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प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून' के दोहे

प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून' के दोहे

 
बचपन हुआ वयस्क सम, अनगिन हुए  विकार।
इस युग में दुर्लभ हुआ बाल सुलभ  व्यवहार ।।

बातें  बहुधा  हो  रहीं  सौ  में  नब्बे  व्यर्थ।
सब मिल बौनी कर रहे शब्दों की सामर्थ्य।।
 
बचपन हुआ वयस्क सम, अनगिन हुए विकार।
इस युग में दुर्लभ हुआ बाल सुलभ  व्यवहार ।।
 
वक्र धनुष की डोर ने  चाल  चली  गंभीर।
हिरनी की हत्या हुई, दोष सहे ऋजु तीर।।
 
पथिक न पहुँचा गेह को, कितने बदले पंथ।
विषय ग्रन्थि खोली नहीं, रहा पलटता ग्रन्थ।।
 
जैसे  वंशी  एक  ही,  गाये  अनगिन  गीत।
लाखों रिश्ते साध ले, बिना स्वार्थ की प्रीत।।
 
अनुशासन अनिवार्य है यौवन में भरपूर।
अनायास उड़ने लगे हवा  मिले  कर्पूर।।
 
स्वच्छ शहर के विषय पर, लिखते छात्र निबंध।
खिड़की   से   आती   रही, कूड़े  की  दुर्गंध।
 
पहले थे ड्रग माफ़िया, फिर गुंडों के  बाप।
"माननीय" हो  ही  गए,  धीरे-धीरे  आप।।
 
कैसा  दौर  विकास  का, कैसा  नया  विहान।
बच्चों को जब मिल रहा, अधकचरा-सा ज्ञान।।
 
पेड़ काटते  लोग  कुछ, करें  हास-परिहास।
देखी किसने डाल पर, चिड़िया एक उदास।।
 
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रचनाकार परिचय

प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

ईमेल : praveenkumar.94@rediffmail.com

निवास : फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 08-03-1983
जन्मस्थान- फतेहपुर(उत्तर प्रदेश)
लेखन विधा-हाइकु, दोहा, गीत, ग़ज़ल,लघुकथा
शिक्षा-स्नातक
सम्प्रति- ब्लड बैंक में टेक्निकल इंचार्ज
प्राकाशन- विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं  एवं सहयोगी संकलनों में गद्य एवं पद्य रचनाएँ प्रकाशित
प्रसारण- आकाशवाणी छतरपुर से अब तक सात बार प्रसारण, भारत समाचार चैनल से कविताओं का प्रसारण
संपर्क- ग्राम- सनगाँव, पोस्ट- बहरामपुर , फतेहपुर उत्तर प्रदेश-212622
मोबाइल- 8896865866