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नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

डॉ० निर्मल कुमार सैनी की कविताएँ

डॉ० निर्मल कुमार सैनी की कविताएँ

दस टीन तेल  
पाँच चीनी के कट्टे 
चार बोरी गेंहूँ
से लदा हुआ गाड़ी
में जुता हुआ 
मैं गधा हूँ 

तीन दर्द
 
1.गधा
 
दस टीन तेल  
पाँच चीनी के कट्टे 
चार बोरी गेंहूँ
से लदा हुआ गाड़ी
में जुता हुआ 
मैं गधा हूँ 
 
शाम को मेरे मालिक ने आठ सौ रूपये कमा लिए
मेरे गधा होते हुए 
यह मेरी बड़ी उपलब्धि है।
 
2.बकरी
 
सुबह-सुबह घर से 
निकाले जाने के बाद
दिन भर रोही में 
पेट भर के शाम लौटती हूँ 
 
मैं पन्नाधाय तो नहीं
पर अपने बच्चे
मालिक के कर्जा भरने के लिए
बलिदान कर देती 
मैं गरीब की गाय हूँ।
 
3.भैंस
 
मेरे रंग से लोग क्यूँ 
डरने लगे जबकि
उनके मन में भी यही रंग है
 
मैं गाय नहीं
पर दूध देती हूँ
मैं काले छाते से डरती हूँ
इसमें मेरा दोष कहाँ है
 
हम तीन दर्द हैं
उस घाव के जो 
हरा ही रहा सदा
चाहे दिन भर मरहम 
कमाते रहें।

**********
 
 
हस्तांतरण
 
दर्जी की दुकान के आगे से
मेरा रोज आना जाना होता है 
 
वह मशगूल रहता है अपने काम में
कपड़े पर रंगीन चाक से निशान लगाने में
नाप के अनुसार कपड़े को काटने में 
विभिन्न हिस्सों में कटे कपड़े को सिलने में
इंटरलोक करने में
काज बटन करने में
तुरपाई करने में
शटल भरने में 
तैयार पोशाक के पहली दफा इस्त्री करने में
 
दुकान के बाहर 
तनी पर भीगा कपड़ा सूख रहा है
जितना सिकुड़ना है पहली बार में ही 
सिकुड़ जाए 
 
मशीन चलाते समय पैर दोलन करते
भागते रहते हैं 
एक ही अक्ष पर 
तय दूरी तैयार पोशाक में दिखती है
 
सिलते समय कैंची दाहिने हाथ के नीचे
यूं रखी है
जैसे तरकश में नुकीला तीर धरा हो 
जरूरत हुई साध निशाना लक्ष्य भेद
 
पुनः तरकश में आ जाती है
हे धीर! अपना कौशल 
अभ्यास एकाग्रता ईमानदारी 
इस बदलती दुनिया और परिवेश में
अगली पीढ़ियों को हस्तांतरित कर जाओ। 
 
**********

माँ 
 
1.
माँ पढ़ी लिखी नहीं
पर अक्षर ज्ञान है 
नाम लिख सकती है
बाबूजी ने हस्ताक्षर के लिए
शिरोबंधन रेखा लगा दी
उनकी स्वीकृति में हस्ताक्षर बन 
हर फैसले में सहभागी बनी।
 
2. 
जब-जब ताकत कम हुई 
गाँव चला जाता हूँ
माँ खुद रीत कर मुझे 
अच्छे से भर के विदा करती है। 
 
3.
बचपन में जब भी मुँह धोया
या चेहरा पसीने से भर गया
माँ ने तुरंत अपने पल्लू से पोंछ 
उजला कर दिया 
माँ अकेले में ओढ़नी के पल्लू को सहलाती है। 
 
4.
मैं रंग में सांवला हूँ
काला भी कह सकते हैं 
माँ ने हमेशा मुझे तैयार करके 
नजर ना लगे 
कान के पीछे काला टीका लगाया।
 
5.
दरवाजे पर हुई
पदचाप आहट सुनकर ही
माँ बता देती है
कि कौनसा बेटा आया है।
 
*********

 
डीबली स्नान 
 
असीम आनंद 
उस नहाने में था
 
जब माँ ने पकड़ कर नहलाया
डीबली रगड़ रगड़ पैरों पर
उन्हें उजला देती थी 
माँ के स्पर्श आज भी जिंदा हैं 
 
नहलाकर ओढ़ा अपना शॉल
बैठा दिया चारपाई पर
उसे ओढ़े ओढ़े बुने ख्वाब
बनी विशिष्ट खेल योजनाओं की
हरियाली आज भी बरकरार है
 
बाल सुलभ प्रार्थनाएँ
जो ईश्वर से की गई 
सप्ताह में दो रविवार आने चाहिए,
माँ के एक तरफ चैन वाले 
ज्वैलर्स नाम लिखे छोटे पर्स 
की रेजगारी कभी खत्म न हो,
गणित वाले गुरुजी छुट्टी पर चले जाएँ,
पतंग सक्रांति के दिन 
मेरे खेत की ओर बहती हवा चले ।
 
शॉल के ताने बाने से छन कर आती रोशनी
अध खुली आँखों से देखते हुए 
आलीशान मंच पर पड़ती रौशनी सी
प्रतीत होती 
नायक और नायिका के युगल नृत्य की कल्पना कर
कभी खुद को मंच पर 
कभी मंच के सामने पाता। 
 
कभी क्रिकेट स्टेडियम का डे नाईट मैच 
सचिन को हर बॉल पर छक्के लगाते देख पाता
अक्सर सपनों, ख्वाबों, बाल योजनाओं 
की गर्मी पाकर नींद भी आ जाती।
 
जो आनंद उस खुले में नहाने का रहा
उसकी तलाश में 
हजारों के बाथ टब में 
लाश सा पसरा पड़ा हूँ।
 
**********
 
 
मौसी
 
गुरु बिन ज्ञान कहाँ
गुरु बिन गति कहाँ
गुरु बिन मुक्ति कहाँ 
मेरी माँ ऐसा कहती है
 
माँ गुरु बनाना चाहती है 
उसकी तलाश अनवरत जारी रही 
कि कोई योग्य गुरु वर मिले
जो तार दे भव सागर से
 
दो तीन वर्ष खूब खाक छानी
मंदिरों की आश्रमों की सत्संगों की
थक गई हार गई गुरु ढूंढ न पाई
ढूंढ न पाई मार्ग सद्गति का
 
खोज खत्म हुई 
हमारे घर आने वाली लुहारीन पर
उसने गुरु बनना तो नहीं स्वीकारा
धर्म बहन बन गई माँ की
 
उसका एक ही कथन 
माँ को भा गया
मन पर छा गया
 
जब तक है आखिरी साँस
लोहे को पीटते जाओ
मिल जाएगा राम
माँ अब निश्चिंत है।
 
**********

17 Total Review
C

Charu

25 September 2025

Shandaar... Lekhni... Bahut hi achchi kavitaaye... Bilkul hraday ke nikat... Apni si hi lagti h... So realistic... Anat agrim shubhkamnaaye.. Aur aisi hi sundar rachnaon ki pratiksha me... 😇 👌👌👌

D

Dharmendra Sharma

23 September 2025

बहुत ही शानदार लेखन आज के भाग दौड़ भरे जीवन में आप अपने अंदर के कवि को बचाएं रखते हैं। आप एक जिंदा दिल कवि है।

वसंत जमशेदपुरी

22 September 2025

यथार्थ के चित्र उकेरती रचना है सैनी जी की, हार्दिक बधाई

अनिता मंडा

21 September 2025

बहुत बधाई

पवन शर्मा

21 September 2025

डॉ. निर्मल कुमार सैनी की कविताएं सहज, सरल शब्दों में बुनी हुई आम आदमी की कविताएं हैं। बहुत-बहुत बधाई.

D

Dr Jayshree sharma

20 September 2025

अद्भुत बिम्ब और सार्थक लेखन से संवेदनशील मन की कविताओं ने मन मोह लिया। आज की आपाधापी और मशीनीकृत युग में डाॅ निर्मल की रचनात्मक सृजन बहुत आश्वस्त करती है कि कविता हमेशा जिंदा रहेगी।कवि को हार्दिक बधाई और शुभ आशीर्वाद।

R

Ruchi

20 September 2025

बहुत कमाल का लेखन, उम्दा, हर साधारण व्यक्ति के मन की बात बहुत सरल शब्दों में लिखा गया है।

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रचनाकार परिचय

निर्मल कुमार सैनी

ईमेल : drnksaini@gmail.com

निवास : झुँझनू (राजस्थान)

नाम- डॉ. निर्मल कुमार सैनी
शिक्षा- एम. कॉम., पीएच.डी.।
संप्रति- वर्तमान में माध्यमिक शिक्षा विभाग राजस्थान में उपप्राचार्य पद पर कार्यरत। 
सम्पर्क- पोस्ट - डूंडलोद सैनीपूरा
जिला - झुंझुनूं (राजस्थान)
पिन - 333707
मोबाइल- 7690040827