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सन्दीप तोमर से शालिनी कपूर की बातचीत

सन्दीप तोमर से शालिनी कपूर की बातचीत

 लेखन और पठन का सफर कभी सरल नहीं होता- सन्दीप तोमर

एक आदर्श अध्यापक पिता और एक धर्म-परायण माता के पुत्र, पेशे से अध्यापक होने के साथ-साथ स्तरीय लेखक, समीक्षक, आलोचक श्री सन्दीप तोमर हिंदी साहित्य के वर्तमान समय में एक बेहद चर्चित नाम हैं। उनका जन्म 7 जून 1975 को उत्तर प्रदेश के जिला मुज़फ्फरनगर के गंगधाड़ी नामक गाँव में हुआ, चार भाई बहनों में सबसे छोटे सन्दीप तोमर हमारे समय के सर्वाधिक शिक्षित लेखक हैं। अपनी बेबाक व बेलाग बातों से अक्सर सुर्खियों में रहने वाले सन्दीप तोमर लघुकथा के विशेषज्ञ माने जाते हैं। थ्री गर्लफ्रेंडस उपन्यास से उन्होंने खूब सुर्खियाँ बटोरी। एस फॉर सिद्धि उनके चर्चित उपन्यासों में से एक है। अपनी हाजिरजवाबी और दोस्ताना मिजाज के लिए मशहूर सन्दीप तोमर साहित्य चर्चा में कभी वरिष्ठ-नवोदित का भेदभाव नहीं करते। 
आपने कविता, कहानी, लघुकथा, आलोचना, नज़्म, ग़ज़ल के साथ साथ उपन्यास विधा में लेखन कर्म किया है। सन्दीप तोमर का पहला कविता संग्रह 'सच के आस पास' 2003 में प्रकाशित हुआ। उसके बाद एक कहानी सँग्रह 'टुकड़ा टुकड़ा परछाई' 2005 में आया, 2017 में 'थ्री गर्ल्सफ्रेंड्स' उपन्यास प्रकाशित हुआ। 4 कविता संग्रह, 4 उपन्यास, 3 कहानी संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 आलेख संग्रह सहित आपकी आत्मकथा प्रकाशित हुई। 
आप पत्र-पत्रिकाओं में सतत लेखनकरते रहे हैं। आप प्रारंभ, मुक्ति, प्रिय मित्र, अनवरत अविराम इत्यादि साझा संकलनों में बतौर कवि सम्मलित हो चुके हैं। आपने हम सब साथ साथ मार्रून सहित सृजन व नई जंग, अभिनव इमरोज पत्रिकाओं में बतौर सह-सम्पादक या फिर अतिथि सम्पादक सहयोग किया है। फिलवक्त आपकी कई पुस्तकें प्रकाशन हेतु तैयार हैं। 
हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा निबन्ध व कविता लेखन के लिए, 'सच के आस पास' काव्य कृति के लिये 'तुलसी स्मृति सम्मान' काव्य लेखन के लिए 'युवा राष्ट्रीय प्रतिभा' सम्मान, साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी द्वारा 'साहित्य श्री' सम्मान, अजय प्रकाशन रामनगर वर्धा (महा.) द्वारा 'साहित्य सृजन' सम्मान, मानव मैत्री मंच द्वारा काव्य लेखन के लिए सम्मान सहित कई बड़ी संस्थाओं द्वारा समय- समय पर आपको सम्मानित किया गया है। आप 2011-12 में स्कूल स्तर पर तत्कालीन विधायक के हाथों बेस्ट टीचर अवार्ड तथा 2012 में प्राइवेट और सरकारी अध्यापक संघ के तत्वाधान में तत्कालीन संसदीय मन्त्री हरीश रावत के कर कमलों से दिल्ली के बेस्ट टीचर के रूप में भी सम्मानित हो चुके हैं। आपको 'औरत की आज़ादी: कितनी हुई पूरी, कितनी रही अधूरी?' विषय पर अगस्त 2016 में आयोजित परिचर्चा संगोष्ठी में विशेष रूप से सम्मानित किया गया। भारतीय समता समाज की ओर से आपको समता अवार्ड 2017 से सम्मानित किया गया। साहित्य-संस्कृति मंच अटेली, महेंद्र गढ़ (हरियाणा) द्वारा साहित्य-गौरव सम्मान (2018), छठवा सोशल मिडिया मैत्री सम्मलेन में नेपाल की भूमि पर वरिष्ठ प्रतिभा के अंतर्गत साहित्य के क्षेत्र में सतत व सराहनीय योगदान के लिए 'साहित्य सृजन' (2018), इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र एवम्‌ हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी द्वारा शिक्षक प्रकोष्ठ में सहभागिता प्रमाण पत्र दिया गया। पाथेय साहित्य कला अकादमी, जबलपुर/दिल्ली द्वारा सितम्बर 2018 में कथा गौरव सम्मान से नवाज़ा गया। साथ ही दिसंबर 2018 में ही नव सृजन साहित्य एवं संस्कृति न्यास, दिल्ली नामक संस्था द्वारा हिन्दी रत्न सम्मान दिया गया।सितम्बर 2019 में पत्रकार देवेन्द्र यादव मेमोरियल ट्रस्ट, दौसा एवम अभिनव सेवा संस्थान, दौसा द्वारा साहित्य में विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया। नवम्बर 2019 में अभिमंच द्वारा उपन्यास लेखन पर प्रेमचंद सम्मान-2019 से विभूषित किया गया है। मार्च 2025 में बीपीए फाउंडेशन और इंडिया नेटबुक्स, द्वारा साहित्य संवर्धन हेतु साहित्य भूषण सम्मान (रामेश्वर दयाल अवस्थी सम्मान) प्रदान किया गया।
आपने इस साक्षात्कार में बड़ी बेबाकी से ईमानदार जवाब दिए हैं। आपने अपने पूर्ववर्त्ती लेखको के साथ-साथ अपने समकालीन तथा कनिष्ठ लेखकों की अनेक मंचो पर खुलकर प्रशंसा की है, जो कि आपके विस्तृत अध्ययन का परिचायक है। आइए सन्दीप तोमर को जानने का प्रयास करते हैं इस साक्षात्कार के माध्यम से)
 
शालिनी कपूर: सन्दीप जी, सबसे पहले आपनी साहित्यिक यात्रा के ढाई दशक वर्ष पूरे होने की बधाइयाँ स्वीकार करें। आज पूरे पच्चीस साल इस साहित्यिक दुनिया में गुज़ारने के बाद कैसा महसूस हो रहा है? आप आज के दौर की एक बहुचर्चित लेखक हैं। जहाँ तक मुझे विदित है- आप विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं और आज एक विज्ञान शिक्षक भी हैं, गैर-साहित्यिक पृष्ठभूमि से होते हुए भी बहुत कम समय में साहित्य की दुनिया में अपनी एक खास पहचान बनाई है। आपसे पाठक जानना चाहेंगे कि जिस उम्र के लड़के अक्सर रोजगार की दुनिया में संघर्षरत रहते है, आप साहित्य की दुनिया में कैसे आ गए? और सिर्फ आये ही नहीं, सक्रिय होकर स्थापित कैसे हुए?
सन्दीप तोमर: इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं
                 उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उन का कोई पता नहीं
 
बशीर बद्र साहब के इस शेर से बात शुरू करते हुए पहले तो आपको ढाई दशकीय लेखन की बधाई हेतु हृदय से आभार और कृतज्ञता सम्प्रेषित करता हूँ। स्वाभाविक है, अच्छा लग रहा है। बिना कोई साहित्यिक गुरु या गॉडफ़ादर बनाये ये संभव हुआ, मेरी किसी भी उपलब्धि का श्रेय मेरे पाठकों को जाता है, साथ ही मैं इसका श्रेय अपने समय के लेखकों खासकर उन वरिष्ठ लेखको को देना चाहता हूँ, जिन्होंने लगातार मेरा हौसला बनाये रखा। मुझे कहने में कोई गुरेज नहीं है कि ममता कालिया, धीरेन्द्र अस्थाना और तेजेंद्र शर्मा को इसका सबसे अधिक श्रेय जाता है, मेरे लेखन की ख़ुशी मुझसे ज़्यादा उन्हें होती है। जब कोई साहित्य का मर्मज्ञ आपके लेखन की तारीफ़ कर दे तो आपकी ज़िम्मेदारी अधिक बढ़ जाती है, और मुझे इस महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी का भी अहसास है।
दूसरी बात- चर्चित होने की, तो चर्चित कैसे और किस मायने में हुआ ये मेरी भी समझ से बाहर है, अभी एक कार्यक्रम में ममता जी से मुलाकात हुई, उन्होंने कहा- सन्दीप! तुमने अपनी जगह साहित्य में बड़े अच्छे से बना ली, अगर ये बात ममता जी कह रही हैं, तो मुझे इसे सहर्ष स्वीकार करना होगा।
मेरे शोध-निदेशक कहा करते थे- विज्ञान हमें अधिक तार्किक बनाता है, लेकिन विज्ञान भाषिक रूप से मितव्ययी भी बनाता है, विज्ञान का स्कॉलर कम शब्दों में सटीक बात कहेगा, बिना किसी भूमिका के बिना किसी लाग लपेट के, यह जो भाषा की तीक्ष्णता उसके अन्दर जन्म लेती है, यही साहित्य की ताकत बनती है। मुझे लगता है विज्ञान का विद्यार्थी और शिक्षक होना ही मेरी ताकत है, जो लिखने में पैनापन लाने को उकसाती है। साहित्य में गैर-साहित्यिक पृष्ठभूमि के कितने ही साहित्यकार हैं, शायद उनका भी यही अनुभव हो।  
ढाई दशक यानी ‘सिल्वर जुलबी’, बहुत अधिक नहीं तो कम समय भी नहीं है, इन पच्चीस सालों में बहुत कुछ सीखा, सोच परिपक्व हुई, मुझे लगता है जितना हम साहित्य को देते हैं, उससे कहीं अधिक साहित्य हमें देता है।
मेरी कोई साहित्यिक पृष्ठभूमि नहीं रही, साहित्य से दूर-दूर का कोई नाता नहीं था। मैं साहित्य में अनायास भी नहीं आया, सायास ही आया, आप कह सकते हैं कि लाया गया। अपने भरपूर जवानी के समय में (अगर वो कोई समय मेरी जिन्दगी में पल दो पल के लिए आया तो..) काव्य रचना, कहानियाँ गढना, क्या पता कौन सी अदृश्य शक्ति थी, एक साथी की रचनाएँ सुधारते-सुधारते न जाने कब खुद रचनाकर्म में लिप्त हो गया।
ईश्वर और नियति को तो मैं नहीं मानता लेकिन ये सब रासायनिक संयोग के नियम की तरह ही है, तो संयोग सबको एक सा परिणाम नहीं देते। परमाणुओं, अणुओं की संख्या, संरक्षित द्रव्यमान सबकी भूमिका होती है, प्रकृति ने जो कुछ भी दिया गया है, काफी है।
 
शालिनी कपूर: एक उम्र से पहले आपको "वरिष्ठ साहित्यकार" कहा जाने लगा है। जिसकी एकमात्र वजह आपका गम्भीर और सतत लेखन है। पचास से भी कम उम्र में इस शानदार यात्रा को कैसे देखते हैं आप?

सन्दीप तोमर: शालिनी! मैं वरिष्ठ कहे जाने मात्र से असहज हो जाता हूँ, मुझे ऐसा लगने लगता है, उम्र से पहले उम्रदराज हो रहा हूँ, सीमाब अकबराबादी का शेर है जिसे लोग बहादुर शाह ज़फ़र का शेर कहकर भी पढ़ते हैं-
 
उम्र-ए-दराज़ मांग के लाई थी चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में
 
तो न ही मैं उम्र-दराज़ हूँ, न ही होना ही चाहता, बचपन को भरपूर न जी पाया, जवानी को जी लेने का ख्वाब है।
हाँ, ये यात्रा वाकई शानदार है, कुछ खुशियाँ, कुछ रंज-ओ-गम, किसी का मिलना तो किसी का बिछुड़ना, सब मेरे साहित्य का हिस्सा बनता गया।
वैसे मेरा मानना है हर रचना पर काम करते हुए लेखक नवोदित, या उदीयमान होता है, वह व् उसकी नयी रचना प्रसव काल, शैशव काल से होते हुए यौवन और फिर प्रोढ़ता की ओर जाती है।
यूँ तो मेरे लेखन का ये शैशव काल ही है, अभी बहुत कुछ है ज़ेहन में जिसे लिखा जाना शेष है, जिसे अभी कलमबद्ध करना है। हाँ, ये जरुर है जितने उतार-चढ़ाव या कहो संघर्ष मेरी जिन्दगी में आये, उन्होंने मेरे ज़ेहन को एक उम्र से पहले परिपक्व कर दिया। ये जो अथाह तजुर्बे मिलते हैं, इन्हीं से लेखन समृद्ध होता है। अगर आपको लगता है कि यह समृद्धि मेरे हिस्से भरपूर आई है तो इससे अभिभूत होना तो बनता है।
 
शालिनी कपूर: चार विषयों में स्नातकोत्तर- गणित, भूगोल, समाजशास्त्र, और शिक्षा साथ ही दर्शन-निष्णात। शिक्षण-डिप्लोमा व स्नातक, पीएचडी अध्ययनरत। फिर साहित्य में आपकी मजबूत पकड़ है। इस दौर के सबसे ज्यादा शिक्षित कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। विज्ञान स्नातक अंग्रेजी माध्यम से फिर भी हिंदी भाषा को ही लेखन के लिए चुनने के लिए कोई विशेष प्रयोजन रहा? 

सन्दीप तोमर: स्नातकोत्तर विषयों में डिग्री लेना दिलचस्पी के साथ-साथ पदोन्नति से भी जुड़ा हुआ है, गणित मेरी पसंद का विषय था, समाजशास्त्र में एम.ए करना मेरे शोध-निदेशक की सलाह से हुआ, उनका मत था कि दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र में जल्दी रिक्तियां निकलेंगी, इससे डिग्री तो मिल गयी लेकिन उस साल विषय की रिक्ति न निकालकर एक सामान्य रिक्ति निकाली गयी, जो नियमानुसार गलत अवश्य था लेकिन स्वायत्त अधिकारों वाली संस्थाओं पर सवाल करके भी परिणाम आपके पक्ष में नहीं होते, भूगोल से एम.ए. करना भी पदोन्नति के लिए किया गया प्रयास था। हाँ, इतना अवश्य है कि शिक्षा तो हासिल हुई ही, भले वजह जो भी रही।
विज्ञान में स्नातक करने के लिए हिन्दी माध्यम अधिक कठिन है, अच्छी पुस्तकें न होना, खराब अनुवाद, हिन्दी में वैज्ञानिक शब्दावली के कठिन शब्द; ऐसे कई कारण है जब अंग्रेजी में पढना अधिक आसान हो जाता है। क्योंकि मैं कौरवी भाषा की बेल्ट में पढ़ा-बढ़ा हूँ और ये मेरी मातृ-भाषा है, यह वर्तमान हिन्दी की जननी भी है, कौरवी कालांतर में मेरठी हुई उसके बाद खड़ी बोली, और फिर वर्तमान हिन्दी, तो मैं ख़ुद को सबसे बेहतर तरीके से इसी भाषा में व्यक्त कर सकता हूँ।
वैसे मेरा ये भी स्पष्ट मानना है कि भाषा सम्प्रेषण का एक माध्यम भर है, आप उसी भाषा में अपनी बात, अपने विचार संप्रेषित कर सकते हैं, जिसे आप अपने बेहद करीब पाते हैं।
 
शालिनी कपूर: अपने बारे में विस्तार से बताइए। मसलन आप कहाँ जन्में? बचपन कैसे बीता? परिवार का माहौल कैसा था? आपके आरंभिक शिक्षा कहाँ, कैसे और किन-किन हालातों में हुई? दिल्ली जैसे महानगर में आने का प्रयोजन?

सन्दीप तोमर: मैं मूलतः पिछली कई पीढ़ियों से खतौली, मुज़फ्फरनगर से हूँ। तकरीबन 800 साल पहले मेरे पुरखे नबाबी हुकूमत से झगडे के चलते दिल्ली से पलायन कर वहाँ चले गए थे, जंगलों को काट गॉव बसाया, मेहनत की, खेती-किसानी ही उनका व्यवाय था, एक ज़माने में सामंती रहा परिवार बारम्बार बटवारे की मार सहता, छोटी जोत की किसानी में सीमित हुआ तो एक पीढ़ी ने नौकरी करना शुरू किया, कुछ व्यवसाय में संलग्न हुए, मेरे पिताजी ने अध्यापन चुना। मेरी माँ अधिक कर्मठ और उतनी ही धर्मपरायण, परिवार को समर्पित महिला। मेरा बचपन बहुत ही सामान्य तरीके से बीता है लेकिन मेरे संघर्षो में विविधता रही। ख़्याली दुनिया जैसा बचपन मैंने नहीं जिया।
खतौली क़स्बा उत्तर प्रदेश के तीन बड़े कस्बों में सुमार है, जहाँ उर्दू-हिन्दी का घालमेल (सम्मिश्रण) ऐसा है कि वहाँ पले-बढ़े लड़के को इन दो भाषाओँ में फर्क ही नहीं लगेगा। यहाँ से विज्ञान-स्नातक फिर जिले में रहकर बीटीसी डिप्लोमा, उसके बाद दिल्ली से आगे की पढ़ाई।
दिल्ली आना भी महज एक संयोग रहा हो, ऐसा भी मुझे नहीं लगता, दिल्ली मुझे बचपन से ही आकर्षित करती थी, माँ की बड़ी बहन दिल्ली के एक अमीर घराने में थी, माँ अक्सर मुझे लेकर यहाँ आती-जाती थी, मासी के परिवार के ठाट देख मुझे लगता, दिल्ली में हम क्यों नहीं रहते। मेरी नौकरी जब लगी तो मेरा भाई रोजगार के लिए दिल्ली में सघर्ष कर रहा था, मैं अपने भाई से मिलने आया, उसकी किसी मजाक में कही बात से मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, बीएड किया, एमएड करते हुए जो प्रेमिका बनी उसके दिल्ली रुकने भर के आग्रह से सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा दे, इसे अपनी कर्मस्थली बना लिया। इस तरह जहाँ से मेरे पुरखे पलायन कर गए थे, उस राजधानी को मैंने चुना या उसने मुझे, कह नहीं सकता।
 
शालिनी कपूर: मुख्यतः देश के दो विश्वविद्यालयों में आपका अध्ययन, एक मेरठ, दूसरा दिल्ली, शिक्षा के लिहाज से दोनों जगहों में पर्याप्त अंतर, शैक्षणिक दुनिया में दोनों शहरों की संस्कृति एक-दूसरे से जुदा, क्या लगा आपको? मेरठ के एकल महाविद्यालय से दिल्ली की सह-शिक्षा में आने पर आपको कैसा लगा, यहाँ के शैक्षणिक माहौल में एडजस्ट करने में कैसी परेशानियाँ आई?

सन्दीप तोमर: शालिनी! मुझे दो नहीं अपितु चार-चार विश्वविद्यालयों से पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
दिल्ली और मेरठ दोनों ही शानदार विश्वविद्यालय हैं। खतौली ने मुझे चलाना सिखाया, मेरी सोच के फलक को विस्तार दिया, मुझे किसी भी माहौल में रहने के लिए परिपक्व बनाया, इसमें मेरठ विश्वविद्यालय का बड़ा हाथ रहा, कॉलेज में पढ़ते हुए शिक्षा के साथ-साथ राजनीति के पाठ यहीं से सीखे। वहाँ से दिल्ली विश्वविद्यालय पलायन यानी छोटी दुनिया से विस्तृत दुनिया में प्रवेश करना, मेरठ ऐतिहासिक स्थल है, इसलिए वहाँ से विशेष अनुराग है। दिल्ली विश्वविद्यालय ने जीवन से प्रेम करना सिखाया, यहाँ के अनुभव मेरे प्रथम उपन्यास की आधारशिला बने। ये मेरी निजी नाक़ामयाबी है।
पहले भी घर से दूर रहा, पहले तीन साल खतौली, मेरा परिवार गॉव में रहता था, मैं पढ़ते हुए शहर में, फिर दो साल मुज़फ्फरनगर होस्टल का जीवन लेकिन अगर बात करें डीयू की, तो घर से दूर की इस जगह ने मुझे स्वावलम्बन से जीने का पाठ पढाया। कहते हैं- जब सब पराये हों तो पराये ही अपने बन जाते हैं। डीयू ने सवाल करने सिखाये, अब तक जवाब देना ही सीख पाए थे। शिक्षा में लोकतन्त्र आपको कैंपस ही सिखाता है। सबसे बड़ी बात- यहाँ प्रोफ़ेसर और स्कॉलर का भेद ख़त्म हो जाता है, दोनों जगहों पर पढ़ते हुए बेहिसाब चीज़ें सीखने को मिली। आप केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कैंपस में पढ़ते हुए एक बड़ी दुनिया की परिधि में आते हैं, जहाँ कास्ट, रिलिजन, स्टेट, कंट्री सबके भेद मिट जाते हैं, आप एक ही समय में ग्लोबल हो रहे होते हैं, आप इन्सान बनने की प्रक्रिया में होते हैं। सह-शिक्षा आपको असल मायने में इंसान बनाती है, आपके विजन को अधिक फोकस होने में मदद करती है। आप स्त्री-पुरुष से मानवीय होने की प्रक्रिया की ओर बढ़ते हैं, हालाकि ये आसान नहीं होता, लेकिन न हो पाए इतना भी मुश्किल नहीं है।
 
शालिनी कपूर: दर्जनाधिक किताबों का लेखन। असंख्य किताबें पढ़ी भी गई होंगी। इससे जुड़ी कुछ रोचक/अरोचक घटनाएं, कुछ रुचिकर/अरुचिकर, कुछ प्रभावी कुछ अप्रभावी? क्या कहना चाहेंगे आप?

सन्दीप तोमर: मुझे कीबोर्ड से इश्क है, एक महबूब की तरह हर रोज़ उससे रु-ब-रु होता हूँ। एक दिन न मिलूँ तो रंज होने लगता है।
आपका सवाल बहुत दिलचस्प है, और इस पर विचार करते हुए मुझे याद आता है कि लेखन और पठन दोनों ही मेरे जीवन का अहम हिस्सा रहे हैं। दर्जनाधिक किताबों का लेखन और असंख्य किताबों का पठन मेरे अनुभवों का हिस्सा बन चुके हैं, और इनमें कई रोचक, अरोचक, प्रभावी और अप्रभावी घटनाएं जुड़ी रही हैं।
लेखन की प्रक्रिया में हमें हमेशा एक नई चुनौती का सामना करना पड़ता है। कभी-कभी ऐसा होता है जब एक विचार या विषय को पकड़ उस पर विस्तार से लिखते हुए एक नई दिशा मिलती है। कई दफा ऐसा भी होता है कि किसी किताब को लिखते हुए कुछ ऐसे तथ्यों का पता चलता है जो मुझे पहले से ज्ञात नहीं थे, और वे घटनाएं आपके लेखन के लिए बेहद प्रेरणादायक बन जाती हैं, यह सब आपके अवचेतन से आता है, पता नहीं कितना कुछ है वहाँ। पढ़ते हुए भी ऐसा ही अनुभव होता है— एक नई किताब पढ़ने पर ऐसा लगता है जैसे एक नया संसार खुल गया हो, और यह अनुभव बेहद रोचक होता है। लेकिन कुछ किताबें बहुत उबाऊ भी हो जाती हैं, आपको सुनकर अजीब लगेगा लेकिन ये सच है कि टैगोर का गोरा उपन्यास पढने में मुझे पांच साल से अधिक का वक्त लगा जबकि रानू का उपन्यस ‘काजल’ मैंने हर महीने पढ़ा।
अधिकांश आत्मकथाएं बहुत उबाऊ होती हैं, चाहे लेखक कितना ही बड़ा क्यों न हो, अमृता प्रीतम की ‘रसीदी टिकट’ मुझे प्रभावित नहीं करती जबकि ‘अक्षरों के सायें में’ पढ़कर मुझे अपनी आत्मकथा “कुछ आँसूं कुछ मुस्काने” लिखने की प्रेरणा मिली।
लेखन में कभी-कभी ऐसा होता है कि कुछ विचार लिखने के लिए बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन जब उन्हें शब्दों में ढालते हैं, तो वे उतने प्रभावी नहीं होते। कभी-कभी एक किताब या लेखन का विषय इतना गहरा और प्रभावशाली होता है कि वह पूरी तरह से आपके दृष्टिकोण को बदल देता है।
कुल मिलाकर, लेखन और पठन का सफर कभी सरल नहीं होता, लेकिन यही चुनौती हमें बेहतर लेखक और पाठक बनने की ओर प्रेरित करती है।
 
शालिनी कपूर: आज से ठीक पच्चीस साल पहले आपकी पहली कविता, पहली लघुकथा और पहली कविता की किताब भी छपी...। क्या कोई प्रेरणा थी उस शुरुआती लेखन के पीछे? क्या ये प्रेम जैसा कुछ था या साहित्यिक जुनून?

सन्दीप तोमर: पच्चीस साल पहले ऐसा बहुत कुछ था जिसने लिखने को विवश किया, विश्वविद्यालय की उबाऊ फिलोशोफी की क्लास, प्रकृति से जुड़ाव, मेरा एकाकीपन, और उससे बढकर एक अदद प्रेमिका, कह सकते हैं, वही प्रेमिका प्रेरणा भी थी, मुझे लेखन में देखना भी चाहती थी लेकिन अपने पीछे, आगे नहीं। उसे लिखना पसंद था लेकिन लिखना सही से जानती नहीं थी, टूटा-फूटा जो भी लिखती उसे काव्य मान लेती, मैं हर डेट पर यूनिवर्सिटी पार्क में उसके साथ पेड़ के नीचे बैठ उसकी रचनाओं में सुधार कर रहा होता, और वह पोएट्री के अवार्ड जीत जाती, वह कहती- जब मुझे अवार्ड दिला देते हो तो खुद के लिए क्यों नहीं लिखते।
साहित्यिक जुनून शुरुआती दौर में नहीं था, जुनून तो प्रेम का ही था, जब प्रेम था तो साहित्य नहीं था, साहित्य है तो प्रेमिका रहित प्रेम है। मुझे लगता है बिना प्रेरणा के लिखना संभव नहीं, वैसे भाव ही नहीं आ सकते जो प्रेम में आकंठ डूब कर आते हैं।
 
शालिनी कपूर: आपके बारे में अक्सर कहा जाता है कि आपकी रचनाएँ प्रेम के इर्द-गिर्द घूमती हैं, सुना तो यहाँ तक जाता है कि आप पहले प्रेम को जीते हैं फिर उसे कागज पर उकेर देते हैं, यानि आपने जो भी लिखा, वह सब आपका खुद का भोगा/जिया हुआ प्रेम है, अपने प्रेम के बारे में खुलकर विस्तार से बताइए। 

सन्दीप तोमर: शालिनी! हस्तिनापुर मेरे घर से बीस-बाईस किमी दूर है और मथुरा-वृन्दावन दो-ढाई सौ किमी, इन दोनों जगहों की मिट्टी प्रेम की मिट्टी है, कृष्ण की मिट्टी है, इस मिट्टी में जन्मा-पनपा इंसान बिना प्रेम के कैसे हो सकता है?
प्रेम का प्रस्फुटिकरण जीवन में आनंद, शांति और सामंजस्य का कारण बनता है, और यह हमारे विचारों, कार्यों और संबंधों में सकारात्मक प्रभाव डालता है। अगर आप प्रेममय हैं तो आपका लेखन उससे अछूता कैसे रह सकता है? मुझे प्रेम के हर एक रूप में से मानवीय रूप अधिक महत्वपूर्ण लगता है।
प्रेम एक अनमोल और अप्रत्याशित अनुभव है, जिसे शब्दों में बयां करना कभी आसान नहीं होता। मैं मानता हूँ कि प्रेम, जैसा कि हम इसे समझते हैं, वह न केवल एक भावनात्मक स्थिति है, बल्कि यह जीवन के एक गहरे अनुभव का हिस्सा है। जब मैंने प्रेम को महसूस किया, तब वह किसी खास व्यक्ति या घटना से जुड़ा नहीं था, बल्कि यह एक आंतरिक परिवर्तन था, जो मुझसे बाहर की दुनिया में भी प्रभाव डालने लगा। प्रेम के उन क्षणों में, मुझे लगता था कि मैं पूरी दुनिया से जुड़ा हुआ हूँ।
जब मैं प्रेम को जीता हूँ, तो वह मेरे भीतर एक अनकहा, अधूरा सा गीत बन जाता है, जिसे मैं शब्दों के माध्यम से पूरा करने की कोशिश करता हूँ। हर शब्द, हर कविता, हर कहानी जो मैंने लिखी, वह मेरा व्यक्तिगत अनुभव और उन भावनाओं का परिणाम है जो मैंने जिया। मेरा लेखन मेरे ह्रदय के अंदर जो प्रेम था, उसे कागज पर उतारने का एक तरीका था।
प्रेम सिर्फ किसी एक व्यक्ति से संबंधित नहीं है, बल्कि यह आत्मा, प्रकृति, कला और जीवन के प्रति हमारे दृष्टिकोण से भी जुड़ा होता है। इसलिए, जब मैं प्रेम के बारे में लिखता हूँ, तो यह केवल एक व्यक्तिगत अनुभव न होकर जीवन के व्यापक संदर्भ में होता है। यह वह प्रेम है, जो हर क्षण में बदलता है, नया रूप लेता है, और एक दिशा दिखाता है।
 
शालिनी कपूर: सोशल मिडिया पर अपने समय के लेखकों से आपके बहुत मधुर सम्बन्ध दिखाई देते हैं, आप जितने पॉपुलर अपने समकक्ष लेखकों में हैं, उससे अधिक अधिक चर्चित नवोदितों में हैं और कमोबेश अपने से पहली पीढ़ी में भी आपकी खूब चर्चा होती है, खुद को कैसे इतना चर्चित बनाकर पेश कर पाते हैं आप?

सन्दीप तोमर: साहित्य केवल व्यक्तिगत यात्रा नहीं होती, बल्कि यह एक सामूहिक प्रक्रिया है, जहाँ एक लेखक दूसरे लेखक से सीखता है, विचारों का आदान-प्रदान करता है और साथ में समाज की मानसिकता को बदलने का प्रयास करता है। सोशल मीडिया आज के समय में एक ऐसा मंच है, जो हमें दुनिया भर के लेखकों और पाठकों से सीधे जुड़ने का भी अवसर देता है।
मेरे लिए लेखन केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि यह एक अनुभव साझा करने की प्रक्रिया है। जब आप अपनी रचनाओं को आत्मीयता और ईमानदारी से प्रस्तुत करते हैं, तो पाठक भी उससे जुड़ाव महसूस करते हैं। यही कारण है कि लोग न केवल मेरी रचनाओं को पसंद करते हैं, बल्कि मेरे दृष्टिकोण और विचारों को भी सराहते हैं। मैं इस बात को हमेशा ध्यान में रखता हूँ कि कोई भी लेखक, चाहे वह नवोदित हो या स्थापित, केवल अपनी कड़ी मेहनत, निरंतरता और सच्चाई से ही सामाजिक प्रभाव बना सकता है।
चर्चित होने के संदर्भ में, मुझे लगता है कि सफलता कभी किसी एक चीज से नहीं आती। यह निरंतर प्रयास, सही समय पर सही विचार प्रस्तुत करने और समाज से जुड़ाव की प्रक्रिया का परिणाम है। अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के साथ संवाद करना, विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय रहना, और सबसे महत्वपूर्ण, दूसरों के काम को सराहना और उनसे सीखना – यही वे चीजें हैं जिन्होंने मुझे पहले पीढ़ी के लेखकों के साथ-साथ नवोदित लेखकों और पाठकों में भी चर्चित किया है।
 
शालिनी कपूर: आप यारबाश हैं, साहित्यिक, अकेडमिक  और कार्य-स्थल की यारियों में क्या अंतर पाते हैं? यारियों के नफ़े-नुकशान भी खुद देखें/झेले होंगे, आपके क्या अनुभव रहे और उससे साहित्यिक यात्रा पर कैसा असर आपने पाया?
सन्दीप तोमर: आपका सवाल बहुत दिलचस्प है, क्योंकि यारबाशी का हर रूप अपने आप में अनूठा और व्यक्तिगत होता है। साहित्यिक, अकादमिक और कार्यस्थल की यारियों में जो अंतर है, वह अक्सर वातावरण और उद्देश्य के आधार पर बदलता है।
साहित्यिक यारी में गहरी विचारों की साझेदारी होती है। यहाँ पर आप एक-दूसरे की काव्यात्मकता, विचारधारा और रचनात्मकता की कद्र करते हैं। साहित्यकारों के बीच की यारी अधिकतर एक मानसिक और भावनात्मक जुड़ाव होती है, जहाँ विचारों की अभिव्यक्ति और भाषा का खेल होता है। यह यारियाँ अक्सर प्रेरणादायक होती हैं, क्योंकि आप एक-दूसरे के काम से प्रभावित होते हैं, और एक-दूसरे को बेहतर बनाने की दिशा में मदद करते हैं। हालांकि, इन यारियों में प्रतिस्पर्धा भी हो सकती है, जो एक तरफ प्रेरणा का काम करती है, लेकिन दूसरी ओर ईर्ष्या या असहमति का कारण भी बन सकती है।
अकादमिक जगत में यारियाँ थोड़ी और व्यावसायिक और उद्देश्यपूर्ण होती हैं। यहाँ पर संवाद और सहयोग का मतलब होता है ज्ञान साझा करना और अध्ययन की दिशा में एक-दूसरे की मदद करना। अकादमिक यारियाँ अक्सर ज्यादा तार्किक और शोधात्मक होती हैं, लेकिन कभी-कभी यह संबंध आत्मिक जुड़ाव की बजाय केवल व्यावसायिक लाभ तक सीमित रह जाते हैं। फिर भी, इन यारियों से आप बहुत कुछ सीख सकते हैं और अपने ज्ञान की सीमाओं को बढ़ा सकते हैं
कार्यस्थल पर यारियाँ ज्यादा प्रोफेशनल होती हैं। यहाँ पर संबंधों का मुख्य उद्देश्य काम को बेहतर तरीके से करना और कार्यस्थल के माहौल को सुगम बनाना होता है। हालांकि, कार्यस्थल की यारियाँ कभी-कभी राजनीति और शक्ति के खेल में बदल सकती हैं, जिनका प्रभाव व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन पर पड़ता है। यहाँ पर यारियाँ निभाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि हर किसी का उद्देश्य अलग हो सकता है, यह व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन के बीच की सीमा को धुंधला कर देती हैं।
जहाँ तक नफे-नुकसान का सवाल है, तो हर क्षेत्र की यारी के अपने फायदे और नुकसान होते हैं। साहित्यिक यारी ने मुझे प्रेरणा दी है, लेकिन कभी-कभी यह भावनात्मक दबाव भी उत्पन्न कर सकती है, क्योंकि मैं हमेशा दूसरों के स्तर तक पहुँचने की कोशिश करता हूँ। अकादमिक यारियाँ ज्ञान और विचार साझा करने में मदद करती हैं, लेकिन कभी-कभी यह काम की सख्ती और सीमाओं में बंधी रहती हैं। कार्यस्थल की यारियाँ मुझे व्यावसायिक जीवन में सहयोग और दक्षता प्रदान करती हैं, लेकिन यह व्यक्तिगत संबंधों के महत्व को नकारती हैं।
इन सब अनुभवों ने मेरी साहित्यिक यात्रा पर प्रभाव डाला है। साहित्यिक यारियों ने मेरी लेखनी में गहराई और भावनाओं की प्रामाणिकता को बढ़ाया, जबकि अकादमिक और कार्यस्थल संबंधों ने मुझे व्यावहारिक दृष्टिकोण और समय प्रबंधन सिखाया। कुल मिलाकर, मैंने यह सीखा है कि यारियाँ जीवन के हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण होती हैं, लेकिन यह जरूरी है कि आप अपनी सीमाओं को समझें और उन यारियों में संतुलन बनाए रखें, ताकि वे आपके लेखन और जीवन में सकारात्मक प्रभाव डालें।
 
शालिनी कपूर: कहानियाँ, उपन्यास, लघुकथाएँ, कविता, नज़्म, आत्मकथा, दर्जन भर किताबें, खूब यात्राएँ, असंख्य तजुर्बे, साक्षात्कार; इन सबमें सन्दीप तोमर को सर्वाधिक प्रिय क्या है? खुद को किस रचना, किस किरदार के सबसे नजदीक पाते हैं?

सन्दीप तोमर: संदेश के रूप में या रचनाओं में, हर अनुभव और हर कृति मेरे लिए अनमोल है, क्योंकि हर एक ने मेरी यात्रा को अलग-अलग तरीकों से आकार दिया है। कहानियाँ, उपन्यास, लघुकथाएँ, कविताएँ – ये सभी रूप मेरे लेखन के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, लेकिन अगर मुझे किसी एक चीज़ को सबसे प्रिय कहना हो, तो वह उपन्यास होगा। उपन्यास एक विस्तृत और गहरे रूप में जीवन की जटिलताओं को समझने का अवसर देता है। इसमें पात्रों की पूरी दुनिया, उनके विचार, भावनाएँ, संघर्ष, और विकास का एक लंबा सफर होता है। उपन्यास लेखक को अपने विचारों और दृष्टिकोण को पूरी तरह से विकसित करने का अवसर देता है, और इसमें पूरी कहानी को विस्तार से पेश करने की क्षमता होती है। उपन्यास में पात्र का चरित्र कहीं अधिक उभरकर आता है, यहाँ लेखक को अपनी बात कहने की आज़ादी अन्य विधाओ से कहीं अधिक है। लेखक उपन्यास लिखते हुए पात्रों के साथ उचित न्याय कर पाता है।
अगर बात किरदार की हो, तो "किरदार" के बारे में सोचते हुए मैं खुद को किसी एक निश्चित पात्र से जोड़ कर नहीं देखता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस समय मेरी मानसिक स्थिति क्या है और मैं क्या महसूस कर रहा हूँ। कभी मैं किसी संघर्षशील पात्र की तरह महसूस करता हूँ, तो कभी किसी शांत, गहरे विचारों वाले पात्र की तरह। कभी मैं खुद को किसी बागी या मुक्ति की तलाश करने वाले पात्र में देखता हूँ, तो कभी किसी ऐसे व्यक्ति में जो जीवन के छोटे-छोटे सुखों को महत्व देता है।
इस संदर्भ मेरे उपन्यास “एक अपाहिज की डायरी” के पात्र सुदीप को देखा जा सकता है, वह पात्र मेरे जीवन की प्रतिकृति है, बतौर लेखक अपनी परतों को खोलने, अपनी गलतियों और सफलता के पीछे के कारणों को लिखने की ईमानदारी ही है जो मुझे भीड़ से अलग खड़ा करती है, एक मुलाकात में ममता कालिया जी ने मुझसे कहा- “सन्दीप, इस उपन्यास जैसी ईमानदारी आज के लेखकों में नहीं दिखती, तुम अपनी कमियों को भी कितनी सहजता से लिख गये।“ कह सकता हूँ- अपनी यात्रा को शब्दों में ढालने से मैंने न केवल खुद को, बल्कि अपनी सृजनात्मकता को भी समझा है।
समग्र रूप से कहूँ तो मैं उन सभी रचनाओं और किरदारों के करीब खुद को महसूस करता हूँ जिनसे मुझे कुछ नया सीखने का अवसर मिलता है। हरेक लेखन प्रक्रिया में एक नया रूप होता है, और हर रचना में खुद को ढूंढने की एक खोज होती है। इसलिए, मुझे कहना होगा कि रचनात्मकता के हर रूप में खुद को महसूस करने का अनुभव अलग और अद्वितीय होता है, और यही वह यात्रा है, जो मुझे साहित्य के इस सुंदर संसार से जोड़े रखती है।
 
शालिनी कपूर: कुछ बातचीत अपने समय की लेखिकाओं पर, किसके लेखन से अधिक प्रभावित हैं?  स्त्रीवाद पर भी कुछ बातचीत?

सन्दीप तोमर: लेखिकाओं का लेखन हर समय में न केवल प्रेरणा का स्रोत रहा, बल्कि यह समाज और जीवन की जटिलताओं को समझने का एक माध्यम भी है। वे न केवल स्त्री के अस्तित्व को, बल्कि समाज में उसकी भूमिका और संघर्ष को बहुत खूबसूरती से पेश करती हैं।
इनमें से एक प्रमुख नाम हैं- ममता कालिया, सूर्यबाला, चित्रा मुद्गल, रजनी गुप्त, नीलाक्षी सिंह, वंदना राग, उषा प्रियंवदा, मेहरुन्निसा परवेज, हुस्न तबस्सुम 'निहाँ', शहनाज़ फातमी, मृदुला गर्ग, मृणाल पांडेय, नासिरा शर्मा, मधु कांकरिया। इन सबने ही स्त्री के जीवन को एक नए दृष्टिकोण से देखा और प्रस्तुत किया। ये इस बात पर जोर देती हैं कि स्त्री का संघर्ष केवल पुरुष प्रधान समाज से नहीं, बल्कि स्वयं अपनी सीमाओं से भी है।
स्त्रीवाद के संदर्भ में, मुझे लगता है कि यह एक ऐसी विचारधारा है, जो केवल स्त्रियों के अधिकारों की बात नहीं करती, बल्कि यह समाज के हर वर्ग की समानता की ओर इशारा करती है। स्त्रीवाद का मतलब सिर्फ महिलाओं के खिलाफ हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़ा होना नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता को चुनौती देना है जो स्त्री को कमजोर, असमर्थ या तुच्छ मानती है। यह विचारधारा स्त्री को केवल घर की चाहरदीवारी तक सीमित नहीं देखती, बल्कि उसे हर क्षेत्र में बराबरी का हक देती है।
मेरे लिए, स्त्रीवाद का मतलब है - स्वतंत्रता, बराबरी, और आत्मनिर्णय का अधिकार। यह विचार केवल समाज के भीतर स्त्री के स्थान को ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की पहचान और अस्तित्व को लेकर सवाल उठाता है।
मेरे लेखन में, मैं अक्सर उन सवालों और मुद्दों को उठाने की कोशिश करता हूँ, जो स्त्री के दृष्टिकोण से जीवन की जटिलताओं को सामने रखते हैं। यह केवल पुरुषों और महिलाओं के बीच का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह आत्म-मूल्य और सामूहिक सामाजिक परिप्रेक्ष्य का भी सवाल है।
जब आप स्त्रीवाद की बात करते हैं, तो यह इस बात का भी संकेत है कि हम अपने समाज में पुरुष और महिला के बीच की समानता को सिर्फ कानूनी तौर पर नहीं, बल्कि मानसिकता के स्तर पर भी स्वीकार करें। यह समानता केवल अधिकारों की बात नहीं है, बल्कि यह उस सम्मान की बात है जो हमें अपने-अपने स्थान और अस्तित्व को समझने में मदद करता है।"

शालिनी कपूर: पिछले एक दशक में समाज में जो खुलापन आया है, उससे आपके लेखन में भी बदलाव आया? क्या लिव इन, कॉन्ट्रैक्ट मैरिज, हुक-अप जैसे कांसेप्ट को आप सांस्कृतिक बदलाव के रूप मद में रखते हैं या टकराव के?

सन्दीप तोमर: पिछले एक दशक में समाज में आए खुलापन ने निश्चित रूप से सभी के लेखन को प्रभावित किया है। आजकल समाज में जो परिवर्तन हो रहे हैं, वे मेरे दृष्टिकोण और विचारों को नए तरीके से आकार दे रहे हैं। लिवइन, कॉन्ट्रैक्ट मैरिज, हुक-अप जैसे कांसेप्ट निश्चित रूप से सांस्कृतिक बदलाव का हिस्सा हैं, जो पारंपरिक सोच को चुनौती दे रहे हैं और नए तरह के संबंधों की पहचान बना रहे हैं।
जहाँ तक टकराव की बात है, यह भी एक हद तक सच है, क्योंकि समाज के विभिन्न हिस्सों में इन बदलावों को लेकर विरोधाभास और असहमति पाई जाती है। लेकिन मुझे लगता है कि यह सांस्कृतिक विकास का हिस्सा है, जो समय के साथ एक स्थिरता की ओर बढ़ेगा।
लेखन में इस बदलाव को अपनाना और समझना प्रत्येक लेखक का कर्तव्य है। मैं मानता हूँ कि ऐसे मुद्दों पर लिखना समाज की मौजूदा स्थिति और आने वाले बदलावों को समझने में मदद करता है। यह हमें यह विचार करने का अवसर देता है कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं और क्या हमें पारंपरिक विचारों को चुनौती देने की जरूरत है? या फिर उनके साथ खुद को एडजेस्ट कर लेने में समझदारी है।
 
शालिनी कपूर: दिल्ली और कस्बाई संस्कृति के साहित्यिक माहौल को आप किस तरह से देखते हैं? एक बेबाक लेखक की बेबाक टिप्पणी? या कुछ और जो इस बातचीत में छूट रहा हो?

सन्दीप तोमर: दिल्ली और कस्बाई संस्कृति का साहित्यिक माहौल बहुत ही विविधतापूर्ण और गहरे अर्थों से भरा हुआ है। जहाँ दिल्ली को देश की राजधानी के रूप में राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र का दर्जा प्राप्त है, वहीं कस्बाई साहित्य में एक अलग ही काव्यात्मकता और वास्तविकता झलकती है। दिल्ली पिछले तीन-चार दशकों से हिन्दी की साहित्यिक राजधानी के रूप में भी विख्यात हुई है, आप कुख्यात शब्द भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
दिल्ली में साहित्यिक माहौल कभी-कभी एक संक्रमण जैसा भी होता है। यहाँ की तेज़-तर्रार और ग्लोबल होने की प्रवृत्तियां भी लेखकों को बहुत प्रभावी बनाती हैं, लेकिन यह शहरी माहौल कभी-कभी वास्तविकता से बहुत दूर भी हो जाता है। जिसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलने की सम्भावना प्रबल होती है। दिल्ली के लेखक अक्सर समकालीन समाज के मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, यहाँ के सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोणों से उनका लेखन प्रभावित होता है।
कस्बाई संस्कृति में साहित्य की जड़ें कहीं अधिक गहरी होती हैं, जो स्थानीय जीवन, संघर्ष, और वास्तविकताओं से जुड़ी होती है। कस्बों का साहित्य अक्सर सरल लेकिन सशक्त होता है। यहाँ की भाषा, पात्र, और संघर्ष अपनी भूमि से सीधे जुड़े होते हैं, और यह एक प्रकार की 'भूमि आधारित' संवेदनशीलता को दर्शाता है। कस्बाई लेखक अपने आसपास की दुनिया, परिवेश और बदलावों से प्रभावित होते हैं। उनकी कहानियाँ बहुत अधिक व्यक्तिगत होती हैं, लेकिन इनमें समाज के बड़े सवालों का भी समावेश होता है।
एक बेबाक लेखक की दृष्टि से कहूं तो दिल्ली के साहित्यिक माहौल में कुछ हद तक दिखावा और व्यावसायिकता भी घुली हुई होती है, जबकि कस्बाई साहित्य में एक तरह की निष्ठा और निरंतरता दिखाई देती है। दिल्ली के लेखकों के लिए वैश्विक मानक और पुरस्कार ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि कस्बों के लेखक अपने क्षेत्रीय और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में गहरे तल्लीन रहते हैं।
इस सब के बीच, महानगर और कस्बे दोनों में साहित्य का अपना महत्व है, बस दृष्टिकोण और समाज की प्राथमिकताएँ अलग हैं। एक लेखक का कर्तव्य है कि वह इन दोनों के अंतर को समझें, क्योंकि अंततः साहित्य समाज और मनुष्य के बारे में ही होता है, चाहे वह महानगर हो या कोई कस्बा।
शालिनी! कोई भी बातचीत मुकम्मल कभी नहीं होती, कुछ न कुछ ऐसा रह ही जाता है, जिस पर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन यह कुछ छूट जाना अगली मुलाकात की कड़ी का काम करता है। तो जो छूट गया उसे आगामी बातचीत तक स्थगित करने में ही भलाई है।
मिर्ज़ा ग़ालिब का शेर है-
"हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले।
 
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रचनाकार परिचय

शालिनी कपूर 

ईमेल :

निवास : नोएडा (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 7 जुलाई, 1984
लेखन की भाषा- हिंदी, भोजपुरी 
जन्मस्थान- बलिया , उत्तर प्रदेश
सम्प्रति- बतौर स्क्रिप्ट राइटर अरुंधति मीडिया लखनऊ में कार्यरत
साहित्य- वागर्थ,हिंदुस्तान,भोजपुरी साहित्य सरिता व अन्य पत्र पत्रिकाओं में कविता, संस्मरण और कहानियां प्रकाशित।
विशेष- हंस के वार्षिक सम्मेलन में मंच संचालन सहित अनेक कार्यक्रमों में मंच संचालन 
निवास स्थान- नॉएडा