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ललन चतुर्वेदी की कविताएँ

ललन चतुर्वेदी की कविताएँ

दुःख कुआँ है
माँ कहती थी बड़ी विलक्षण बात-
एक कुएँ से भर जाते हैं सात कुएँ
सात कुएँ भर नहीं सकते एक कुआँ


आत्म विज्ञापन

इतनी बड़ी है दुनिया
कितने लोगों को बतलाओगे कि तुम कवि हो
और लिख रहे हो इस समय बेहतरीन कविताएँ
जबकि यह समय बहुत अलग नहीं है पिछले समय से

कितने लोगों को बतलाओगे कि तुम एक उम्दा कलाकार हो
और कर लेते हो ज़बरदस्त अभिनय
यह जानते हुए भी कि मंच पर पहले ही से क़ाबिज हैं पहुँचे हुए कलाकार
और देखते-देखते दुनिया तब्दील हो गई है दर्शकों में

किसके-किसके पकड़ोगे पाँव रात-बिरात
कि मुझे भी ज़रूरत है रोशनी की और दम घुट रहा है इस अँधेरे में
जिसे तुम समझते हो मसीहा
वह तो ख़ुद बैठा है अँधेरे में प्रकाश का भरम फैलाए
कभी-कभी जुगनुओं की तरह भभक उठता है
और तुम्हें ग़लतफ़हमी होने लगती है कि धरती पर चाँद का बच्चा उतर गया है

तुम सचमुच यदि शब्दों पर यक़ीन करते हो तो
अपनी फ़जीहत कराने पर क्यों आमादा हो
मत खोलो अपनी पोटली चौराहे पर
मत फाँको धूल सड़कों की
मत चिपको शहर की हर दीवार पर विज्ञापन की तरह

एक दिन हवाएँ तुम्हारी ख़ुशबू बिखेर देंगी दसों दिशाओं में
तुम्हें यह बतलाने की कत‌ई ज़रूरत नहीं कि तुम एक उम्दा कवि या कलाकार हो
कवि हो तो मत दो अपना इश्तेहार
सुख-संतोष से जीना या मरना है तो-
मान लो कि तुम पल दो पल के हो
मत सोचो कि तुम प्रति पल के हो।

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इत्यादि

आख़िर मैं किस काम का था
कि एक बार मेरा नाम आ जाता उनकी ज़बान पर
कि कहीं उनके चर्चित मज़मून में मैं भी दर्ज हो जाता एक बार
कि कभी मुझे भी मिलता उनका नेह-निमंत्रण

फ़र्क मुझमें और उनमें इतना ही था कि मैं उन्हें पहचानता था अपरिचय की दीवार से
कितना मुश्किल था यह दीवार फलांगना
ग़ज़ब यह कि दूर रहने के बावजूद वे वाकिफ़ थे मेरी नस-नस से

मेरी आँखें थक गयी थीं उन्हें देखते-देखते
और कान पक गये थे उन्हें सुनते-सुनते
वह लाखों लोगों का अभिवादन स्वीकार कर सकते थे मात्र पाँच अंगुलियों से
और लोग नहीं समझ पाते थे कि वे स्वागत स्वीकार कर रहे थे या दे रहे थे शुभ-विदा

मैं हरगिज दुःखी नहीं हुआ कि
वे मुझे व्यक्तिगत रूप से कभी पहचान नहीं पाए
मैंने हर बार अपनी बेशुमार ख़ुशियों का इज़हार इसलिए किया
कि उनके सारगर्भित वक्तव्य में
मैं भी शामिल था इत्यादि के रूप में।

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दुःख

(एक)

जैसे पिता छिपाए रखते हैं आँसू
माँ छिपाए रखती है भूख
लड़के छिपा लेते हैं मास्टर के सामने तंबाकू
जैसे जवान लड़कियाँ बार-बार ओढ़नी से छिपाती रहती हैं उन्नत होते वक्ष
जैसे बदली या निलंबित होने वाले कर्मचारी के समक्ष
क्लर्क छिपाए रखता है गोपनीय काग़ज़ात
कुछ वैसे ही छिपाकर रखना चाहता हूँ अपने दुःख
जब कभी आएँगे उजले दिन
खोलूँगा अपने दुःख की पोटली
शायद सुख की सोहबत में दुःख चमक उठे सोने की तरह।


(दो)

मालूम नहीं क्या कर रहा हूँ
तुम्हें धोखे में डाल रहा हूँ या स्वयं को दे रहा हूँ धोखा
कबीर साहब! अपने को ठगते हुए उपज रहीं हैं दुःख की फ़सलें
काई की तरह चित्त पर जमती जा रही है पीर
रातभर जागता हूँ, रोता रहा हूँ
दिनभर हँसता हूँ
पर्दा गिराने का आदेश कब दोगे सूत्रधार?


(तीन)

दुःख कुआँ है
माँ कहती थी बड़ी विलक्षण बात-
एक कुएँ से भर जाते हैं सात कुएँ
सात कुएँ भर नहीं सकते एक कुआँ
भले ही ग्रीष्म में जल हो जाए कम
प्रायः सूखता नहीं कुआँ
रात भर कुएँ की कोख से रिसता रहता है जल
सुबह जमा हो जाता है दो बाल्टी पानी
सौ सुख मिलकर नहीं भर सकते दुःख का एक घाव
कहाँ छूटता है दाग़, छूट भी जाए यदि घाव!


(चार)

दुःखों की एक लम्बी श्रृंखला है
एक दुख का आवेग ही कुछ कम कर सकता है दूसरे दुःख को
कभी-कभी तो भादों की झमाझम बारिश की तरह बरसते हैं दुःख
हवा बन जाती है आँधी
सुख की छतरी हो जाती है तार-तार
मैं हवा में उड़ती हुई छतरी को देखता हूँ।


(पाँच)

मैंने दुःख के नाम मेंहदी रचायी है
भरा है सिन्दूर उसी के नाम
जैसे-जैसे रात गहराती है
मेरा पति जवान होता जाता है
मैं बहुत आदर करती हूँ अपने पति का
कभी जिह्वा पर नहीं लाती उसका नाम

सुबह जब चारों तरफ फैलने लगता है उजाला
मैं बहुत डर जाती हूँ
मैं चाहती हूँ इस रात की कोई सुबह नहीं हो
यह पसरी रहे मेरे स्याह बालों की तरह
मुझे भय लगता है किसी भी रोशनी से

रातों-रात हो ग‌ए हैं मेरे केश श्वेत
दुनिया को पसंद नहीं है सफेद बाल
मैं मरना चाहती हूँ अहिवात
सहेलियों! मुझे चिता पर डालने के पहले
कर देना सोलहों श्रृंगार।

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स्त्री का बटुआ

साड़ी में जेब की जगह नहीं है
और कुछ तो रखना है दिनभर की ख़ातिर
करनी है धानरोपनी या ढोना है दिनभर ईंट
तैयार करना है लगातार बालू-सीमेंट से गाड़ा फटाफट
इसलिए लटका लेती है कमर में बटुआ

कभी आँचल से पोंछकर टपकता हुआ पसीना
धो लेती है हाथ और चुटकी भर खैनी करती है होंठों के हवाले
इसी से अर्जित करती है ऊर्जा
मिटाती है क्षण भर के लिए थकान

शाम में मुंशी की दी दैनिक मज़दूरी
वह भी मर्दों की तुलना में कुछ कम
खोंस लेती है ब्लाउज में
उसी को बना लेती है बटुआ कि कहीं खो न जाए दिनभर की गाढ़ी कमाई
मुंशी की नज़र मज़दूरी के नोटों को गिनने पर नहीं
ब्लाउज के खुले हुए बटन से बनी फाँक पर है

स्त्री तेज़ क़दमों से जा रही है बाज़ार
वहाँ करेगी सौदा-सुलफ़
कल फिर से लौटना है उसी काम पर
होना है कमर कसकर तैयार
सामना करना है कड़कती धूप से, मुंशी और ठेकेदार की टेढ़ी नज़र से

उसके पास है चुप्पी का एकमात्र हथियार
रोती है अकेले में बार-बार
मौन होकर कोसती है अपने भाग
बग़ल में सोया बचवा कहीं न जाए जाग
और जाग भी गया तो क्या
पीठ पर बाँध लेगी और चल देगी लड़ने जीवन का युद्ध
वह रोज़ शाम में लौटती है मुस्कुराते हुए विजयी भाव से

कम हो गया है उसके जीवन में एक दिन का दुःख
उसने जीत ली है एक दिन की भूख
सुबह उसके लिए बेसब्र प्रतीक्षा है और ढलती शाम रौनक

ठेकेदार और मुंशी रोज़ हो जाते हैं पराजित
नोट गिनते हुए बेशर्म
देखना नहीं छोड़ते उसके ब्लाउज का खुला हुआ पहला बटन
पर स्त्री कभी नज़र उठाकर ऊपर नहीं देखती
चलते-चलते थूक देती है खैनी की पीक- पिच्च-पिच्च।

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स्त्री का दु:ख

एक स्त्री जब अपना दुःख कहती है
तब वह हज़ार स्त्रियों का दुःख कहती है

आश्चर्य है, उसका भारी से भारी दु:ख तुम्हें ग़ैरमामूली लगता है
फोन रखने के बाद तुम मुस्कराने लगते हो उसके दुःख पर
उसके दुःख को मसाला बनाकर परोसते हो संगी-साथियों के समक्ष
अकेले में भी रस लेते हो, लगाते हो उन्मुक्त ठहाके
उसी दुःख को तुम साझा करते हो किसी ग़ैर स्त्री से
वह स्त्री कुपित हो जाती है तुमसे और उस स्त्री से
वह भी लगाती है उसी पर तरह-तरह के लांछन

स्त्री का दुःख आज भी महज मसाला है
जिसके बिना कोई किचन अधूरा है
स्त्री का दु:ख स्वाद है

स्त्री जब चुप रहे तब दुःख है
जब बोले तो महादु:ख है
स्त्री कुछ भी माँगे तो कलह है
जब  लीक से हटकर चले तो बदचलन है

सारे लफंगे उससे केवल संत होने की अपेक्षा करते हैं
जो सुबह-शाम बाँसुरी की तरह बजती रहे
सुबह-शाम उनके लिए सजती रहे
और देती रहे पूजनोपरांत सुस्वादु प्रसाद
झेलती रहे तमाम कुंठाएँ, अवसाद
इतने पर भी कैसी है पावन उसकी आकांक्षा
वह सिर्फ इतना ही चाहती है कि उसे मिले थोड़ा-सा प्यार
इससे वंचित अभिव्यक्त हो जाता है उसका दुःख
और इसी अपराध में वह घोषित कर दी जाती है कुलटा
जबकि वह किसी और से नहीं, अपने पति का प्यार चाहती है
और इसी के लिए वट-वृक्ष में धागा बाँधती है
तमाम देवी-देवताओं से मन्नत माँगती है।

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होने और न होने के बीच

होनी चाहिए थी सावन में बारिश
पड़ना चाहिए था माघ में पाला
क‌ई बरसों से जेठ में कहाँ उठी लू?

छ: ऋतुओं से धनी इस देश में
सारे मौसम नाराज़ से चल रहे हैं
या नहीं पहुँच रहे हैं सही समय पर
जैसे विलंब से चलती  है ट्रेन
जैसे भूख के मिट जाने पर मिलती है रसोई
जैसे आँखों के पथरा जाने पर लौटता है परदेसी

यह सारा जीवन होने और न होने के बीच है
जो वांछित है वह बदलता जा रहा है अवांछित में
घर-परिवार की बातें दोयम दर्जे की हो गई हैं
इन दिनों लोग मुझसे अधिक मेरे शहर के मौसम का मिज़ाज पूछते हैं

मैंने कई बार ख़ुद से और ज्ञानियों से भी पूछा है
कि लोगों के मन का मौसम अचानक क्यों बदल गया है?

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सही-ग़लत

एक दिन
बुरे लोग बदल दिए जाएँगे अच्छे लोगों में
उन्हें पूजने के लिए उमड़ पड़ेगा लोगों का हुजूम

एक दिन
अच्छे लोग घोषित कर दिए जाएँगे खलनायक
चौराहे पर दी जाएगी उन्हें भद्दी-भद्दी गाली
अगर कब्रों में वे सड़-गल ग‌ये होंगे
तो उनके पुतले को दी जाएगी फांसी

एक दिन
सही और ग़लत में फ़र्क मिट जाएगा।

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विचारणीय

पानी की अधिक चर्चा होती है रेगिस्तानों में
नैतिकता का बार-बार ज़िक्र होता है बयानों में
सद्गुणों का बहुत उल्लेख मिलता है धर्म-ग्रन्थों में

अपने समय को परिभाषित करते हुए
आपको बहुत दुःखी नहीं होना चाहिए
क्या सुर्खियों में रहने वाले शब्द
समाज की स्वस्थता के सूचकांक होते हैं?

1 Total Review

वसंत जमशेदपुरी

26 September 2025

यथार्थ के ठोस धरातल पर उकेरी गई कविताएँ

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रचनाकार परिचय

ललन चतुर्वेदी

ईमेल : lalancsb@gmail.com

निवास : रांची (झारखण्ड)

मूल नाम- ललन कुमार चौबे
जन्मतिथि- 10 मई, 1966
जन्मस्थान- बैजलपुर, मुज़फ्फ़रपुर (बिहार)
शिक्षा- एम०ए० (हिन्दी), बी० एड, नेट जेआरएफ
प्रकाशन- 'प्रश्नकाल का दौर', 'बुद्धिजीवी और गधे' (व्यंग्य संग्रह), 'ईश्वर की डायरी', 'यह देवताओं का सोने का समय है' एवं 'आवाज़ घर' (कविता संग्रह) प्रकाशित। साहित्य की स्तरीय पत्रिकाओं तथा प्रतिष्ठित वेब पोर्टलों पर कविताएँ एवं व्यंग्य प्रकाशित।
संपर्क- 202, असीमलता अपार्टमेंट, मानसरोवर एन्क्लेव, हटिया, रांची (झारखण्ड)- 834003
मोबाइल- 9431582801