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ऋचा पाठक की लघुकथाएँ

ऋचा पाठक की लघुकथाएँ

बगीचे के कोने में फूल-पत्तों की कतरनों और बाकी गंदगी के ढ़ेर पर उगा हुआ कुकुरमुत्ता आज सुबह से ही मुस्कुरा रहा था। हवा के झोंकों के साथ ऐसे हिल रहा था जैसे नाच रहा हो।

अपराध-बोध

आज अपनी छोटी बेटी काव्या को उसके विवाह के अवसर पर यह बात समझाते हुए रीमा जैसे स्वयं को आत्मग्लानि के पिंजड़े से आज़ाद कर रही थी। 
रीमा ने अपनी बड़ी बेटी भव्या को उसके विवाह में विदा करते समय सिखाते हुए कहा था, "बेटा,याद रखना पति ही पत्नी का परमेश्वर होता है।" यह वही सीख थी जो स्वयं रीमा को उसकी मां से और शायद उनको,उनकी मां से मिली थी, वही सीख देकर रीमा ने भव्या को विदा किया था।भव्या ने भी तमाम अवगुणों से युक्त अपने पति को परमेश्वर ही माना और तमाम तरह की शारीरिक-मानसिक यातनाएं झेलती रही पर मां द्वारा दी गई शिक्षा का मान रखा। मान रखते रखते किसी तरह से भव्या ने पांच वर्ष निकाल दिये पर जब सहनशक्ति ने साथ छोड़ दिया तो अपने परमेश्वर पर स्वयं को समर्पित कर के संसार से विदा हो गई। परन्तु आज रीमा अनेकों सामाजिक रुढ़ियों और मानसिक बंधनों के साथ-साथ स्वयं को अपराध बोध से भी मुक्त करते हुए अपनी छोटी बेटी काव्या को सीख दे रही थी कि ,"बेटा हमेशा ये बात ध्यान रखना कि आगामी जीवन के सुख-दु:ख, उतार -चढ़ाव में तुम अपने पति की सहचर हो अनुचर नहीं सदैव याद रखना कि यह तुम्हारे पति हैं परमेश्वर नहीं!"
 
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वेलेंटाइन वीक
 
बगीचे के कोने में फूल-पत्तों की कतरनों और बाकी गंदगी के ढ़ेर पर उगा हुआ कुकुरमुत्ता आज सुबह से ही मुस्कुरा रहा था। हवा के झोंकों के साथ ऐसे हिल रहा था जैसे नाच रहा हो। कुछ दूर पर एलोवेरा और सजावटी कैक्टस की क्यारी में फुसफुसाहट चल रही थी, कैक्टस एलोवेरा से पूछ रहा था,"आंय, इ कुकुरमुत्ते को आज क्या हो गया है ये काहे इत्ता इतराये रहा है , एलोवेरा ने जवाब मे कुछ जानकारी न होने का इशारा किया।
पिछले कुछ दिनों से रोज़ाना अलग अलग रंगों के गुलाब तोड़कर बाहर भेजे जा रहे थे। जिससे गुलाब वाली क्यारियों को ख़ुद पर नाज़ बढ़ता जा रहा था।क्योंकि दुनियाभर के लोगों को इस पूरे सप्ताह प्रेम के इज़हार के लिए बस गुलाब ही चाहिये। और कल तो हद ही हो गई थी जब लाल गुलाब वाली क्यारी से गुलाब तोड़े जा रहे थे, तो लाल गुलाब अहंकारवश और लाल हो गये थे क्यूंकि आज के दिन तो पूरे विश्व के राजा वही थे। पर... आज बगीचे के माली गुलाब की क्यारियों के पास तक नहीं फटके।ये देख कर कुकुरमुत्ता प्रसन्न था क्यूंकि वो परिवर्तन के प्राकृतिक और सांसारिक नियमों से बख़ूबी वाकिफ़ था। 

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अंध श्रद्धा 
 
"कहां रह गई थी... इतनी देर कर दी आने में, पता है 6.00 बज चुके हैं"। गुस्से में लाल पीली छोटी चाची चिल्लाती जा रही थीं, "पता है न तुझे आज कंजकों का न्योता है फिर भी देर से आयीं हैं महारानी।" गुस्से से भरी चाची बिल्कुल बजते रेडियो की तरह बोले चले जा रही थी,"अरे!कल्याणी को भी साथ ले आती वो कोई छोटी बच्ची नहीं रही, स्कूल जाने लगी है अब तो, उसे भी कुछ काम धाम सिखाओ।" सावित्री बिना कोई जवाब दिए, अपनी धोती का पल्लू खोंसते हुए तेजी से रसोईघर में घुसी और दोगुनी तेजी से काम शुरू कर दिया। कंजकों के आने के पहले उसने पूरा रसोई घर साफ़ करके पूरी, हलवा, काले-चने सारा प्रसाद बना के तैयार कर दिया था।
      इधर चाची कन्याओं के लिए आसन लगाकर पूजा की तैयारी करने लगी...रोली, चावल, दक्षिणा, उपहार आदि सब रख कर चाची आराम से बैठ कर कन्याओं की प्रतीक्षा करने लगीं। सारी कन्याओं को जीभर जिमाने के बाद उपहार व दक्षिणा दे विदा कर चाची ने स्वयं भी प्रसाद ग्रहण किया और आराम करने लगीं। लेटते हुए बोली,"सावित्री देख जरा अगर प्रसाद बचा है क्या...? अगर बचा हो तो कल्याणी के लिए भी लेती जाना वो भी खा लेगी तो पुण्य मिलेगा।
सावित्री हतप्रभ खड़ी पुण्य कमाने और भोजन निपटाने में अन्तर कर रही थी।
 
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रचनाकार परिचय

ऋचा पाठक

ईमेल :

निवास : बंगलूरू (कर्नाटक)

नाम- ऋचा पाठक
शिक्षा- अंग्रेजी साहित्य एवं हिन्दी साहित्य में परास्नातक
बी.एड. , एम.एड.
जन्मस्थान- कानपुर 
वर्तमान आवास- बंगलुरू 
सम्प्रति- हिन्दी व्याख्याता, श्री वैंकटेश्वरा कॉलेज, बैंगलुरू
लेखन- विभिन्न राष्ट्रीय पत्र- पत्रिकाओं में गद्य व पद्य दोनों विधाओं में रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।
 
अंग्रेजी साहित्य की विद्यार्थी होने के बावजूद अपने हिन्दी प्रेम के कारण मैंने हिन्दी साहित्य का अध्ययन कर परास्नातक की डिग्री प्राप्त की। समय की उपलब्धता देखते हुए साहित्य के क्षेत्र में स्वयं को सक्रियता बनाये रखने के लिए प्रयत्नशील रहती हूँ।
मोबाइल- 9794084482