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लिम्बू : कला, साहित्य की अंतिम कड़ी- डॉ० शोभा लिम्बू यल्मो

लिम्बू : कला, साहित्य की अंतिम कड़ी- डॉ० शोभा लिम्बू यल्मो

लिम्बू समुदाय के कला, साहित्य, सौंदर्य शास्त्र के विविध पहलुओं के विवेचनाओं के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि भाषा साहित्य की पहचान और विकास के लिए भाषा को समृद्ध और संरक्षित होना बहुत आवश्यक है तभी हमारी सामाजिक भाषिक पहचान विश्व पटल पर सम्भव हो पाएगी और हम पूर्ण रूप से सक्षम कहलाएँगे।

 

काव्य कला:
लिम्बू काव्य कला का उत्तम उदाहरण 'मुन्धुम' है। मुन्धुम पद्यात्मक / काव्यात्मक शैली में है। 'मुन्धुम' को फेदाङमा ( गुरु) मौखिक रुप में गायन शैली में मंत्रोच्चारण कर सृष्टि के आरम्भ से लेकर आज तक के आख्यान को सुनाते हैं।
'मुन्धुम' में सृष्टि और उत्पति का आख्यान, सामाजिक और धार्मिक चलन व्यवहार में समानता, सृष्टि, उत्पति, पापाचार, दुराचार, ईर्ष्या, आँखी- डाह आदि सिर्फ़ आख्यान और श्रुतिपरक रुप में ही नहीं वरन इसमें जन्म-मरण, विवाह, मृत्यु के कर्मकांड, संस्कार, रीति-परम्परा सभी वर्णित हैं।
अनुष्ठान के बाद इसी तरह अपने शिष्यों को सस्वर गाकर ज्ञान प्रदान करते हैं और शिष्य भी सस्वर पाठ सुनकर अपने स्मृति में संचय करते हैं। यही है मौखिक परम्परा का चलन जो आज तक समुदाय में जीवित है।

मूर्ति कला:

इस कला लिम्बू समुदाय में कहीं उल्लेख नहीं है।

[साहित्य]

साहित्य का अर्थ कोई भी ज्ञानदायक अक्षरों का लिखित दस्तावेज़ है।
सर्वप्रथम लिम्बुओं का कोई भी लिखित साहित्य उपलब्ध नहीं था। उनकी मौखिक परम्परा है उनका महत्वपूर्ण दस्तावेज़ मौखिक रुप में हस्तांतरित होते हुए चला आ रहा है। वर्तमान में सभी मौखिक दस्तावेज़ों को लिखित रुप में संग्रहित कर साहित्य का रुप दिया जा रहा है।

पौराणिक इतिहास को अगर देखे तो 'मुन्धुम' जो मौखिक दस्तावेज़ के रूप में सुरक्षित है। आज भी 'मुन्धुम' को गायन शैली में काव्यात्मक रुप में पाठ करने की परम्परा है। इसे 'फेदांङमा' वर्ग (आध्यात्मिक गुरु) विविध अवसरों में पाठ करते हैं। इस समुदाय का जीवन का आधार 'मुन्धुम' है।
इन समुदायों के विशेष प्रकार के लोकनृत्य, लोकगीत, लोककथाओं में इनके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक परम्पराओं का दस्तावेज़ के रूप में आज भी जीवित हैं।
लिम्बू भाषा साहित्य के इतिहास को देखे तो लिम्बू साहित्य में पहला व्यक्ति राजा सिरिजंगा का उल्लेख मिलता है। वे एक महान भाषाविद् थे जिन्होंने लिम्बू लिपि एवं वर्णमाला का आविष्कार 10 वीं शताब्दी के आसपास किया था, जिसका उल्लेख 'सिरिजंगा मुन्धुम साप्ला' इमानसिंह चेम्जोंग कृत रचना में है जो अप्रकाशित है।
इसके पश्चात सिरिजंगा के भाई योगजंगा ने भी लिम्बू भाषा विकास में अथक सहयोग प्रदान किया। उनकी कोई भी कृति उपलब्ध नहीं है। उन्होंने मौखिक रूप में लोगों को भाषा के प्रचार प्रसार द्वारा शिक्षा देने का महती कार्य किया।
सिरिजंगा और योगजंगा के बाद महान अवतारी पुरुष 'ते- ओङसी सिरिजंगा सिंग थेबे' का पदापर्ण 18 वीं शताब्दी में हुआ। इनके आर्विभाव को लिम्बू साहित्य के इतिहास में नवजागरण काल के रुप में माना जाता है। इनका समयकाल 700 वर्ष रहा। यह आश्चर्य की बात है कि इनके समय काल तक मौखिक साहित्य कैसे और किस रुप में सुरक्षित रहा होगा। इन्होंने भाषा और 'मुन्धुम; के प्रचार-प्रसार का कार्य 1730 -1741 तक किया। इनके समय में वर्णमाला ही मिली थी। सन् 1741 में पश्चिम सिक्किम के मारताम नामक स्थान पर साङ लामा ने उनको पेड़ पर लटकाकर, शरीर पर असंख्य तीर चलाके उनकी हत्या कर दी थी। उनकी कोई भी लिखित कृति उपलब्ध नहीं है।
सिरिजंगा थेबे के पश्चात क़रीब डेढ़ शताब्दी तक भाषा- साहित्य विकास के पथ पर निस्तब्ध था। उसके बाद लालसोर सेनदाङ 19 वीं शताब्दी लिम्बूवान में आठराई ठूलो के रुप में पदार्पण हुआ। उन्होंने गाँव-गाँव भाषा के प्रचार-प्रसार द्वारा शिक्षा देने का कार्य किया। वहाँ से सिक्किम के दरमदिन में जाकर भाषा शिक्षण का कार्य कर फिर वहाँ से सन् 1926 में कालिम्पोंग के 'डुगरा बस्ती' में लोगों को 'मुन्धुम' पढ़ाना सिखाया। वहाँ से आसाम पहुँचे और वहीं उनकी मृत्यु हुई। उनकी कोई लिखित दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है।
19 वीं शताब्दी के मध्यकाल में एक ब्रिटिश व्यक्ति ने 'लिम्बू अंग्रेजी डिक्शनरी' लिखी. जिसे पहले लिम्बू कोश के रुप में माना जाता है। सन् 1925 के बाद इतिहासकार और शिक्षाविद मानसिंह चेम्जोंग और सूबेदार बालवीर थोलोंग का लिम्बू साहित्य जगत में एक चमकते हुए सितारें के रुप में अभ्युदय हुआ। उन्होंने 'तुम याकथुङ निङवाफुसाप्ला' साइक्लोस्टाइल में प्रकाशित किया था। यह पुस्तक लिम्बू लिपि में लिखी हुई पहली पुस्तक है जो प्रथम प्रकाश्य में आयी थी। इसी विकास क्रम में पी. एम. मुरिङला द्वारा लिखित लेख सन् 1994 में प्रकाशन में आया।
ईमानसिंह चेम्जोंग कृत:-
'सिरिजंगा मुन्धुम साप्ला', 'हिस्ट्री आफ विजयपुर', 'हिस्ट्री एण्ड कल्चर आफ किरात पिंपल्स', 'लिम्बू अंग्रेजी डिक्शनरी', 'किरात साहित्य को इतिहास', 'किरात को वेद'
उपर्युक्त कृतियाँ लिम्बू सम्पूर्ण समाज और साहित्य जगत के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ के रूप में जीवित रहेगा।
भाषा के प्रचार-प्रसार में महागुरु फाल्गुनानन्द और उनके शिष्य सत्यहाङमा के अवदान को हम नहीं भूल सकते है। उन्होंने शिक्षा प्रसार के साथ-साथ समाज में व्याप्त कुसंस्कारों को मिटाने का भी कार्य किया।
इस क्रमिक विकास में 20 वीं शताब्दी में लिम्बू भाषा सिर्फ़ लिपि के प्रचार-प्रसार तक ही सीमित रह गई, कुछ साहित्य लिखा गया पर प्रकाश में नहीं आया। कुछ पाठ्य् पुस्तकें प्रकाशित हुईं जो नेपाल, दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और सिक्किम से हुईं थीं। अगर देखा जाय तो उत्कृष्ट कोटी के साहित्य का अभाव था।
किसी भी समुदाय की सभ्यता, संस्कृति, धर्म, कला और परम्पराएँ साहित्य के विकास में मुख्य भूमिका का निर्वाह करती हैं।
लिम्बू साहित्य जगत में मुख्य रचनाकारों में ईमानसिंह चेम्जोंग, बी. बी. मुरिङला, पी. ए. मुरिङला, तिल विक्रम नेम्बाङ, वैरागी काइंला, काजीमान कानदाङवा, येहालावती, विरही काईला, अईतमान तामलिङ, हर्क बहादुर तामलिङ, वीर नेम्बाङ, मोहन प्रकाश इजोम आदि लिम्बू साहित्य जगत के नींव हैं।
अतः सभी विवेचनाओं के अंत में हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि आदिवासियों की मौखिक कलात्मक कृतियों, भाषा, सभ्यता, संस्कृति, परम्पराओं, श्रुतिपरक मौखिक दस्तावेजों, जीवन दर्शन में निहित सौंदर्य का तात्विक, दार्शनिक एवं मार्मिक विवेचन सार्थक रुप में अभिव्यक्त होता हुआ स्पष्ट दिखाई देता है।
अन्य आधुनिक भाषाओं की तरह लिम्बू भाषा की भी प्राचीन भाषिक परम्परा है। लिम्बू भाषा की आधुनिकीकरण की प्रक्रिया की बात कही जाय तो 'आधुनिकीकरण' शब्द तो आधुनिक है किन्तु देश हो या समाज, भाषा हो या संस्कृति, इन सभी की सहज और सीधी आधुनिकीकरण की प्रक्रिया काफी प्राचीन है। सभी साहित्यकारों, इतिहासकारों ने अपने समयकाल अनुसार अपने दृष्टिकोण से संस्कृति और समाज का आधुनिकीकरण किया है। समयानुसार सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, चिंतन, आदर्श और मूल्य आदि के स्तर पर बदलाव आता है तो भाषा में भी समकालीन चुनौती के अनुसार बदलाव आना स्वाभाविक ही है।
अतः लिम्बू लिपि में भी समाज की आवश्यकता अनुसार भाषिक कुछ प्रकार्य परिष्कृत होता आया है और यही है इस भाषा का आधुनिकीकरण।
सिरिजंगा लिपि को अध्ययन की सुविधानुसार तीन भागों में विभाजित किया गया है :
1.18 वीं शताब्दी में प्राप्त लिपि
2. प्रथम आधुनिक लिपि (1914-1975)
3. वर्तमान लिपि ( 1975 से अब तक)

आज लिम्बू लिखित साहित्य विभिन्न विधाओं (पद्य, गद्य, पत्र-पत्रिकाएँ) में उपलब्ध है और वर्तमान में लिम्बू भाषा विद्वान, इतिहासकार, भाषाविद्, अनुवादक साहित्य के संरक्षण और रचनात्मक कार्यों में सफलता के साथ आगे बढ़ रहे है। प्राचीन मौखिक दस्तावेज़ों को भी समयानुसार तकनीकी सुविधानुसार लिखित रूप में संग्रहित किया जा रहा है। यह सारी प्रक्रिया भाषा साहित्य विकास एवं संरक्षण के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है।

अतः लिम्बू समुदाय के कला, साहित्य, सौंदर्य शास्त्र के विविध पहलुओं के विवेचनाओं के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि भाषा साहित्य की पहचान और विकास के लिए भाषा को समृद्ध और संरक्षित होना बहुत आवश्यक है तभी हमारी सामाजिक भाषिक पहचान विश्व पटल पर सम्भव हो पाएगी और हम पूर्ण रूप से सक्षम कहलाएँगे।

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रचनाकार परिचय

शोभा लिम्बू यल्मो

ईमेल : sovalimbooyolmo@gmail.com

निवास : कालिम्पोंग(पश्चिम बंगाल)

नाम- डॉ० शोभा लिम्बू यल्मो
जन्मतिथि- 01 जुलाई, 1967
जन्मस्थान- दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल,
शिक्षा- एम.ए., पीएचडी.,
संप्रति- एशोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग (विभागाध्यक्ष), कालिम्पोंग कालेज , कालिम्पोंग, पश्चिम बंगाल
प्रकाशित कृति-
क. लिम्बू भाषा का स्वरुप विकास (विचार प्रकाशन, सिक्किम,2008)
ख. ‌‌'समकालीन चर्चित नेपाली कहानियां '( सूत्रधार प्रकाशन, कोलकाता (2016)
ग. 'प्रसाद की कहानियों का शास्त्रीय अध्ययन '(आनंद प्रकाशन, कोलकाता 2020)
घ. 'याक्थुंग मुक खेदा ' लिम्बू लोक-कथा हिंदी में (बुकांट पब्लिकेशन, सालबारी, सिलिगुड़ी 2023)
ड़. 'कैमेलिया '(कहानी संग्रह), अनंग प्रकाशन, नई दिल्ली।

आलेख, कहानी, कविता, साक्षात्कार एवं समीक्षात्मक लेख प्रकाशित विविध राष्ट्रीय पत्रिकाओं में:
१. समकालीन भारतीय साहित्य, साहित्य अकादमी दिल्ली,
२. युद्धरत आम आदमी पत्रिका,नई दिल्ली,
३. 'भाषा' पत्रिका, मानव संसाधन विकास मंत्रालय,नई दिल्ली।
एवं अन्य नेपाली एवं लिम्बू भाषा साहित्य पत्रिकाओं में... ।

विशेष- अध्यक्ष: दार्जिलिंग हिंदी भाषा मंच कालिम्पोंग, पश्चिम बंगाल।
सम्मान-
1- वीरांगना सावित्री बाई फुले राष्ट्रीय पुरस्कार 2016 (भारतीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली)
2- अंतरराष्ट्रीय तथागत विशिष्ट सम्मान 2019 (इटवा सिद्धार्थ नगर, उतर प्रदेश)
सम्पर्क- ठेगाना- ' यल्मो अयन,'
डॉ० बी.एल. दीक्षित रोड, कालिम्पोंग-734301