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पवन कुमार मारूत की कविताएँ

पवन कुमार मारूत की कविताएँ

पुनर्बलन
एक ऐसा साधन है
जो उत्साह उत्पन्न कर देता है काम करने का
बाल-फूलों ने तिल झड़ाये दिनभर
लालच में खिचड़ी के

आदमी आदमी कब रहा है

मर क्यों नहीं जाती?
मेरे प्राण क्यों खाती?
तुम्हारे बराबर के सारे दरख़्त उखड़ गये,
तुम अभी और कितने दुख दोगी?
सुनकर सन्न रह गई बुढ़िया,
मन ही मन कलपती,
जैसे सिंह के जबड़े में फँसा देखकर अपने बच्चे को,
तड़पती है लाचार हरिणी।
मरना स्वयं के वश की बात तो नहीं!

कैसी बिडम्बना है,
वह सारा जीवन,
वे सारे सपने,
वे सारी विभिषिकाएँ जो जलाती थी दिन-रात,
वे दिन,
जब भूखा रहना पड़ता था कई दिन- कई रैन,
'दोपहर के भोजन' की सिद्धेश्वरी के समान।
जीवन के सब सुखों को त्यागकर,
जीवन खपा दिया जिसकी सेवा में,
जिसकी उन्नति में,
जिसको हर जलजले से बचाया,
जैसे कंगारू माँ बचाती है अपने लाल को।

दिन-रात काम किया लाडले को छाती से चिपकाकर,
बाप की कमी नहीं खलने दी,
जो स्वर्ग सिधार गये थे
बच्चे के बचपन में।
माँ-बाप दोनों का फ़र्ज निभाया,
जिसने बचाया ढाल बनकर उम्रभर।
आज वही माँ,
बीमार असहाय-सी पड़ी खटोले पर।
कहा कलेजे के उस टुकड़े ने,
तू मर क्यों नहीं जाती?
तू मेरे प्राण क्यों खाती?

*********


बेबस हूँ, मजबूर भी

तिल झड़ा रहे थे देवी वाले खेत में
दो नन्हें बालक फूल-से
डाली-सी उनकी माँ

माता बोली-
शाम तक तिल झड़ाओगे तो
आज ब्यालू में खिचड़ी मिलेगी
दूध व गुड़ भी होगा उसमें
जैसे किसी भूखे को रोटी मिल जाए
और वह भी चिकनी-चुपड़ी

पुनर्बलन
एक ऐसा साधन है
जो उत्साह उत्पन्न कर देता है काम करने का
बाल-फूलों ने तिल झड़ाये दिनभर
लालच में खिचड़ी के

आखिर साँझ-सुन्दरी उतरी धरनी पर
साये हुए लम्बे
फूल लौटे घर दौड़े-दौड़े

बनी थी बाजरे की खिचड़ी
और दूध भी था
मगर था गुड़ गायब थाली में
बालक मचल गया गुड़ के लिए

माँ!
रुपये दे दो, गुड़ लाऊँगा
भीतर गई घर में और पेई में ढूँढने लगी कुछ रुपये माँ
जैसे ढूँढता है बैचेन व्यक्ति शांति इस जहान में
बेबस, मायूस, मुरझाई हुई विधवा माँ
बैठ गई घर के कोने में
रोती थी अपनी किस्मत पर
ज्यों रोई थी अपने पति की मृत्यु पर सुबक-सुबक कर
बालक अंदर आया अधीर होकर
देखा माँ को
और देखा माँ के आँसूओं को
माँ मरती मछली की तरह तड़पकर बोली
'एक रूपया भी नहीं है घर में'
माँ रोती बच्चे को मचलता देखकर
बच्चा रोया माँ को रोता देखकर
दोनों गले से लिपटकर
रोये काफी देर तक
'माँ, मत रोओ
मुझे नहीं चाहिए गुड़'
सिसकते-सिसकते बोला फूल
ऐसी बेबसी, लाचारी में
न जाने रोते कितने डाली-फूल!

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रचनाकार परिचय

पवन कुमार 'मारुत'

ईमेल : pavanjrd@gmail.com

निवास : नादौती (करौली)

जन्मतिथि- 17 जुलाई, 1991
सम्प्रति- राजकीय महाविद्यालय, कनवास (कोटा) में सहायक आचार्य (हिन्दी) के पद पर कार्यरत
लेखन विधाएँ- हिन्दी भाषा में छन्दयुक्त एवं छन्दमुक्त कविता लेखन।
प्रकाशन- विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं हिन्दी वेबसाइटों जैसे- साहित्य कुंज, संगम सवेरा, साहित्य रचना, साहित्य रत्न, नई गूँज, दि ग्राम टुडे, हिन्दी
कुंज, अमर उजाला डॉट कॉम, साहित्य मंजरी डॉट कॉम आदि में कविताएँ प्रकाशित।
पता- ग्राम व पोस्ट- ढहरिया, तहसील- नादौती, ज़िला- करौली (राज.)- 322215
मोबाइल- 9461295261