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वासना से विवेक तक : सुनयना- डॉ० अरुण कुमार निषाद

वासना से विवेक तक : सुनयना- डॉ० अरुण कुमार निषाद

‘यादृश: कविस्तादृशी काव्यवन्धच्छाया’ विद्वत्सालभञ्जिका ग्रन्थ की यह सूक्ति डॉ० महेशचन्द्र शर्मा गौतम पर एकदम सभाष्य (सटीक) बैठती है। डॉ० महेशचन्द्र  शर्मा गौतम एक ऐसे उपन्यासकार हैं जो अपनी रचना का वर्ण्य विषय अपने आधुनिक समाज से लेते हैं।

‘यादृश: कविस्तादृशी काव्यवन्धच्छाया’ विद्वत्सालभञ्जिका ग्रन्थ की यह सूक्ति डॉ० महेशचन्द्र शर्मा गौतम पर एकदम सभाष्य (सटीक) बैठती है। डॉ० महेशचन्द्र  शर्मा गौतम एक ऐसे उपन्यासकार हैं जो अपनी रचना का वर्ण्य विषय अपने आधुनिक समाज से लेते हैं। संस्कृत की परम्परागत कथावस्तु से इतर कथावस्तु लेखन उनकी अपनी विशेषता है। उसमें वे किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं करते हैं।  उनके उपन्यास को पढ़ते हुए पाठक यह महसूस करता है कि –यह घटना तो हमने समाज में देखा है, सुना है, पढ़ा है। ऐसी घटना तो मेरे आसपास हुई है। रचना को पढने के लिए उसे दिमाग पर जोर देने की जरूरत नहीं पड़ती। हाँ लेकिन सोचने के लिए वह बाध्य हो जाता है उनकी रचना को पढ़कर यथा-क्या सुनयना का मनोहर के साथ सम्बन्ध बनाना उचित था? क्या अभिनव को प्रताड़ित करना उचित था? सुनयना द्वारा मुकदमा करना उचित था क्या? एक विवाहित स्त्री का अपने पति के रहते अपने प्रेमी की यादों में खोये रहना न्यायसंगत है? रमाकान्त और सुदर्शना के पुत्र (श्रीकान्त) और बहू (सुनीता) का झूठा दहेज प्रथा में फँसाना उचित है क्या?  सुनीता द्वारा शादी के बाद परपुरुष (अपने पूर्व प्रेमी) से मिलने जाना, शराब पीना उचित है क्या? सास श्वसुर ननदों से बदतमीजी से बात करना, उन पर झूठा मुक़दमा करना, जेल भेजवाना, रुपये लेकर समझौता करना ठीक है क्या?  लेखक पाठक के सामने ऐसे कई प्रश्न खड़ा कर देता है कि-पाठक रचना को पढने के बाद कई दिनों तक उससे निकल नहीं पाता है।   

 ‘सुनयना’ एक ऐसी कथा है जो आधुनिक समाज में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की जटिलताओं, प्रेम और वासना के बीच के अन्तर, दाम्पत्य जीवन की मर्यादा, बाल मनोविज्ञान(पृष्ठ 376-77) , पुलिस और वकील की वर्तमान कार्यशैली को दिखाती है (पृष्ठ 375 और 367)।  

सुनयना (उपन्यास का नाम और नायिका दोनों) एक ऐसी युवती की कथा है जो विवाह से पूर्व अपने प्रेमी (मनोहर) से सम्बन्ध बनाती है और शादी के बाद भी वह उसके मोह से बाहर नहीं निकल पाती है। अपने पति (अभिनव) को वह उपेक्षा व प्रताड़ना का शिकार बनाती है और न्यायालयी प्रक्रिया तक पहुँच जाती है। अपने पति पर नपुंसकता का आरोप भी वह लगाती है। पति से होने वाले बच्चे (माधव) में भी अपने प्रेमी की छवि देखती है।  परन्तु जब वर्षों बाद सुनयना का प्रेमी मनोहर अमेरिका से लौटता है, तब उसका स्वार्थपूर्ण चरित्र प्रकट होता है। उसकी अमर्यादित जीवनशैली और अवसरवादी प्रवृत्ति को जानकर सुनयना को आत्मबोध होता है। अन्तत: वह अपने अति माधव के पास लौटकर अपने अपराध की स्वीकृति देती हैं और कथा का अन्त पुनर्मिलन के साथ सुखद रूप में होता है।

लेखक की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रभावी है। संवादों में वास्तविकता की झलक है और घटनाओं का क्रम पाठक को अन्त तक बांधे रखता है। शैली सहज और वर्णनात्मक है, जो पात्रों के मनोभावों को प्रभावी ढंग से उजागर करती है। प्रतीकों और यथार्थ चित्रण प्रयोग उपन्यास को विशेष बनाता है।

‘सुनयना’ आज के समय की उस मानसिकता को उजागर करता है जहाँ सम्बन्धों में तात्कालिक लाभ, वासना और आत्मकेन्द्रितता का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। यह उपन्यास सिखाता है कि आत्म स्वीकृति, क्षमा और दाम्पत्य जीवन की मर्यादा ही स्थायी सुख का मार्ग है। यह आज के युवाओं के लिए एक सीख है कि सम्बन्धों में निष्ठा और आत्मचिन्तन आवश्यक है।

यह उपन्यास केवल एक स्त्री की व्यक्तिगत कथा नहीं है, बल्कि आधुनिक समाज में सम्बन्धों की बदलती प्रकृति, मानसिक उलझनों और आत्मबोध की आवश्यकता का सशक्त चित्रण है। ‘सुनयना’ आत्म स्वीकृति, पश्चाताप और मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना की कथा है। यह ऐसा दर्पण है जिसमें आज का समाज अपने चेहरे को देख सकता है। गुरुवर्य डॉ० गौतम जी को लेखनी इसी प्रकार चलती रहे और वे इसी प्रकार माँ भारती की सेवा करते रहें।        

पुस्तक-नीरजा (संस्कृत उपन्यास)
लेखक- डॉ.महेशचन्द्र शर्मा गौतम 
प्रकाशन–निर्मल पब्लिकेशन्स
मूल्य- 530/ रुपया
पृष्ठ संख्या- 465

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रचनाकार परिचय

डॉ० अरुण कुमार निषाद

ईमेल : arun.ugc@gmail.com

निवास : सुल्तानपुर (उत्तरप्रदेश)

नाम- डॉ० अरुण कुमार निषाद 
जन्मतिथि
- 25 जुलाई, 1984

शिक्षा- एम०ए० (संस्कृत साहित्य), नेट, पी०एचडी, डिप्लोमा पत्रकारिता एवं जनसंचार, संगीत प्रभाकर (गायन)
सम्प्रति- असिस्टेण्ट प्रोफेसर (संस्कृत विभाग) मदर टेरेसा महिला महाविद्यालय, कटकाखानपुर, द्वारिकागंज, सुल्तानपुर (उत्तरप्रदेश)
प्रकाशन- आधुनिक संस्कृत साहित्य की महिला रचनाधर्मिता, आधुनिक संस्कृत साहित्य : विविध आयाम, तस्वीर-ए-दिल (काव्य-संग्रह)
'गगनवर्णानां गूहगवेषा' (डॉ.हर्षदेव माधव की संस्कृत कविताओं का अवधी अनुवाद)
देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं यथा- कादम्बिनी, सरिता, जनकृति, सरहद, आरम्भ, सेतु (पिटर्सबर्ग अमेरिका), अम्स्टेलगंगा (नीदरलैंड), हस्ताक्षर, प्रणाम पर्यटन, साहित्य कुञ्ज (कनाडा), पहचान (आकलैण्ड), जय-विजय इत्यादि में शोधपत्र, कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी, आलेख आदि प्रकाशित।
अनेक राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोधपत्र वाचन तथा कार्यशालाओं में सहभागिता, संस्कृत मनीषियों का साक्षात्कार, संस्कृत/हिंदी पुस्तकों की समीक्षा, अनेक कवि सम्मेलनों में सहभागिता, सञ्चालन तथा अध्यक्षता, हिंदी तथा संस्कृत की स्वतन्त्र पत्रकारिता।
संपादन- कोरोना-विजय (काव्य संकलन)
उपसम्पादक-
हस्ताक्षर ई-मासिक पत्रिका (राजस्थान)
दस्तक दर्पण समाचार पत्रिका (गुजरात)
Knowledgeable Researchjournal (Peer-reviewed monthly journal)
सम्मान- लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा नाट्य निर्देशक सम्मान, लखनऊ पुस्तक मेले में कवि तथा भजन गायक सम्मान, रायल ह्यूमिनिटी एण्ड एजूकेशनल वेलफेयर सोसाइटी सुल्तानपुर द्वारा फखरुद्दीन अली अहमद अवार्ड, जिला सुरक्षा संगठन सुल्तांपुर द्वारा आदर्श शिक्षक अलंकरण सम्मान
निवास- ग्राम- अर्जुनपुर, पोस्ट- बेलहरी, जनपद- सुल्तानपुर (उत्तरप्रदेश)- 228133