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स्वतंत्रता की साँस और शिक्षा का प्रकाश- अलका मिश्रा

स्वतंत्रता की साँस और शिक्षा का प्रकाश- अलका मिश्रा

डॉ.राधाकृष्णन : “सच्चा शिक्षक वही है, जो अपने विद्यार्थियों को अपने मस्तिष्क से नहीं, बल्कि अपने हृदय से शिक्षित करता है।”

अगस्त और सितम्बर—ये दो महीने हमारे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक जीवन के दो ऐसे पर्व लेकर आते हैं, जो हमारे अस्तित्व और हमारी आत्मा की गहराइयों को छूते हैं। अगस्त हमें स्वतंत्रता की उस पहली भोर का स्मरण कराता है, जब लम्बे संघर्ष, असंख्य बलिदानों और असीम धैर्य के बाद भारत ने अपनी साँसों को पराधीनता की ज़ंजीरों से मुक्त पाया। वह क्षण केवल राजनीतिक आज़ादी का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, स्वाभिमान और मानव गरिमा की पुनः स्थापना का था। दूसरी ओर, सितम्बर हमें शिक्षक दिवस की स्मृति दिलाता है—एक ऐसा दिन, जो हमें यह चेताता है कि यदि स्वतंत्रता को स्थायी और सार्थक बनाना है, तो ज्ञान और शिक्षा की मशाल निरंतर प्रज्वलित रहनी चाहिए।

स्वतंत्रता और शिक्षा—ये दोनों किसी राष्ट्र की दो धुरी हैं। स्वतंत्रता हमें अपनी राह चुनने का अधिकार देती है, जबकि शिक्षा हमें विवेक प्रदान करती है कि उस राह पर चलना कैसे है। यदि स्वतंत्रता बिना शिक्षा के हो तो वह दिशाहीन हो जाती है, और यदि शिक्षा स्वतंत्रता के बिना हो, तो वह पिंजरे में बंद पक्षी के समान है—जो उड़ान का स्वप्न तो देखता है, पर उड़ नहीं सकता।

आज जब हम स्वतंत्रता की 78वीं वर्षगाँठ (2025 के संदर्भ में) मना रहे हैं, तो यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो उठता है—क्या हमने स्वतंत्रता का उपयोग केवल अधिकारों तक सीमित कर लिया है या उसे कर्तव्यों की ओर भी मोड़ा है? क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था केवल परीक्षा और अंक तक सीमित है, या वह जीवन के मूल्यों, सहिष्णुता और संवेदनशीलता का संस्कार भी कर रही है?

हमारा समाज इस समय अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। तकनीक ने हमें सुविधा तो दी है, पर मानवीय रिश्तों में दूरी भी बढ़ाई है। उपभोक्तावादी दृष्टिकोण ने हमें भौतिक रूप से सम्पन्न बनाया है, पर आत्मिक रूप से कहीं न कहीं रिक्त भी किया है। पर्यावरणीय संकट, बेरोज़गारी, असमानता और युवाओं में बढ़ती असंवेदनशीलता ऐसे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर केवल शिक्षा ही दे सकती है।

पर यह शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित न हो। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो विचारशीलता और करुणा का संगम हो; जो विज्ञान और मानवीय मूल्यों का संतुलन सिखाए; जो केवल पेशेवर न बने, बल्कि नागरिक भी बनाए। यहाँ शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। एक शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाता, वह जीवन को जीने का दृष्टिकोण भी देता है। वह अपने विद्यार्थियों के भीतर सोई हुई क्षमताओं को जगाकर उन्हें समाज का दीपक बना देता है।

स्वतंत्रता दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि हमारे बलिदानियों ने जिस आज़ादी का सपना देखा था, वह केवल तिरंगा फहराने भर से पूरा नहीं होता। उसे तब सार्थक माना जाएगा जब समाज का हर वर्ग समान अवसर पाए, जब हर नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हो, और जब स्वतंत्रता का उपयोग दूसरों के कल्याण में किया जाए।

वहीं शिक्षक दिवस हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र का भविष्य केवल नीतियों और योजनाओं में नहीं, बल्कि उस कक्षा-कक्ष में लिखा जा रहा है, जहाँ एक गुरु अपने शिष्य को केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि संस्कृति, सहिष्णुता और करुणा का पाठ पढ़ा रहा है।

आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि हम स्वतंत्रता की साँसों को शिक्षा के प्रकाश से जोड़ें। हमें यह समझना होगा कि स्वतंत्रता केवल बाहरी व्यवस्था से नहीं आती, बल्कि भीतर से भी अर्जित करनी पड़ती है। एक अंधकारमय मन, एक संकीर्ण सोच कभी भी स्वतंत्र नहीं हो सकती।

इसलिए हमें अपने बच्चों और युवाओं को ऐसी शिक्षा देनी होगी जो उन्हें न केवल सफल बनाए, बल्कि सजग और संवेदनशील भी बनाए। तभी हमारा देश न केवल स्वतंत्र रहेगा, बल्कि प्रबुद्ध और उदार भी बनेगा।

यह संयुक्तांक इन्हीं दोनों पर्वों को एक साथ समर्पित है—स्वतंत्रता की गूँज और शिक्षा की आभा। यह हमारे लिए आत्ममंथन का अवसर भी है कि हम आने वाली पीढ़ियों को कैसा भारत देना चाहते हैं। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि आने वाली पीढ़ियों को हम न केवल स्वतंत्र भारत दें, बल्कि ऐसा भारत दें जहाँ स्वतंत्रता विवेक से बँधी हो और शिक्षा संवेदनशीलता से सजी हो। तभी हम सच्चे अर्थों में स्वतंत्र और शिक्षित राष्ट्र कहलाएँगे। अपनी बात एक विचार के साथ समाप्त करती हूँ। 

डॉ.राधाकृष्णन : “सच्चा शिक्षक वही है, जो अपने विद्यार्थियों को अपने मस्तिष्क से नहीं, बल्कि अपने हृदय से शिक्षित करता है।”

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वसंत जमशेदपुरी

21 September 2025

स्वतंत्रता व शिक्षा दोनों महत्व समझाता आपका संपादकीय सर्वथा सराहनीय है, बधाई आपको

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रचनाकार परिचय

अलका मिश्रा

ईमेल : alkaarjit27@gmail.com

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि-27 जुलाई 1970 
जन्मस्थान-कानपुर (उ० प्र०)
शिक्षा- एम० ए०, एम० फिल० (मनोविज्ञान) तथा विशेष शिक्षा में डिप्लोमा।
सम्प्रति- प्रकाशक ( इरा पब्लिशर्स), काउंसलर एवं कंसलटेंट (संकल्प स्पेशल स्कूल), स्वतंत्र लेखन तथा समाज सेवा
विशेष- सचिव, ख़्वाहिश फ़ाउण्डेशन 
लेखन विधा- ग़ज़ल, नज़्म, गीत, दोहा, क्षणिका, आलेख 
प्रकाशन- बला है इश्क़ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित
101 महिला ग़ज़लकार, हाइकू व्योम (समवेत संकलन), 'बिन्दु में सिन्धु' (समवेत क्षणिका संकलन), आधुनिक दोहे, कानपुर के कवि (समवेत संकलन) के अलावा देश भर की विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं यथा- अभिनव प्रयास, अनन्तिम, गीत गुंजन, अर्बाबे कलाम, इमकान आदि में रचनाएँ प्रकाशित।
रेख़्ता, कविता कोष के अलावा अन्य कई प्रतिष्ठित वेब पत्रिकाओं हस्ताक्षर, पुरवाई, अनुभूति आदि में रचनाएँ प्रकाशित।
सम्पादन- हिज्र-ओ-विसाल (साझा शेरी मजमुआ), इरा मासिक वेब पत्रिका 
प्रसारण/काव्य-पाठ- डी डी उत्तर प्रदेश, के टी वी, न्यूज 18 आदि टी वी चैनलों पर काव्य-पाठ। रेखता सहित देश के प्रतिष्ठित काव्य मंचों पर काव्य-पाठ। 
सम्मान-
साहित्य संगम (साहित्यिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक) संस्था तिरोड़ी, बालाघाट मध्य प्रदेश द्वारा साहित्य शशि सम्मान, 2014 
विकासिका (साहित्यिक सामजिक एवं सांस्कृतिक) संस्था कानपुर द्वारा ग़ज़ल को सम्मान, 2014
संत रविदास सेवा समिति, अर्मापुर एस्टेट द्वारा संत रवि दास रत्न, 2015
अजय कपूर फैंस एसोसिएशन द्वारा कविवर सुमन दुबे 2015
काव्यायन साहित्यिक संस्था द्वारा सम्मानित, 2015
तेजस्विनी सम्मान, आगमन साहित्य संस्था, दिल्ली, 2015
अदब की महफ़िल द्वारा महिला दिवस पर सम्मानित, इंदौर, 2018, 2019 एवं 2020
उड़ान साहित्यिक संस्था द्वारा 2018, 2019, 2021 एवं 2023 में सम्मानित
संपर्क- एच-2/39, कृष्णापुरम
कानपुर-208007 (उत्तर प्रदेश) 
 
मोबाइल- 8574722458