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रेनुका चित्कारा की लघुकथाएँ

रेनुका चित्कारा की लघुकथाएँ

मधु ने गुस्से से भाई  को देखा और पूछा "क्यों कभी किसी ने भैया से नहीं बोला कि अपने चेहरे से चेचक के दागो को छिपाओ ... उनकी शादी तो हो गई आराम से उल्टा इकलौता होने के  कारण दहेज भी खूब मिला...

मर्जी का हक़ 
 
"ये मैं क्या सुन रहा हूँ?" हवेली में बड़े बाऊ जी की जोरदार आवाज़ गूँजी। जो जहाँ था वही जड़ हो गया। हिम्मत कर छोटे चाचा ने पूछा "हुआ क्या बाऊ जी?" 
 
"आज तक इस घर में किसी ने मेरा  कहा टालने की हिम्मत नहीं की और तेरे बेटे की इतनी हिम्मत कि मुझ से छिपा कर कोई काम करे" गुस्से से आवाज काँप गई बाऊ जी की।
अनगिनत आशंकाओं से घिरे छोटे चाचा ने पूछा "बाऊ जी  क्या सुना आपने और किसने कहा?" 
 
"तेरे लाडले को शहर पढ़ने भेजा  था और अभी उसके दोस्त किशोर के बापू से सुन कर आ रहा हूँ की तेरा बेटा फ़ौज में जाने की तैयारी कर रहा है!" गुस्से से फुनकते हुए बाऊ जी ने चाचा को घूर कर देखा। 
इस अप्रत्याशित बात से चाचा जी भी घबरा गए लेकिन बात सँभालने की गुरेज से बोले " बाऊ जी आज कल बच्चे जो चाहे करने देना चाहिए और वैसे भी गलत तो नहीं कर रहा हरीश, मुझे बता चुका है इस बारे मेंं। "
 
"बाप दादा की पुश्तैनी जमींदारी छोड़ फ़ौज की नौकरी करेगा?, यही देखना  बाकी रहा था  मेरे जीते जी ये ना होगा,  समझा दे अपने लड़के को अपनी जगह  वो  उस लड़के किशोर को भेज दे नौकरी मिल गई तो गरीब किसान का कुछ हाथ बँट जाएगा" फैसला सुना बाउजी उठ कर जाने लगे।
 तभी दरवाज़े से अंदर आती एक आवाज़ ने उनके क़दम रोक  दिए "सही कह रहे आप बाउजी। इस देश  में  अपनी मर्जी से मरने  का हक़ भी सिर्फ़ दो लोगो को ही है एक किसान दूसरा जवान"
 
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बोटियाँ 
 
"सर, आज के अखबार के लिये जो आर्टिकल लिखा था वो छपा ही नही" पूरे अखबार को उलट पलट कर देखने के बाद  प्रिन्टिंग में हुई किसी गलती की आशंका से  मोहित ने अपने ओफिस फोन कियाl
"हमम, नहीं छपा, और शायद छपे भी ना "उधर से सर का संक्षिप्त सा उत्तर आया l
"पर सर हुआ क्या"  मोहित की बैचेनी बढती जा रही थी,
"दिन रात एक कर दी थी मैंने उस खबर के लिये अपनी जान तक जोखिम मे डाल दी थी  और आप कह रहे है कि....." 
"समझने की कोशिश करो मोहित, बाकी सभी अखबारो ने तारीफों के पुल बाँधे हैं नेता जी के पैदल यात्रा के और वैसे भी नेता जी की छवि दुनिया के सामने कितनी अच्छी बनी हुई है तुम भी जानते ही हो अब  ऐसे मे तुम्हारी रिपोर्ट से अगर राज खुल भी जायेगा  की नेता जी की असलियत क्या है तो कोई यकीन नही करने वाला  उल्टा मान हानि का दावा ठोक दिया तो अखबार का क्या होगा "बात को लगभग टालने वाले अन्दाज मे सर ने कहाl
"ह्म्म, समझ गया सर आपके मुँह तक  भी पहुँच गई है बोटी तभी मुँह बंद हो गया है  आपका "बोलते बोलते  मोहित की आवाज़ क्रोध से कांप गई,
"लेकिन  मैं नही डरता  किसी से, न ही उनकी फेंकी बोटी और हड्डी का लालच करता हूँ मै  सच्चाई को सामने ला कर रहूँगा"  मोहित के स्वर अचानक तेज हो गये थेl
"सच  दुनिया के सामने लाने के लिये जिन्दा रहना भी  जरूरी है मोहित  सही समय का इन्तज़ार करो, वर्ना   बेवक्त की आँधी मे उडा दिये जाओगे और   बोटियाँ  खाने वाले और बाँटने वाले दोनो  के लिए तुम्हे गुमनाम करना कोई मुश्किल काम नहीं  " अब की बार  दूसरी ओर से आती आवाज़ भर्राई हुई थl। 
"जहाँ चाटुकार और लोभी किस्म के पालतू हो  वहाँ  बडे फूँक फूँक कर कदम रखने होते है मोहित  "कुछ देर की शांति के बाद बिन बोले ही बात दोनों को समझ आ गई थीl
 
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एक पुख्ता सवाल 
 
   "मधु, जल्दी तैयार हो बेटा, लडके  वाले आते ही होंगे, और हाँ....  मेकअप  थोड़े अच्छे से करना।"
माँ की आवाज़ में कुछ ज्यादा ही मिठास थी.. जिसने मेरे  गुस्से को कुछ और बढ़ा दिया थाl
"बस करो माँ ...हद हो गई है,  मेरी बात कोई समझता क्यों नहीं,  आखिर कब तक इन दिखावों में फँसी  रहूँगी मैं।" 
"जब तक तेरा  रिश्ता तय नहीं हो जाता तब तक" माँ  की आवाज़ से वो मिठास  गायब  थी अब। तू सिर्फ़ अपना क्यों सोचती है.. अपनी छोटी बहन का भी तो सोच.. तेरे कारण उसकी भी तो उम्र होती जा रही है.. 
तो करा दो न उसकी शादी पहले मैंने कब मना  किया है दाग तो मेरे चेहरे पर हैं  न.. वो तो बेदाग है...जबकी इस जन्मजात दाग के होने में मेरा कोई कुसूर  भी नहीं है..  फिर भी ये हमेशा मेरे गुणों  और हुनर पर हावी हो जाता है..  गुस्से में आवाज़  कुछ ज्यादा ही तेज़ हो गई थी मेरी जिसे सुन कर  बाहर से पापा और भाई भी  अंदर आ  गएl 
मधु ने गुस्से से भाई  को देखा और पूछा "क्यों कभी किसी ने भैया से नहीं बोला कि अपने चेहरे से चेचक के दागो को छिपाओ ... उनकी शादी तो हो गई आराम से उल्टा इकलौता होने के  कारण दहेज भी खूब मिला... 
"तू मुझसे मुकाबला करेगी अब.." भाई  भी गुस्से  से भर गया।
"क्यों  हमेशा लडको  के कारोबार  और तनख्वाह के पीछे  रूप गुण  छिप  जाते हैं... और  हम लडकियाँ हमेशा गुण और रुप के बीच मे फँस कर रह जाती है.. बोल कर मधु फफक फफक कर रोने लगी...
कुछ पल की शांति  के बाद फिर मधु की आवाज़ गूँजी "जिसे  पसंद करना है गुण से करे रुप से नही, नही करूँगी नुमाइश  खुद की जब तक मेरे सवालों का जवाब नहीं देते आप, कहती हुई मधु अपने कमरे मे चली गईl 
 
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रचनाकार परिचय

रेनुका चितकारा 

ईमेल : Rickychitkara5@gmail.co

निवास : नई दिल्ली

उम्र- 43
शिक्षा-  परा स्नातक 
विधा- लघुकथा तथा कविता लेखन 
निवास- नई दिल्ली 
मोबाइल- 9650325112