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लिम्बू : कला, साहित्य (भाग दो )डॉ० शोभा लिम्बू यल्मो

लिम्बू :  कला, साहित्य (भाग दो )डॉ० शोभा लिम्बू  यल्मो

 
 लिम्बू जनजाति की कलाओं के विषय में बात कही जाय तो इनकी कला बहुत ही सान्दर्भिक और प्रकृति से जुड़ी हुई है। 

 [कला]
'कला'  शब्द को अगर परिभाषित करे तो कोई भी कार्य को कुशलता पूर्वक और व्यवहारिक रूप में उपयोगी बनाना ही कला है। हमारे  वादन, नृत्य, चित्रकला, गायन, वास्तुकला, पाककला, शिल्पकारिता, अभिनय - नम्रता आदि 'कला' के अंदर ही समावेश है। 
   लिम्बू जनजाति की कलाओं के विषय में बात कही जाय तो इनकी कला बहुत ही सान्दर्भिक और प्रकृति से जुड़ी हुई है। 
     हमारे जीवनशैली में विविध  प्रकार के कला अंतर्भूत है  जिनमें ललितकला, वास्तुकला, (भूमि-घर, भवन-निर्माण, किल्ला निर्माण, पुल, भवन), मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला आदि।  
   यह सभी कलाएँ हमारे संस्कृति के अंदर ही समाविष्ट है इसलिए तो संस्कृति से अलग  हम 'कला' की परिकल्पना  नहीं कर सकते है। 
 
  वास्तुकला :  लिम्बू  जनजातियों में वास्तुकला की एक बहुत ही अहम भूमिका है। लिम्बू' वास्तुकला' विशेष रुप से 'मुन्धुम'  आधारित लोककथाओं, सृष्टि कथा, इतिहास में विविध चट्टानों, पत्थरों से निर्मित किल्लाओं/ गढ़ों के वर्णनों  का उल्लेख है। 
मुन्धुम में वर्णित, हाडङसेम लुङ,  तानाक जोङ, खाम्पाजोङ, पावोजोङ, टिङरीजोङ,  पोमेजोङ, यहाशोकजोङ, चेम्फुजोङ आदि किलओं / गढ़ों का उल्लेख है। 
    लिम्बू समाज में प्रायः घरों के दीवार  निर्माण करते समय  पत्थर /चट्टान /चुना /बाँस / चिकनी मिट्टी / बड़े-बड़े पेड़ों की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है।  घर के छप्पर को धान के पुआल / बाँस बुनकर चटाई की तरह / सिरुपाते पौधे के पत्ते से छाते है। 
  घर ( मताने) के प्रवेश द्वार पर घर के अनुसार लकड़ी के खम्भें(हाङसितलाङ) होते हैं और उसपर खोंप कर लिम्बू शिल्पकारी नक्काशी भी बनाई जाती है है। मकान में एक आपातकालीन द्वार भी होता है जिसे  'पलाम' कहते हैं। 
लिम्बू में घर के बनावट (आर्किटेक्चर) को 'मताने को'  कहते हैं। खिड़कियों ( हङवित) और दरवाजों पर भी नक्काशी का काम होता है जो इस समुदाय की वास्तुकला की  उत्कृष्ट विशेषता है। 
 लिम्बू समुदाय की महिलाओं में तान बुनने की कला  से सम्बंधित जो पौराणिक कथा है जो बहुत ही रोचक है और महत्वपूर्ण है। 
 'मुन्धुम' आधारित लोककथा  'थाक्केलुङ 'में सृष्टि कर्ता  'तागेरा निङवा फुमा'  एक गुफा में एक स्त्री का रुप धारण कर थाक्केलुङ पत्थर पर बैठकर  तान बुनने का जिक्र  है और आज भी वह स्थान जिस पत्थर पर बैठकर  बुना करती थीं  प्रत्यक्ष रुप में मौजूद है। अतः यह मान्यता है कि लिम्बू समुदाय के महिलाओं को कपड़ा सिलवाना, धागा काटना, बुट्टेदार कढ़ाई करने की कला  'युमा'( ईश्वर)  द्वारा प्रदत है। 
यह तान बुनने एवं अन्य हस्तशिल्प कला ( बांस से निर्मित विविध सामग्रियां,आभूषण, वाद्ययंत्र, कृषि संबंधित औजार, व्यंजन संबंधित बर्तन, आदि) का सम्बंध अति प्राचीन काल से ही जुड़ा हुआ है जिसका प्रामाणिक सबूत ' मुन्धुम' है। 
 
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रचनाकार परिचय

शोभा लिम्बू यल्मो

ईमेल : sovalimbooyolmo@gmail.com

निवास : कालिम्पोंग(पश्चिम बंगाल)

नाम- डॉ० शोभा लिम्बू यल्मो
जन्मतिथि- 01 जुलाई, 1967
जन्मस्थान- दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल,
शिक्षा- एम.ए., पीएचडी.,
संप्रति- एशोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग (विभागाध्यक्ष), कालिम्पोंग कालेज , कालिम्पोंग, पश्चिम बंगाल
प्रकाशित कृति-
क. लिम्बू भाषा का स्वरुप विकास (विचार प्रकाशन, सिक्किम,2008)
ख. ‌‌'समकालीन चर्चित नेपाली कहानियां '( सूत्रधार प्रकाशन, कोलकाता (2016)
ग. 'प्रसाद की कहानियों का शास्त्रीय अध्ययन '(आनंद प्रकाशन, कोलकाता 2020)
घ. 'याक्थुंग मुक खेदा ' लिम्बू लोक-कथा हिंदी में (बुकांट पब्लिकेशन, सालबारी, सिलिगुड़ी 2023)
ड़. 'कैमेलिया '(कहानी संग्रह), अनंग प्रकाशन, नई दिल्ली।

आलेख, कहानी, कविता, साक्षात्कार एवं समीक्षात्मक लेख प्रकाशित विविध राष्ट्रीय पत्रिकाओं में:
१. समकालीन भारतीय साहित्य, साहित्य अकादमी दिल्ली,
२. युद्धरत आम आदमी पत्रिका,नई दिल्ली,
३. 'भाषा' पत्रिका, मानव संसाधन विकास मंत्रालय,नई दिल्ली।
एवं अन्य नेपाली एवं लिम्बू भाषा साहित्य पत्रिकाओं में... ।

विशेष- अध्यक्ष: दार्जिलिंग हिंदी भाषा मंच कालिम्पोंग, पश्चिम बंगाल।
सम्मान-
1- वीरांगना सावित्री बाई फुले राष्ट्रीय पुरस्कार 2016 (भारतीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली)
2- अंतरराष्ट्रीय तथागत विशिष्ट सम्मान 2019 (इटवा सिद्धार्थ नगर, उतर प्रदेश)
सम्पर्क- ठेगाना- ' यल्मो अयन,'
डॉ० बी.एल. दीक्षित रोड, कालिम्पोंग-734301