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डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की पाँचवी कड़ी

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की पाँचवी कड़ी

बेकल-सा देव उठकर बाहर चला आया। उसका मन बस आह्वान पर अटका था। योग की कौनसी सीढ़ी है, जिसे साध वो देवयानी को पा लेगा। इंसान भी कितना अजीब होता है, हमेशा अप्राप्य के पीछे भागता है। जब देवयानी उसके पास थी, न जाने कौनसी भावना के तहत शर्मिष्ठा के पास चला गया। और जब देवयानी उससे दूर हुई तो दिल सिर्फ देवयानी को याद करता है तो क्या उसने देवयानी को धोखा दिया?

"मुझे वो हर पल अपने आसपास क्यों लगती है? उसकी आवाज़ कानों में क्यों गूँजती रहती है?" देव की सोच की श्रृंखला उस आवाज़ से टूट गई।
"नाद क्या है? कोई भी मधुर, कर्णप्रिय आवाज़ नाद ही तो होती है। कोई भी मेलोडियस साउंड! सुनने में अच्छी लगती कोई भी आवाज़। नाद को भी दो हिस्सों में बाँटा गया है- आहद और अनहद। यह आहद शब्द आहत से आया है, आहत यानी चोट। अर्थात 'आहदनाद' वो नाद है, जिसे हम कान से सुन सकते हैं और अनहद का मतलब है, जो महसूस किया जाता है। 'अनहदनाद' दिल के अंदर का नाद है। यह कब सुनाई देता है? यह तब सुनाई देता है, जब बाहर की दुनिया का शोर पूरी तरह बंद हो जाता है। तब अंदर का ये अनहदनाद सुनाई देता है। हाँ! एक बात समझनी है। यह नाद कोई सुनाई पड़ता हुआ नाद नहीं है। लेकिन यह सुनाई देने वाले नाद की पहली स्थिति है। यह स्थिति है उस नाद के संगीत बनने से पहले की परिस्थिति। इसके बाद फिर आते हैं श्रुति और स्वर। इन श्रुति और स्वर के बारे में कौन-कौन जानता है? हमें हर युग में ही यह संगीतकार बतलाते रहे हैं।"

गुरुजी बोल रहे थे। देव बैचेन हो रहा था। देवयानी की यादें टीस बनकर उभर रही थीं। देवयानी, उसका 'अनहदनाद'। उसे बाहर की दुनिया से कटने की ज़रूरत भी नहीं थी। देवयानी की धड़कनें, देवयानी के शब्द उसे अपने अंदर हर पल गूँजते मिलते। देवयानी ज़रूर देव विला में छूट गई थी, उसके वजूद का सबसे ज़रूरी हिस्सा, उसका दिल देव के साथ ही आ गया था। और देव की आत्मा देवयानी के पास रह गई। बेचैनी बढ़ने लगी। देवयानी, मेरे अनहदराग! हर पल ही मैं तुम्हें महसूस करता हूँ। संगीत और नाद की इस कक्षा से उसका जी उचटने लगा। गुरुजी की आवाज़ कानों में आ रही थी-
"कोई भी संगीतमय फिक़रा, जिसे संगीतकार अपने ज़ेह्न से सोचता है, वो अनहदनाद है। गाने से पहले वो उसे अपने मन में सुनता भी है और भोगता भी है। अनहदनाद आहदनाद कैसे बनता है? मैं तो यह कहूँगा कि सबकुछ शून्य से ही आता है। जब आप शून्य में डूबे होते हैं तो आपको आवाहन की इच्छा होती है। आप मन में एक धारणा अर्थात एक संकल्प करने लगते हैं। यही योग की पहली सीढ़ी है। और आवाहन का अर्थ है, किसी भी चीज़ की बहुत तीव्र इच्छा रखना।

"कैसे गुरुजी? किसी का आह्वान करने से क्या कोई आपके पास आ सकता है?"
मुस्कुरा दिए गुरुजी। देव की मनोस्थिति अच्छी तरह समझते थे। उसके लिए योग, संगीत, रियाज़, आवाज़ सब देवयानी है। "हाँ, किसी का आह्वान कर हम उसे परलौकिक रूप में पा सकते हैं। निर्वाण का यही तरीक़ा है देव!"
"कैसे गुरुजी?"
"मैं समझाता हूँ देव। आप एक स्पेसशिप का उदाहरण लीजिए। उसका कोई एक हिस्सा शून्य की ब्रह्मांड यात्रा में अलग हो जाता है और फिर दोबारा उस शिप के साथ एक हो जाने के लिए लौट आता है। आह्वान के वक़्त यही परिस्थिति होती है और इसे ही हम योग कहते हैं।"
"उसके वजूद का हिस्सा उसकी देवयानी भी तो उससे अलग हो गया है। तो क्या मेरी देवयानी भी मेरे साथ आ जाएगी। मैं उसे हर पल महसूस करता हूँ। मेरे रोम-रोम में बसी है वो। मैं देवयानी के बगैर नहीं रह सकता। कैसे रहूँ? उसने अपने बिना जीना ही कब सिखाया?"
"क्या बात देव? अभी ध्यान कहाँ है तुम्हारा?"
"कुछ नहीं गुरुजी! आज मन नहीं लग रहा बस।"
"तुम अभी कमरे में जाकर आराम करो। साँझ की बेला में मेरे पास आश्रम चले आना। मैं वहाँ तुम्हें फिर यह सब समझा दूँगा।"

बेकल-सा देव उठकर बाहर चला आया। उसका मन बस आह्वान पर अटका था। योग की कौनसी सीढ़ी है, जिसे साध वो देवयानी को पा लेगा। इंसान भी कितना अजीब होता है, हमेशा अप्राप्य के पीछे भागता है। जब देवयानी उसके पास थी, न जाने कौनसी भावना के तहत शर्मिष्ठा के पास चला गया। और जब देवयानी उससे दूर हुई तो दिल सिर्फ देवयानी को याद करता है तो क्या उसने देवयानी को धोखा दिया? नहीं-नहीं। सिर्फ परिस्थितियों ने उसे मजबूर कर दिया। उसने शर्मिष्ठा के बारे में देवयानी को सदैव सच बताया। फिर कहाँ, क्या ग़लत हुआ? देवयानी की यादें फिर अधीर करने लगीं। सामने आम के पेड़ पर कोयल कुहुक रही थी। आम्र बौर से लदे पेड़ झूम रहे थे। वो देवयानी की यादों में फिर खो गया।

"देव!"
"बोलो देवू!"
"तुमने कभी कोयल को बोलते सुना है?"
"रोज़ ही सुनता हूँ।"
"तुम्हें इस कंक्रीट में कोयल के बोल कहाँ सुनने को मिल जाते हैं देव?"
"अपने घर में।"
"अपने घर में। मुझे क्यों नहीं सुनाई देते? देव कहाँ आती है कोयल? कहाँ सुनते हो तुम?" देवयानी के चेहरे पर हैरत और ख़ुशी के मिले-जुले भाव उभर आये।
"हर जगह देवू।"
"मुझे तो कहीं नहीं सुनने को मिलते। मैं तुमसे यही कह रही थी। अपने बगीचे में एक आम का पेड़ भी लगवा लो। क्या पता कोयल आ जाए! पर तुम तो रोज़ सुनते हो। बताओ ना देव कहाँ आती है? मैं भी उसे सुना करूँगी।"
"देवू! बताया तो हर जगह।"
"मुझे क्यों नहीं सुनाई दी आज तक, न दिखी। कब आती है? मैं सो रही होती हूँ क्या?"
"हर समय होती है देवू! तुम्हें क्यों नहीं दिखती ये मैं क्या जानूँ?"
देवयानी बहुत उदास हो गई।
"अरे तुम तो उदास हो गईं। रुको मैं सुनाता हूँ तुम्हें पर पहले तुम्हें मुस्कुराना होगा। चलो अच्छी-सी स्माइल दो।"
देवयानी अभी भी इस सदमे में थी कि कोयल की आवाज़ रोज़ देव को सुनाई देती है, उसे नहीं। वो ज़बरदस्ती की मुस्कुराहट होठों पर ले आई।
"ऐसे नहीं, अच्छी तरह मुस्कुराओ। मैं क्या तुम्हारी गर्दन पर चाकू रखकर मुस्कुराने को कह रहा हूँ।"
देवयानी फिर मुस्कुराई।
"देवू! रहने दो। तुम सुनना ही नहीं चाहती।सही से स्माइल दो नहीं मैं चला ऑफिस। देर हो रही है मुझे।"
"अच्छा देखो। मुस्कुरा रही हूँ मैं। अब बताओ।"
देव ने उसकी आवाज़ की रिकॉर्डिंग ऑन करके सामने रख दी। और शरारत से मुस्कुराने लगा।
"तुम भी न देव! जाओ मैं तुमसे बात ही नहीं करती।"
सुनो तो देवयानी! मेरी बात तो सुनो! कहाँ भागती जा रही हो!
घना जंगल है आगे। लौट आओ। रास्ता भटक जाओगी।
वो देवयानी के पीछे-पीछे भागने लगा।

"देव! ठहरो।"
"देव। कहाँ भागे जा रहे हो? नीचे देखो।" गुरुजी ने देव को पकड़ झिंझोड़ दिया।
"गुरुजी वो देवयानी……।"
"मैं न होता तो अभी गिर जाते।"
"अच्छा होता न गुरुजी! छूट जाता इस जीवन से।" सिसक उठा देव।
"तुम छूट जाते और देवयानी! वाह! वो तुम्हारी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए रहे। ऐसे कायर कैसे हो सकते हो देव! और यह तुमने ही चुना है। देवयानी के ज़िम्मेदारी निभाने तक तुम्हें अपनी यह सज़ा भुगतनी है देव।"
"क्षमाप्रार्थी हूँ गुरुजी! मैं भटक गया था।"
"जाओ आराम करो। कल बात करेंगे। आया तो था कि तुम्हारी आज की कक्षा छूट गई, उस पर बात करने पर तुम्हारा यह विचलन!!" अपनी बात अधूरी रख गुरुजी चल दिए।
"गुरुजी! क्षमाप्रार्थी हूँ। मैं भटक गया था लेकिन अब पूरे मन से आपकी बात सुनूँगा। आप नाराज़ मत हो जाइए।"
"मैं नाराज़ नहीं देव। मैं भी थका हूँ। सुबह कुटिया की ओर चले आना। आज की कक्षा पर वहाँ बात करेंगे। अभी सब भूल, सो जाओ।"

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रचनाकार परिचय

उपमा शर्मा

ईमेल : dr.upma0509@gmail.com

निवास : दिल्ली

जन्मतिथि- 5 सितंबर, 1979
जन्मस्थान- रामपुर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- बी० डी० एस०
संप्रति- दंत चिकित्सक
प्रकाशन- लघुकथा संग्रह 'कैक्टस' (प्रभात प्रकाशन, 2023) एवं उपन्यास 'अनहद' (शुभदा प्रकाशन, 2023)
हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कथाक्रम, कथाबिम्ब, कथादेश, साहित्य अमृत, हरिगंधा, साक्षात्कार, पुरवाई, कथा समवेत, प्रेरणा अंशु, अविलोम, लोकमत, अमर उजाला, प्रभात ख़बर, हरीगंधा, साक्षात्कार जैसी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन
प्रसारण- आकाशवाणी दिल्ली से समय-समय पर कविताएँ प्रसारित
सम्मान- 'सत्य की मशाल' द्वारा 'साहित्य शिरोमणि सम्मान', प्रेरणा अंशु अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा लेखन सम्मान, हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच, गुरुग्राम लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा मणि सम्मान, कुसुमाकर दुबे लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, श्री कमलचंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल के दिल्ली अधिवेशन में 'लघुकथा श्री सम्मान' एवं प्रतिलिपि सम्मान, पुस्तक 'कैक्टस' को श्री पारस दासोत स्मृति सम्मान
निवास- बी- 1/248, यमुना विहार, दिल्ली- 110053
मोबाईल- 8826270597