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नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

निवेदिताश्री के माहिए

निवेदिताश्री के माहिए

यह देह पुरानी है
मोह नहीं करना
नित आनी-जानी है

अनुनासिक सब भूले
जित देखो उत ही
बस अनुस्वार झूले
 
कहने को मीत कई
सच्चे साथी को
ये आँखें तरस गईं
 
जिसने भोगा जैसा
उसकी ऐनक से
लगता है जग वैसा
 
जग भर को मैं भूली
जिस दिन से चौखट
वृन्दावन की छू ली
 
थी रंगों की होली
चातक मन रोया
पिय बिन होली हो ली
 
दो दिन का नाता है
कोई जीवन भर
कब साथ निभाता है
 
पल–पल बदले हर पल 
समय जरा देना
हर दुख का निकले हल
 
भूली सारी तृष्णा
जबसे आन बसे
मेरे मन में कृष्णा
 
मत बांधो जंजीरें
उड़ जाता पंछी
जब बदले तक़दीरें
 
यह देह पुरानी है
मोह नहीं करना
नित आनी-जानी है
 
 
रिश्ते तब बच जाते
गणित विषय में जब
नम्बर हैं कम आते


वो दिल में उतर गये
बातों घातों से
वो दिल से उतर गये
 
 
हम सारे कठपुतली
नाचे छम–छम–छम
खींचें प्रभु जी सुतली
 
 
हिन्दी लगती ऐसी
उर शीतल करती 
है पन्चामृत जैसी
 
 
हो सच की गति मति जब
जीवन की वल्गा
थामे कान्हा जी तब
 
 
त्रुटि करता नहीं कभी
ऐसा कौन कहो
करते हैं कभी सभी
 
 
ज्ञानी हर कोई है
अहंकार कैसा
फ़ानी हर कोई है
 
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रचनाकार परिचय

निवेदिताश्री

ईमेल : shardeyaprakashan@gmail.com

निवास : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि-22 दिसम्बर
जन्मस्थान-गोरखपुर
शिक्षा-स्नातकोत्तर
संप्रति-सम्पादक,प्रकाशक
प्रकाशन-शारदेय प्रकाशन
सम्मान/पुरस्कार-लगभग साठ
पता-विपुलखण्ड, गोमतीनगर, लखनऊ
मोबाइल-7784097784