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मैं अखिल विश्व का गुरू महान : अटल बिहारी वाजपेयी- डॉ० अमित कुमार मिश्रा

मैं अखिल विश्व का गुरू महान : अटल बिहारी वाजपेयी- डॉ० अमित कुमार मिश्रा

किसी भी चीज़ को देखने का अटल जी का अपना एक अलग ही नज़रिया था। भारत को वे मात्र एक ज़मीन का टुकड़ा नहीं मानते थे। उनका मानना था कि भारत मानवीयता का एक उच्च आदर्श है। यहाँ अनेक संस्कृतियों, भाषा, जाति, धर्म, रंग-रूप आदि के माध्यम से अखंडता में एकता का एक ऐसा संदेश प्रतिध्वनित होता है, जिससे विश्व अभिभूत है। भारत के इन्हीं सब गुणों के कारण उसे विश्वगुरु की उपाधि दी गई है।

मैं अखिल विश्व का गुरू महान,
देता विद्या का अमर दान,
मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग
मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान।
(मैं अखिल विश्व का गुरू महान- अटल बिहारी वाजपेयी)

भारतीय इतिहास में गुप्त काल से लेकर वर्तमान युग तक अनेक ऐसे शासक हुए हैं, जिन्हें इतिहास के पन्नों में न सिर्फ उनकी शासन व्यवस्था के लिए स्मरण किया गया है अपितु उन्हें उनके द्वारा निर्मित कला और साहित्य में अमिट योगदान के लिए एक अलग और अविस्मरणीय स्थान प्राप्त है। वर्तमान युग में ऐसे ही एक व्यक्तित्व के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी को जाना जाता है, जो न सिर्फ़ भारतीय राजनीति में लोकतंत्र के सर्वोच्च पद (प्रधानमंत्री) पर आसीन रहे अपितु काव्य के एक सच्चे साधक के रूप में भी अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। मानव जीवन की संवेदना के अनेक आयाम उनके काव्य में विद्यमान हैं। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जगजीवन की समस्या, राजनीतिक समस्या, आपसी मतभेद के कारण युद्ध की विकट स्थिति और इन सबसे ऊपर मानवीय संवेदना, जीवन संघर्ष और जीवन पथ पर विजय का स्वर उनके काव्य में प्रतिध्वनित हैं।

अटल जी राजनैतिक जीवन में भी और कवि एवं पत्रकार के रूप में भी राष्ट्रवादी चेतना से संपृक्त रहे हैं। वे बड़े राजनेता के साथ कुशल पत्रकार (संपादक) एवं उच्च कोटि के कवि थे। पत्रकार के रूप में अटल जी ने 'पंचजन्य', 'वीर', 'अर्जुन', 'स्वदेश' और 'राष्ट्रधर्म' जैसे राष्ट्रवादी स्वर वाले पत्रों का संपादन किया। एक कवि के रूप में अटल जी भारतवर्ष को एक 'राष्ट्रपुरुष' के रूप में कल्पित करते हैं। उनका मानना है कि भारत भौगोलिक रूप से दिखाई देने वाला सीमाओं से बँधा भूखण्ड मात्र नहीं है, यह एक संस्कृति है, जिसका प्रसार सीमा और काल की परिधि से परे है। हिमालय उसका मस्तक है तो कश्मीर इसके मुकुट रूप में शोभायमान है। भारत हिंदुत्व की धरोहर है। इसकी संस्कृति का स्वरूप अत्यंत विराट है।

इसका कंकर-कंकर शंकर है
इसका बिंदु-बिंदु गंगाजल है1

अटल जी संपूर्ण अस्तित्व राष्ट्रहित में विसर्जित कर देने पर बल देते हैं। समर्पण की पराकाष्ठा पर जाकर उनका कवि-मन उद्घोषित करता है-

हम जिएँगे तो इसके लिए
मरेंगे तो इसके लिए2

15 अगस्त 1947 को भारत राजनैतिक रूप से स्वाधीन हो गया। अंग्रेजों की एक लंबी पराधीनता से यह मुक्ति का दिवस था। भारतीय साहित्य में अनेक ऐसे कवि-विचारक हैं, जो सिर्फ़ राजनीतिक स्वतंत्रता को किसी देश की वास्तविक स्वतंत्रता नहीं मानते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि स्वतंत्रता के उपरांत उस देश की जनता को हर स्तर पर विकास का समुचित अवसर प्राप्त हो, स्वशासन तब तक व्यर्थ है, जब तक कि उसके केंद्र में जनता का हित स्थित न हो। धूमिल जैसे कवियों ने स्वतंत्रता के बाद की स्थिति का विश्लेषण करते हुए यह माना है कि हम जिस आज़ादी को लेकर उन्मत्त हुए जा रहे हैं, वह वास्तव में भारत की संपूर्ण आज़ादी नहीं है। उनका मानना है कि केवल झंडे का रंग-रूप बदल जाने से और शासक के चेहरे बदल जाने से आज़ादी का वास्तविक अर्थ प्राप्त नहीं हो जाता है। उन्होंने लिखा है-

क्या आज़ादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई ख़ास मतलब होता है3

इसी तरह के भाव हम अटल बिहारी वाजपेयी के विचारों में भी पाते हैं। उनका मानना है कि जब तक भारत का हर एक नागरिक ख़ुद को संबल नहीं बना लेता है, उसके पास जीवन की समुचित सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो जाती हैं तब तक आज़ादी के मायनों को सही अर्थों में नहीं आँका जा सकता है-

कलकत्ते के फुटपाथों पर
जो आँधी-पानी सहते हैं
उनसे पूछो 15 अगस्त के बारे में
वे क्या कहते हैं4

इन विचारों से भली प्रकार प्रकट हो जाता है कि जब तक भारत का व्यक्ति फुटपाथ पर सोने को विवश है, भूखा-नंगा है, अशिक्षित है तब तक उसके लिए स्वतंत्रता की बात बेईमानी के अलावा और कुछ नहीं है। आज भी भारत अपने उस लक्ष्य से कोसों दूर है, जिसका स्वप्न महात्मा गाँधी ने देखा था। महात्मा गाँधी की कल्पना में जिस भारत की तस्वीर हम देखते हैं, वह भारत आज भी निर्मित नहीं है। जहाँ हर एक नागरिक को न्याय, शिक्षा और जीवन जगत के हर क्षेत्र में समानता के साथ आगे बढ़ने का अवसर प्रदान किया जाना था। ऐसे में गाँधी के स्वप्न को खंडित होते देखकर अटल जी की आत्मा क्रंदन कर उठती है और वे यह मानने पर विवश हो जाते हैं कि हमें स्वतंत्रता दिलाने वाले महापुरुषों के स्वप्न को भंग करने का अपराध हमसे हुआ है-

क्षमा करो बापू तुम हमको
वचन भंग के हम अपराधी5

लेकिन वह अपराधबोध होने के बाद सिर्फ़ उसे आत्मग्लानि का विषय मात्र न बनाकर जीवन लक्ष्य के रूप में स्वीकार करते हैं और वे बापू, जयप्रकाश नारायण जैसे जनता के सच्चे हितैषियों से वादा करते हैं कि हम उन सपनों को साकार करेंगे, जिसे आपने सँजोया था। हम उस भारत के निर्माण की कल्पना को साकार करेंगे, जिसे लेकर आपने संघर्ष किया था। भारत में आपातकाल के दौर में जयप्रकाश नारायण को शासन का क्रूर अत्याचार झेलना पड़ा था लेकिन उसके बावजूद भी उन्होंने जनता की आवाज़ को कभी कमज़ोर नहीं पड़ने दिया। उनके प्रति भारतवासियों का जो कर्तव्य है, उसकी याद दिलाते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने लिखा है-

जय प्रकाश जी रखो भरोसा
टूटे सपनों को जोड़ेंगे6

स्वाधीनता के उपरांत वह समय आते देर नहीं लगी, जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेताओं और अफसरों ने विदेशियों, अंग्रेजों के साथ साँठ-गाँठ करना आरंभ कर दिया। उनका मतलब तो अपने ऐशो-आराम और पश्चिमी सभ्यता से वहाँ के सुख-सुविधा के साधनों को एकत्रित करने से था। उन्हें इससे क्या मतलब था कि कितने भारतवासी उन अंग्रेजों से, उसके शासन से भारत को मुक्त कराने के लिए फाँसी पर चढ़ गए। पूरी ज़िंदगी जेल में गुज़ार दी। लाठियों और गोलियों के शिकार हो गये और जीवन के किसी भी सुख का आनंद नहीं ले सके। ऐसे ही क्षण में नागार्जुन ने लिखा था-

आओ रानी हम ढोएँगे पालकी
यही हुई है राय जवाहरलाल की

ऐसे ही क्षण में अटल बिहारी वाजपेयी अमर शहीदों को याद करते हुए कहते हैं-

जो वर्षों तक सड़े जेल में, उनकी याद करें
जो फाँसी पर चढ़े खेल में, उनकी याद करें7

भारतीय राजनीति में आपसी जोड़-तोड़ और भ्रष्टाचार का जो दौर चल रहा है, उसमें लोकतंत्र के सच्चे स्वरूप को प्राप्त कर पाना संभव नहीं है। जनता की सुख-सुविधाओं का समुचित ख़याल नहीं रखा जाता है। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी जनता अनेक प्रकार की असुविधाओं से जूझ रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वतंत्र भारत को लेकर भारतवासियों ने जो स्वप्न देखा था, समाजवाद और लोकतंत्र के जिस सूर्योदय की कल्पना भारतवासियों ने की थी, उसे निशा के अंधकार ने घेर रखा है और अभी वह सवेरा नहीं हुआ है, जो सच्चे अर्थों में भारतवासियों का भाग्योदय कहला सके। लेकिन अटल जी की संवेदना बार-बार इस आशा का स्वर गुनगुनाती है और वे पूर्ण विश्वास से कहते हैं, वह सवेरा अवश्य आएगा, जब भारत में समाजवाद का सूर्योदय होगा-

चीर निशा का वक्ष
पुन: चमकेगा दिनकर8

आज जनता का संघर्ष किसी विदेशी से नहीं होकर उन भारतीयों से है, जो अपने स्वार्थ और आत्मलिप्सा के बादल के तले रोशनी को ढके हुए हैं। भ्रष्टाचार का क़द इतना बढ़ चला है कि भारत की जनता स्वशासन होने के बावजूद भी अपने सपनों को साकार नहीं कर पा रही है। आज भी किसानों की समस्याएँ जस की तस मौजूद हैं। पूँजीपतियों के द्वारा आज भी मज़दूरों का शोषण किया जा रहा है। ग़रीब जनता के हित में चलाए जाने वाली योजनाएँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जा रही है। जनता का विकास अवरुद्ध है।

सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अँधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है9

सत्ता के भूखे भेड़िए, लोगों को आपस में जाति, धर्म, भाषा, वर्ण आदि अनेक वर्गों में बाँटकर आपस में लड़ाए जा रहे हैं। जनता के घरों में आग लगाकर उसकी लपटों पर अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं। वे नहीं चाहते हैं कि जनता कभी भी सुख-चैन की साँस ले और उसे शासन में होने वाले भ्रष्टाचार की ओर निगाह उठाने का अवसर प्राप्त हो। न तो कोई सच्चा मुसलमान अयोध्या के राम मंदिर को तोड़ने का ख़्वाहिश रखता है और न ही कोई सच्चा हिंदू बाबरी मस्जिद का ही विध्वंस चाहता है। यह सब आग राजनीतिक बातें हैं, जो मानव हृदय में विष-बेल की तरह पनपाई जाती हैं और राजनीति के दलाल इसका दुरुपयोग करते हैं। भारतीय राजनीति के अनेक चेहरों का नाम बाबरी विध्वंस में लिया जाता है, जिनकी संलिप्तता को नकारा नहीं जा सकता लेकिन अटल जी अपने हिंदुत्व पर अभिमान करने वाले व्यक्ति हैं और जो अपने धर्म पर अभिमान करता है, वह किसी के धर्म पर प्रहार नहीं कर सकता। उन्होंने लिखा है-

इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है
इस्लाम सिसकियाँ भरता है, डॉलर मन में मुस्कुराता है10

अटल जी भली प्रकार जानते हैं कि धर्म के नाम पर लड़ने वाला चाहे हिंदू हो या मुसलमान, वह धार्मिक और राजनीतिक पाखंडियों के द्वारा भड़काया गया है। उसका दुरुपयोग किया जा रहा है। भूखों को रोटी के नाम पर हथियार थमा दिया जाता है, जनता के सूखे कंठों से जिहाद के नारे लगवाए जाते हैं और हर धर्म का व्यक्ति धार्मिक और राजनीतिक उकसावे के कारण आपस में भाईचारे को भूलकर आतंक को बढ़ावा देता है-

भूखों को गोली, नंगे को हथियार पिन्हाए जाते हैं
सूखे कंठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं11

आज हर देश में लोकतंत्र के ऐसे दलालों की बाढ़-सी आई हुई है, जो अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। उन्हें धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय की लेशमात्र भी फ़िक्र नहीं है। वे तो किसी भी रूप में लोगों को लड़वाकर, एक-दूसरे के हाथों मरवा कटवाकर अपने स्वार्थ को साधना चाहता है-

कौरव कौन, कौन पांडव
सीधा सवाल है
दोनों ओर शकुनि का, फैला कूटजाल है12

भाई-भाई को लड़ाया जा रहा है, पिता-पुत्र को लड़ाया जा रहा है, पड़ोसी एक दूसरे के शत्रु बन बैठे हैं, एक ऐसे भ्रम के जाल को देश दुनिया में फैला दिया गया है, जहाँ क़त्ल की जा रही है तो बस मानवता। लोग अपने अंदर के दया-धर्म की हत्या कर अमानवीय क्रूरता के साथ घात-प्रतिघात किए जा रहे हैं। कोई जाति-धर्म के नाम पर, कोई भाषा-भेष के नाम पर, कोई राष्ट्र के नाम पर और न जाने कितने रूपों में मनुष्य, मनुष्य का शत्रु बना हुआ है। वसुधैव कुटुंबकम का नारा आज कहीं भी सुनाई नहीं देता। ऐसा लगता है जैसे मानवता ही मानवता की शत्रु बन बैठी है। ऐसे दौर में अटल जी की कविता कितनी प्रासंगिक हो जाती है-

खून क्यों सफेद हो गया
दूध में दरार पड़ गई13

विश्व स्तर पर सभी देश अपने देश की जनता के विकास पर कम ख़र्च कर रहे हैं और अपने पड़ोसियों को नष्ट करने के लिए तरह-तरह के हथियार बनाने में जुटे हुए हैं। हरेक देश की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा भाग सिर्फ़ इसलिए ख़र्च किया जा रहा है कि वह अपने पड़ोसी से अधिक ताक़तवर रूप में उभर सके। इन अंतरराष्ट्रीय अमानवीयता की ओर जिस कवि का ध्यान चला जाए, निश्चय ही उसे विश्व कवि की उपाधि देना अतिशयोक्ति नहीं होगा। अटल जी विश्व के पटल पर छा रहे युद्ध के बादलों को देखकर अत्यंत चिंतित थे। उनका मानना है कि वैज्ञानिक युग में अनेक तरह के जिन हथियारों के निर्माण किए जाने की होड़-सी लगी है, उसमें संपूर्ण मानवता जलाकर राख कर दी जाएगी। जिसके पास शक्ति होती है, वह उसके मद में उन्मत्त हो उठता है और वह अपने पागलपन के दौरे में किसी भी देश, राष्ट्र और समुदाय को मिटाकर रख देगा। नक्शे से भले ही कोई देश मिटे लेकिन उसमें मरती मानवता ही है। विश्वयुद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी को नष्ट करने में एक क्षण भी नहीं लगा था लेकिन इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी उसे फिर से बसाने की शक्ति न तो किसी राष्ट्र में है और न ही किसी बड़े से बड़े वैज्ञानिक के पास। इतिहास के पन्ने में दो शहरों के उजड़ने का उल्लेख मात्र दर्ज है लेकिन उसमें जिस मानवता की हत्या हुई थी, उसकी सिसकियाँ एक कवि-मन ही अनुभूत कर सकता है-

जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का
आविष्कार किया था
वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण
नरसंहार के समाचार सुनकर
रात को कैसे सोए होंगे?14

आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक देश, दूसरे देश को बर्बाद करने का जो घिनौना षड्यंत्र रच रहा है, उससे कोई अनभिज्ञ नहीं है। हर किसी को पता है कि कल तक पाकिस्तान की मदद अमेरिका कर रहा था और वह सदैव ही पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध उकसाता रहा था और लड़ने के लिए हथियार मुहैया कराता रहा था। वही काम आज चीन कर रहा है लेकिन जिस तरह अमेरिका को अपने पाले हुए बिच्छू का दंश ख़ुद भी झेलना पड़ा था, उसी तरह आज नहीं तो कल यह दंश चीन को भी झेलना ही पड़ेगा और संभवत: तब उसकी चेतना जगेगी, जैसे अमेरिका तब जागृत हुआ, जब उसके ख़ुद के एफिल टॉवर पर पाकिस्तानी आतंकियों के द्वारा हमला किया गया। जिस प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं, उससे यह स्पष्ट है कि अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र आपसी सहयोग और भाईचारे के रिश्ते को कायम नहीं करता है, आतंकी राष्ट्रों को बढ़ावा देना और उनका पालन-पोषण करना बंद नहीं करेगा तो यह दूसरों के लिए तो अहितकर होगा ही ख़ुद उनके लिए भी एक न एक दिन नुकसान का ही कारण बनेगा-

चिंगारी का खेल बुरा होता है
औरों के घर आग लगाने का जो सपना
वो अपने ही घर में सदा खरा होता है15

किसी भी चीज़ को देखने का अटल जी का अपना एक अलग ही नज़रिया था। भारत को वे मात्र एक ज़मीन का टुकड़ा नहीं मानते थे। उनका मानना था कि भारत मानवीयता का एक उच्च आदर्श है। यहाँ अनेक संस्कृतियों, भाषा, जाति, धर्म, रंग-रूप आदि के माध्यम से अखंडता में एकता का एक ऐसा संदेश प्रतिध्वनित होता है, जिससे विश्व अभिभूत है। भारत के इन्हीं सब गुणों के कारण उसे विश्वगुरु की उपाधि दी गई है। यही कारण है कि विश्व सदैव भारत को एक उच्च आदर्शवादी देश के रूप में देखता रहा है। भारत के विषय में अपना नज़रिया स्पष्ट करते हुए अटल जी कहते हैं-

भारत ज़मीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है16

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में अपना उच्च मुकाम तो रखते ही हैं, उन्होंने हिंदी साहित्य की जो सेवा की है, उसके लिए वे सदैव स्मरण किए जाते रहेंगे और हिंदी जगत उनका ऋणी रहेगा। उनकी भाषा में जो कसाव है, वह गहरे भावबोध को अभिव्यक्त करता है। काव्य विषय के रूप में उन्होंने मानव के उत्थान-पतन, जीवन-संघर्ष, सुख-दुख और न जाने कितने मानवीय संवेदनाओं को मुखरित किया है। इसके अलावा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो राजनीतिक समस्याएँ हैं, उस पर भी उन्होंने मानवीय दृष्टि से विचार किया है। निश्चय ही वे हिंदी भाषा के एक सच्चे सेवक हैं और उनकी संवेदना अत्यंत ही व्यापक है।

 

 


संदर्भ सूची-
1. अटल बिहारी वाजपेयी- 'भारत ज़मीन का टुकड़ा नहीं', पत्रिका, 'गगनांचल', संपादक- डॉ० आशीष कंधवे, नवंबर 2021-फरवरी 2022 संयुक्तांक, भीतरी मुख्यपृष्ठ (आगे)
2. वही
3. सुदामा पाण्डेय धूमिल, 'बीस साल बाद', काव्यकल्प, संपादक- डॉ० बद्रीनारायण सिंह, निर्मल पब्लिकेशन्स, दिल्ली, प्रथम संस्करण: 2010, पृष्ठ- 76
4. अटल बिहारी वाजपेयी, 'स्वतंत्रता दिवस की पुकार', विकिपीडिया, कविता कोश, लिंक- http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%85%E0%A4%9F%E0%A4%B2_%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%AF%E0%A5%80
5. अटल बिहारी वाजपेयी, 'क्षमा याचना', विकिपीडिया, कविता कोश
6. वही
7. अटल बिहारी वाजपेयी, 'जो बरसों तक सड़े जेल में' विकिपीडिया, कविता कोश
8. अटल बिहारी वाजपेयी, 'पुनः चमकेगा दिनकर' विकिपीडिया, कविता कोश
9. अटल बिहारी वाजपेयी, 'झुक नहीं सकते' विकिपीडिया, कविता कोश
10. अटल बिहारी वाजपेयी, 'स्वतंत्रता दिवस की पुकार' विकिपीडिया, कविता कोश
11. वही
12. अटल बिहारी वाजपेयी, 'कौरव कौन, कौन पांडव', विकिपीडिया, कविता कोश
13. अटल बिहारी वाजपेयी, 'दूध में दरार पड़ गई', विकिपीडिया, कविता कोश
14. अटल बिहारी वाजपेयी, 'हिरोशिमा की पीड़ा', विकिपीडिया, कविता कोश
15. अटल बिहारी वाजपेयी, 'पड़ोसी से', विकिपीडिया, कविता कोश
16. अटल बिहारी वाजपेयी- 'भारत ज़मीन का टुकड़ा नहीं', पत्रिका, 'गगनांचल', संपादक- डॉ० आशीष कंधवे, नवंबर 2021-फरवरी 2022 संयुक्तांक, भीतरी मुख्यपृष्ठ (आगे)

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रचनाकार परिचय

अमित कुमार मिश्रा

ईमेल : amitraju532@gmail.com

निवास : उदाकिशुनगंज, मधेपुरा (बिहार)

नाम- डॉ० अमित कुमार मिश्रा
जन्मस्थान- जानीपुर, सीतामढ़ी (बिहार)
जन्मतिथि- 06 मई 1993
शिक्षा- एम.ए., पी. एच.डी.
सम्प्रति- सहायक प्राध्यापक, एच.एस.कॉलेज, उदाकिशुनगंज (मधेपुरा)
लेखन विधाएँ- कविता, कहानी, व्यंग्य, आलोचना
प्रकाशन- २१ वीं सदी में बिहार की साहित्यिक पत्रकारिता (पुस्तक), छः सांझा संकलन एवं पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित

सम्मान/पुरस्कार- 'हिन्दी रत्न सम्मान' - बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना
निवास- उदाकिशुनगंज, मधेपुरा
मोबाइल- 9304302308