरे हैं
अपने-अपने माइक
हर कोई दिखा रहा है अपना सच
चीख-चीख कर बताया जा रहा है सच
कुरेद-कुरेद कर खोदा जा रहा है सच
क्यों इतना ज़रूरी हो गया है बोलना सच?
क्या झूठ के आततायी साम्राज्य से
तंग आ गई है कलयुगी सभ्यता?
जो किसी मछली बाज़ार की तरह
किचपिचाता, ख़ुद की बोली लगाता
बेचा जा रहा है सच

मेरा सच ज़्यादा चुभता है
मेरा सच ज़्यादा खुरदरा है
मेरा सच ज़्यादा दर्दीला है
हर कोई उघाड़ देने पर आमादा है
तर्क के फ़ार्सेव से पतली से पतली
मर्यादा की झीनी परत को
कर देना चाहता है नंगा सच को

नग्न सच का भदेसपन
लौटा पाता होगा
मूल्यों और नैतिकता की लूटी हुई अस्मत?
मिलता होगा क्या सुकून?
महसूस होता होगा फ़ख्र-
'जो भी कहूँगा सच कहूँगा, सच के सिवा कुछ नही कहूँगा...' कहते हुए?

चरितार्थ हो रही है कहावत पूरी तरह-
'सच का बोलबाला, झूठे का मुँह काला'
काला मुँह लिए झूठ झेल रहा है अवसाद
कर लेगा आत्महत्या
बिना कोई सुसाइड नोट लिखे
और सच की किलबिलाती भीड़ में
आदमी अस्त-व्यस्त-सा
हैरान, परेशान-सा
छाँटता दिखेगा
सबसे सच्चा सच।

*********

शब्दों के चित्र

काँच की ख़ाली बोतल में

पहले भरे अलग-अलग
आकार-प्रकार के चिकने
रंगीन पत्थर

घुमा-फिरा कर देखा
बोतल को
मन मुस्कुराया और
आँखों ने खोज ली
कुछ बची-खुची रिक्तता

भर दी रेत हौले-हौले
बोतल को थपकाते हुए
फिर मन मुस्कुराया
आँखें भी मुस्कुराईं
कौशल पर इतरा रही थीं
वाह! सब भर दिया
अब बाकी था
बोतल का मुँह
ढक्कन से ऐंठ देना
और सजा देना 'किसी शेल्फ़' पर
जहाँ पड़ती रहे नज़र
आँखें मुस्कुराती रहें अपने कलात्मक कौशल पर
सब भर दिया
रिक्तता छोड़ी नहीं
लेश मात्र भी
हवा की भी गुंजाइश नहीं

पर क्या
काँच की ख़ाली बोतल होता है
इंसान!
कलात्मक कौशल के नाम पर
भरा जा सकता है क्या उसे
पत्थरों के टुकड़ों से!
क्या भरा जा सकता है
हृदय गुहा का रीतापन रेत से!
क्या इंसान किसी के सुख के लिए
सजावट का सामान बनाया जा सकता है!

सोचने पर लगता है
कि वो सब कुछ चाहता है
बिखरना भी,
भरना भी,
सजना भी,
रीत जाना भी

नही चाहता तो बस
मुहाने को ढक्कन से ऐंठ दिया जाना

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वसंत जमशेदपुरी

30 June 2025

भावप्रधान सृजन

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रचनाकार परिचय

लिली मित्रा

ईमेल : lil2503@gmail.com

निवास : फ़रीदाबाद (हरियाणा)

शिक्षा- स्नातकोत्तर (राजनीति शास्त्र एवं हिंदी)
प्रकाशन- ‘अतृप्ता’ (काव्य संग्रह), ‘गपाष्टक- लिली के लिलीयापे’ (ललित साहित्य) पुस्तकें प्रकाशित
निवासी- फ़रीदाबाद (हरियाणा)